बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पञ्चम ब्राह्मण | |
| ५०-सप्तान्नसृष्टि, उसका विभाग और व्याख्या | ३१९ |
| ५१-आत्माके लिये तीन अन्न और उनका आध्यात्मिक विवेचन | ३४२ |
| ५२-आत्मार्थ अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार | ३४८ |
| ५३-आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार | ३५२ |
| ५४-इन्द्ररूप प्राणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल | ३५३ |
| ५५-आत्मार्थ अन्नोंकी अन्तवान् और अनन्तरूपसे उपासना करनेका फल | ३५५ |
| ५६-तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूपसे निर्देश | ३५७ |
| ५७-अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है | ३६२ |
| ५८-लोकत्रयकी प्राप्तिके साधन तथा देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन | ३६४ |
| ५९-सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम | ३६६ |
| ६०-सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि प्राणोंके आवेशका प्रकार | ३७४ |
| ६१-व्रतमीमांसा—अध्यात्मप्राणदर्शन | ३८१ |
| ६२-अधिदैवदर्शन | ३८६ |
| ६३-प्राणव्रतकी स्तुतिमें मन्त्र | ३८८ |
| षष्ठ ब्राह्मण | |
| ६४-पूर्वोक्त अविद्याकार्यका उपसंहार—नामसामान्यभूता वाक् | ३९२ |
| ६५-रूपसामान्य चक्षुका वर्णन | ३९५ |
| ६६-कर्मसामान्य आत्मामें सबका अन्तर्भाव दिखाना | ३९६ |
| द्वितीय अध्याय<br>प्रथम ब्राह्मण | |
| ६७-उपक्रम | ४०० |
| ६८-ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये अपने पास आये हुए गार्ग्यको अजातशत्रुका सहस्र गौ दान करना | ४०४ |
| ६९-गार्ग्यद्वारा आदित्यका ब्रह्मरूपसे प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान | ४०६ |
| ७०-गार्ग्यद्वारा चन्द्रान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान | ४०८ |
| ७१-गार्ग्यद्वारा विद्युदभिमानी पुरुषका ब्रह्मरूपसे उपदेश तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान | ४१० |