भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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( १७ )

विषयपृष्ठ
६०—श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरमें चमस-दृष्टिका विधान... ५०८
६१—श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि-दृष्टि... ५१०
तृतीय ब्राह्मण
६२—ब्रह्मके दो रूप... ५१३
६३—मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तरूप और उसके रसका वर्णन... ५१५
६४—विशेषणोंसहित अमूर्तरूप और उसके रसका वर्णन... ५१७
६५—अध्यात्म मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तका वर्णन... ५२१
६६—अध्यात्म अमूर्तका उसके विशेषणोंसहित वर्णन... ५२३
६७—इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन... ५२४
चतुर्थ ब्राह्मण
६८—याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद... ५३८
६९—मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न... ५४६
१००—याज्ञवल्क्यजीका आश्वासन... ५४७
१०१—प्रियतम आत्माके लिये ही अन्य वस्तुएँ प्रिय होती हैं... ५४८
१०२—आत्मा सबसे अभिन्न है, इसका प्रतिपादन... ५५२
१०३—सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहणमें दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाका दृष्टान्त... ५५३
१०४—परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन... ५५७
१०५—आत्मा ही सबका आश्रय है—इसमें दृष्टान्त... ५६१
१०६—विवेकद्वारा देहादिके विज्ञानघनस्वरूप होनेमें जलमें डाले हुए लवणखण्डका दृष्टान्त... ५६५
१०७—मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान... ५७२
१०८—व्यवहार द्वैतमें है, परमार्थ व्यवहारातीत है... ५७४
पञ्चम ब्राह्मण
१०९—पृथिवी आदिमें मधुदृष्टि तथा उनके अन्तर्वर्ती पुरुषके साथ शारीर-पुरुषकी अभिन्नता... ५८२
११०—आत्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपण... ५९५
१११—दध्यङ् ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्याके उपदेशकी आख्यायिका... ६००
षष्ठ ब्राह्मण
११२—मधुविद्याकी सम्प्रदायपरम्परा... ६१५

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