बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५ )
विषय
२७१—गायत्रीके द्वितीय त्रयीपादकी उपासना ... १२२४
२७२—गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परोरजापादकी उपासना ... १२२५
२७३—गायत्रीकी परमप्रतिष्ठा प्राण हैं, 'गायत्री' शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल ... १२२८
२७४—अनुष्टुप् सावित्रीके उपदेशका निषेध और गायत्री-सावित्रीका महत्त्व १२३२
२७५—गायत्रीके प्रत्येक पदके महत्त्वका दिग्दर्शन ... १२३४
२७६—गायत्रीका उपस्थान और उसका फल ... १२३६
२७७—गायत्रीके मुखविधानके लिये अर्थवाद ... १२३६
पञ्चदश ब्राह्मण
२७८-ज्ञानकर्मसमुच्चयकारीकी अन्तकालमें आदित्य और अग्निसे प्रार्थना १२४१
षष्ठ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
२७९-ज्येष्ठ-श्रेष्ठ दृष्टिसे प्राणोपासना ... १२४८
२८०-वसिष्ठादृष्टिसे वाक्की उपासना ... १२५०
२८१-प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना ... १२५१
२८२-सम्पदृदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना ... १२५२
२८३-आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना ... १२५३
२८४-प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना ... १२५४
२८५-अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माका यह निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना १२५५
२८६-अपनी उत्कृष्टताकी परीक्षाके लिये वाक्का उत्क्रमण और पुनः प्रवेश १२५६
२८७-चक्षुका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५७
२८८-श्रोत्रका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५८
२८९-मनका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५८
२९०-रेतस्का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश ... १२५९
२९१-प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना ... १२६०
२९२-वागादिकृत प्राणकी स्तुति और उसे अन्न तथा वस्त्र प्रदान ... १२६२
द्वितीय ब्राह्मण
२९३-प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतुका आना और प्रवाहणका उससे प्रश्न करना १२७३
२९४-प्रवाहणके पाँच प्रश्न और श्वेतकेतुका उन सभीके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना ... १२७५