बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८६ देवा नृपा द्विजाः सर्वे मृता आसंस्तदद्भुतम् । मृतमासीदथ बलं तस्य बाणस्य धीमतः ॥७२॥ अहल्या शोकसंतप्ता रुरोदोच्चैः पुनः पुनः । गौतमेन महेशस्य पूजया पूजितो विभुः ॥७३॥ वीरभद्रो महायोगी सर्वं दृष्ट्वा चुकोप ह । अहो कष्टमहोकष्टं महेशा बहवो हताः ॥७४॥ शिवं विज्ञापयिष्यामि तेनोक्तं करवाण्यथ । इति निश्चित्य गतवान्मंदराचलमध्ययम् ॥७५॥ नमस्कृत्य विरूपाक्षं वृत्तं सर्वमथोक्तवान् । ब्रह्माणं च हरिं तत्र स्थितौ प्राह शिवो वचः ॥७६॥ मद्भक्तैः साहसं कर्म कृतं ज्ञात्वा वरप्रदम् । गत्वा पश्यामि हे विष्णो सर्वं तत्कृतसाहसम् ॥७७॥ इत्युक्त्वा वृषमारुह्य वायुना धूतचामरः । नन्दिकेन सुवेषेण धृते छत्रेऽतिशोभने ॥७८॥ सुश्वेते हेमदंडे च नान्ययोग्ये धृते विभो । महेशानुमतिं लब्ध्वा हरिर्नागांतके स्थितः ॥७९॥ आरक्तनीलच्छत्राभ्यां शुशुभे लक्ष्मकौस्तुभः । शिवानुमत्या ब्रह्मापि हंसारूढोऽभवत्तदा ॥८०॥ इंद्रगोपप्रभाकारच्छत्राभ्यां शुशुभे विधिः । इन्द्रादिसर्वदेवाश्च स्वस्ववाहनसंयुताः ॥८१॥ अथ ते निर्ययुः सर्वे नानावाद्यानुमोदिताः । कोटिकोटिगणाकीर्णा गौतमस्याश्रमं गताः ॥८२॥ ब्रह्मविष्णुमहेशाना दृष्ट्वा तत्परमाद्भुतम् । स्वभक्तं जीवयामास वामकोणनिरीक्षणात् ॥८३॥ शंकरो गौतमं प्राह तुष्टोऽहं ते वरं वृणु । तदाकर्ण्य वचस्तस्य गौतमः प्राह सादरम् ॥८४॥ यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम । त्वल्लिङ्गार्चनसामर्थ्यं नित्यमस्तु ममेश्वर ॥८५॥
से प्राणों को छोड़ दिया । उनकी इस प्रकार मृत्यु जान कर प्रह्लाद आदि दैत्येश्वर, देवता, नृप तथा द्विज सब के सब मर गये । धीमान् बाण की सेना भी मर गई । यह अद्भुत घटना हुई । इस घटना को सुनकर शोकसंतप्ता अहल्या बड़े उच्च स्वर से आर्तनाद करने लगी । गौतम ने शिवपूजन के समय महायोगी एवम् अतुलपराक्रमी वीरभद्र की भी पूजा की थी । उन्होंने जब इस घटना का सब समाचार सुना तो वे बहुत क्रुद्ध हुए और कहने लगे--"हाय ! बड़े दुःख की बात है कि बहुत-से शिवभक्त मारे गये । मैं शंकर से जाकर सब बातें बतलाऊंगा और उनके आदेशानुसार आगे कर्तव्य करूंगा ।” ऐसा निश्चय करके वे अविनाशी मंदरपर्वत पर गये । वहां त्र्यंबक को नमस्कार कर सब समाचार सुना दिया ॥६९-७५३॥ तब शिव ने अपने समीपस्थ ब्रह्मा तथा विष्णु से कहा- "अहो ! मेरे भक्तों ने बड़ा साहस का काम किया । उनका यह कार्य वरप्रद हुआ । विष्णु ! हमें चलकर उनका साहसपूर्ण कार्य देखना चाहिए ।।" इतन' कहकर शंकर वृष पर आरूढ़ हो गये । वायुदेव चामर डुलाने लगे । नंदिक ने अतिमनोहर श्वेत छत्र, जिसका दंड सुवर्ण का था और जिसे अन्य व्यक्ति धारण नहीं कर सकता था, विभु के ऊपर लगा दिया ॥७६-७८३॥ महेश की अनुमति पाकर विष्णु भी गरुड़ पर सवार हुए । श्रीवत्स चिह्न तथा कौस्तुभ मणि धारण करने वाले हरि लाल एवम् नील रंग के छत्रों से सुशोभित हुए । शिव की अनुमति से ब्रह्मा भी हंस पर आरूढ हुए । उनके छत्र इन्द्रगोप के समान लाल तथा प्रभा के सदृश चमकदार थे । इन्द्र आदि देवगण भी अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर विविध वाद्यों के साथ प्रयाण करने लगे । इस तरह कोटि-कोटि गणों से युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश गौतम के आश्रम पर पहुँचे । उन्होंने वहाँ के उस अद्भुत वातावरण को देख कर अपने भक्त को वाम नेत्रनिरीक्षण से जिला दिया ॥७९-८३॥ फिर शंकर ने गौतम से कहा- 'मैं तुम से प्रसन्न हूँ, वर मांगो ।' उनके वचन को सुनकर गौतम आदरपूर्वक कहने लगे- "देवेश ! यदि आप प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो यह ८७ ना० पु०