बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६१
इत्युक्त्वा तत्करालम्बी ह्येकांतमगमद्विभुः । आदिश्य नन्दिनं देवो द्वाराध्यक्षं यथोक्तवत् ॥९६॥ स गत्वा गौतमं वाथ ह्यब्रूत्वान्विष्णुभाषणम् । संपाद्यान्नं देवेशा भोक्तुकामा वयं मुने ॥१००॥ इत्युक्तवैकांतमगमद्वासुदेवेन शंकरः । मृदुशय्यां समारुह्य शयितौ देवतोत्तमौ ॥१०१॥ अन्योन्यं भाषणं कृत्वा प्रोत्तस्थतुरभावपि । गत्वा तडागं गंभीरं स्नास्यन्तौ देवसत्तमौ ॥१०२॥ करांबुपातमन्योन्यं पृथक्कृत्वोभयत्र च । मुनयो राक्षसाश्चैव जलक्रीडां प्रचक्रिरे ॥१०३॥ अथ विष्णोर्महेशश्च जलपानानि शीघ्रतः । चक्रतुः शंकरः पद्मकिंजलकांजलिना हरेः ॥१०४॥ अवाकिरन्मुखे तस्य पद्मोत्फुल्लविलोचने । नेत्रे केशरसंपातात्प्रमीलयत केशवः ॥१०४॥ अत्रांतरे हरेः स्कंधमारुरोह महेश्वरः । ह्युत्तमांगं बाहुभ्यां गृहीत्वा संन्यमज्जयत् ॥१०६॥ उन्मज्जयित्वा च पुनः पुनश्चापि पुनःपुनः । पीडितः स हरिः सूक्ष्मं पातयामास शंकरम् ॥१०७॥ अथ पादौ गृहीत्वा तं भ्रामयन्विचकर्ष ह । अताडयद्धरेर्वक्षः पातयामास चाच्युतम् ॥१०८॥ अथोत्थितो हरिस्तोयमादायांजलिना ततः । शीर्षे चैवाकिरच्छंभुमथ शंभुरथो हरिः ॥१०८॥ जलक्रीडैवमभवदथ र्षषिगणांतरे । जलक्रीडासंभ्रमेण विश्लस्तजटबंधनाः ॥११०॥ अथ संभ्रमतां तेषामन्योन्यजटबंधनम् । इतरेतरबद्धासु जटासु च मुनीश्वराः ॥१११॥ शक्तिमंतोऽशक्तिमत आकर्षंति च सभ्यथम् । पातयंतोऽन्यतश्चापि क्रोशंतो रुदतस्तथा ॥११२॥ एवं प्रवृत्ते तुमुले संसूते तोयकर्मणि । आकाशे वानरेशस्तु ननर्त च ननाद च ॥११३॥ विपंचीं वादयन्वाद्यं ललितां गीतिमुज्जगौ । सुगीत्या ललिता यास्तु अगायत विधा दश ॥११४॥ शुश्राव गीति मधुरां शंकरो लोकभावतः । स्वयं गातुं हि ललितं मंदमंदं प्रचक्रमे ॥११५॥ स्वयं गायति देवेशे विश्रामं गलदेशिकम् । स्वरं ध्रुवं समादाय सर्वलक्षणसंयुक्तम् ॥११६॥
वासुदेव के साथ शंकर विविक्त स्थान में जाकर कोमल शय्या पर लेट गए। दोनों देवश्रेष्ठ आपस में बातचीत करते-करते सो गए। नींद टूटने पर दोनों सुरवर स्नान करने के लिये एक गहरे तालाब में उतरे वहाँ वे अपने हाथों में जल ले ले कर एक दूसरे पर फेंकने लगे। उस समय मुनि तथा राक्षस भी जलक्रीड़ा में सम्मिलित हो गये। विष्णु और महेश कमलपत्र में जल लेकर पी लेते थे। एक बार शंकर ने विष्णु के कमल- मुख में पद्मकेसर मिश्रित जल डाल दिया। केसर के गिरने से केशव ने आँखें मूँद ली। उसी बीच महेश्वरहरि के कंधे पर चढ़ गये और उनके शिर को हाथों से पकड़ कर बार-बार पानी में डुबाने लगे। जब हरि को इससे थोड़ी-सी पीड़ा हुई तब उन्होंने शंकर को गिरा दिया और उनके पैरों को पकड़ कर घुमाने लगे। उस समय शिव ने अच्युत की छाती पर लात मारी। जिससे वे गिर पड़े। फिर उठने पर उन्होंने अंजलि में जल लेकर शंकर के मस्तक पर गिराया। तब शम्भु ने भी उनके शिर पर जल छोड़ दिया। इस प्रकार (एक ओर) हरि-हर की जल-क्रीड़ा हो रही थी और (दूसरी ओर) ऋषिगण अपनी-अपनी जटा को खोल कर जलकेलि में विभोर हो रहे थे। यहाँ तक कि उन मुनीश्वरों की जटायें आपस में उलझ जाती थीं तब जो सबल थे, वे दुर्बल को खींच कर व्यथा पहुँचाते थे और एक दूसरे को गिरा कर घसीट देते एवम् रुला देते थे ॥९९-११२॥ जिस समय इस प्रकार की तुमुल जलकेलि हो रही थी उसी समय आकाश में वानरेश (हनुमान्) नाचते तथा शब्द करते हुए वीणा एवम् अन्य वाद्यों को बजाने लगे। ललित स्वर में उन्होंने दश प्रकार के गीत गाये। उनका मधुर संगीत सुनकर स्वयं शंकर लोक-भाव से ललित राग में मंद-मंद गाने लगे। जब महेश्वर सर्वलक्षणसम्पन्न विश्राम, गलदेशिक तथा ध्रुव स्वर में धाराप्रवाह रूप से गा रहे थे तब वासुदेव हाथों से झाम बजा रहे थे। (उस