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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 707

६८८ नारदीयपुराणम् क्वचिद् गृहांतरे मूत्रं क्वचित्कर्दमलेपनम् । सर्वदा तं गुरुर्दृष्ट्वा करमालंब्य मंदिरम् ॥५६॥ प्रविश्य स्वीयपीठे तमुपवेश्याप्यभोजयत् । स्वयं तदस्य पात्रेण बुभुजे गौतमो मुनिः ॥५७॥ तस्य चित्तं परिज्ञातुं कदाचिदथ सुंदरी । अहल्या शिष्यमाहूय भुङ्क्ष्वेति प्राह तं मुदा ॥५८॥ निर्दिष्टो गुरुपत्नया तु बुभुजे सोऽविशेषतः यथा पपौ हि पानीयं तथा वह्निमपि द्विज । कंटकानन्नवद्भुक्त्वा यथापूर्वमतिष्ठत ॥५९॥ पुरो हि मुनिकन्याभिराहूतो भोजनाय च । दिने दिने तत्प्रदत्तं लोष्टमंबु च गोमयम् ॥६०॥ कर्दमं काष्ठदंडं च भुक्त्वा पीत्वाथ हर्षितः । एतादृशो मुनिरसौ चंडालसदृशाकृतिः ॥६१॥ सुजीर्णोपानहौ हस्ते गृहीत्वा प्रलपन्हसन् । अंत्यजोचितवेषश्च वृषपर्वाणमभ्यगात् ॥६२॥ वृषपर्वेशयोर्मध्ये दिग्वासाः समतिष्ठत । वृषपर्वा तमज्ञात्वा पीडयित्वा शिरोऽच्छिनत् ॥६३॥ हते तस्मिन्द्विजश्रेष्ठे जगदेतच्चराचरम् । अतीव कलुषं ह्यासीत्तवस्था मुनयस्तथा ॥६४॥ गौतमस्य महाशोकः संजातः सुमहात्मनः । निर्ययौ चक्षुषो वारि शोकं संदर्शयन्निव ॥६५॥ गौतमः सर्वदैत्यानां सन्निधौ वाक्यमुक्तवान् । किमनेन कृतं पापं येन च्छिन्नमिदं शिरः ॥६६॥ मम प्राणाधिकस्येह सर्वदा शिवयोगिनः । ममापि मरणं सत्यं शिष्यच्छद्मा यतो गुरुः ॥६७॥ शैवानां धर्मयुक्तानां सर्वदा शिववर्तिनाम् । मरणं यत्र दृष्टं स्यात्तत्र नो मरणं ध्रुवम् ॥६८॥ तच्छ्रुत्वा ह्यसुराचार्यः शुक्रः प्राह विदांवरः । एनं संजीवयिष्यामि भार्गवं शंकरप्रियम् ॥६९॥ किमर्थं म्रियते ब्रह्मन्पश्य मे तपसो बलम् । इति वादिनि विप्रेन्द्रे गौतमोऽपि ममार ह ॥७०॥ तस्मिन्मृतेऽथ शुक्लोऽपि प्राणांस्तत्याज योगतः । तस्यैवं हतिमाज्ञाय प्रह्लादाद्या दितीश्वराः ॥७१॥ गुरु उनका हाथ पकड़ कर अपने घर ले जाते । और अपने आसन पर बैठा कर भोजन कराते थे । गौतममुनि स्वयं भी उन्हीं के पात्र में खाने लगते थे ॥५०-५७॥ किसी समय शंकरात्मा के चित्त की परीक्षा करने के लिये सुन्दरी अहिल्या ने हर्षपूर्वक उनसे कहा--'तुम मेरे साथ भोजन करो' । गुरुपत्नी के ऐसा कहने पर बिना 'ननु- नच' किये उन्होंने यथेच्छ भोजन किया । द्विज ! वे जैसे जल पोते वैसे आग भी पी जाते थे । कांटे को अन्न की तरह खा कर यथापूर्व स्वस्थ रहते थे । मुनि की बालिकाएं उन्हें बुलाकर ढेले, जल, गोबर, कीचड़ तथा लकड़ी खाने को दे देती थीं । उन चीजों को खाकर भी वे प्रसन्न रहते थे । (एक दिन) इस तरह के वे मुनि, जिनका चंडाल का-सा वेश था, टूटे-फटे जूते को हाथ में लेकर बड़बड़ाते एवम् हंसते हुए वृषपर्वा के पास पहुँचे । वहाँ वृषपर्वा तथा शिव के मध्य वे दिगम्बर होकर खड़े हो गये । वृषपर्वा ने उन्हें नहीं पहचाना, इसलिये बुरी तरह उनका शिर काट डाला । उन द्विजवर का निधन हो जाने पर चराचर विश्व में हाहाकार मच गया । मुनि- समाज तथा महात्मा गौतम को महान् शोक हुआ ॥५८-६४½॥ शोक संतप्त गौतम की आँखों से आंसू बहने लगे । तब उन्होंने समस्त दैत्यों के समक्ष यह बात कही—"मेरे प्राणाधिक प्रिय तथा शिवयोगी शिष्य ने क्या अपराध किया जो इसका शिर काट दिया गया ? अब मेरा भी मरण अवश्यंभावी है। जहाँ धर्मयुक्त सदाशिव- योग में निरत रहने वाले शैवों की मृत्यु देखी जाय वहाँ हमारा भी मरण निश्चित है" ।।६५-६८।। गौतम की बात सुनकर महाज्ञानी असुराचार्य शुक्र ने कहा-- "ब्रह्मन् ! क्यों आप मर रहे हैं? मैं इस शंकरप्रिय भृगुवंशी को जिलाऊँगा । देखिए आप मेरा तपोबल ।" दैत्यगुरु इतना कह ही रहे थे कि गौतम का प्राण त्याग हो गया । उनके मर जाने पर शुक्र ने भी योग

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