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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 711

६६२ नारदीयपुराणम् स्वधारामृतसंयुक्तं गानेनैवमपोनयन् । वासुदेवो मर्दलं च कराभ्यामप्यवादयत् ॥११७॥ अम्बुजांगश्चतुर्वक्त्रस्तुंबुरुर्मु खरो बभौ । तानका गौतमाद्यास्तु गायको वायुजोऽभवत् ॥११८॥ गायके मधुरं गीतं हनूमति कपीश्वरे । म्लानमम्लानमभवत्कृशाः पुष्टास्तदाभवन् ॥११९॥ स्वां स्वां गीतिमतः सर्वे तिरस्कृत्यैव मूच्छिताः । तूष्णीभूतं समभवद्देवर्षिगणदानवम् ॥१२०॥ एकः स हनुमान् गाता श्रोतारः सर्व एव ते । मध्याह्नकाले वितते गायमाने हनूमति ॥१२१॥ स्वस्ववाहनमारुह्य निर्गताः सर्वदेवताः गानप्रियो महेशस्तु जग्राह प्लवगेश्वरम् । प्लवग त्वं मयाज्ञप्तो निःशंको बृषमारुह ॥१२२॥ मम चाभिमुखो भूत्वा गायस्वानेकगायनम् । अथाह कपिशार्दूलो भगवंतं महेश्वरम् ॥१२३॥ वृषभारोहसामर्थ्यं तव नान्यस्य विद्यते । तव वाहनमारुह्य पातकी स्यामहं विभो ॥१२४॥ मामेवारुह देवेश विहंगः शिवधारणः । तव चाभिमुखं गानं करिष्यामि विलोकय ॥१२५॥ अथेश्वरो हनूमंतमारुरोह यथा वृषम् । आरूढे शंकरे देवे हनुमत्कंधरां शिवः ॥१२६॥ छित्वा त्वचं परावृत्य सुखं गायति पूर्ववत् । शृण्वन्गीतिसुधां शंभुर्गौतमस्य गृहं ततः ॥१२७॥ सर्वे चाप्यागतास्तत्र देवर्षिगणदानवाः । पूजिता गौतमेनाथ भोजनावसरे सति ॥१२८॥ यच्छुष्कं दारुसंभूतं गृहोपकरणादिकम् । प्ररूढमभवत्सर्वं गायमाने हनूमति ॥१२९॥ तस्मिन्गाने समस्तानां चित्रं दृष्टिरतिष्ठत ॥१३०॥ द्विबाहुरीशस्य पदामिवंदनः समस्तगात्राभरणोपपन्नः । प्रसन्नमूर्तिस्तरुणः सुमद्ध्ये विन्यस्तमूर्द्धांजलिभिः शिरोभिः ॥१३१॥

समय) कमलयोनि ब्रह्मा तुम्बुरु (तानपूरा) बजा रहे थे । गौतम आदि राग-ताल मिला रहे थे और वायुपुत्र तो गायक ही थे । कपीश्वर हनुमान् का गाना सुनकर सूखी चीजें हरी-भरी हो गईं और क्षीण पुष्ट हो गईं । वहाँ अन्य जो गायकगण थे, वे लज्जा से मानो मूर्च्छित हो गये । देवता, ऋषि तथा दानवों ने मौन भाव अवलम्बन कर लिया । केवल वे हनुमान् गाता और अन्य सब के सब श्रोता रहे । जब इस तरह महावीर के गाते-गाते दोपहर का समय हो आया तब सकल देवगण अपने-अपने वाहन पर आरूढ होकर चले गये । अनन्तर गानप्रिय महेश ने कपीश्वर को पकड़ कर यह कहा- "कपि ! तुम निःशंक होकर मेरे बैल पर चढ़ जाओ । और मेरे संमुख होकर अनेक प्रकार के गाने सुनाओ । परन्तु कपिवर ने भगवान् शंकर से कहा--"विभो ! वृष पर चढ़ने का सामर्थ्य आपको छोड़कर दूसरे किसी में नहीं है । मुझे आपके वाहन पर चढ़ने से महापाप होगा । इसलिये हे देवेश ! आप मुझ पर ही चढ़ जायें और मैं आपको धारण करके आकाश में उड़ जाऊँगा तथा सामने गाऊँगा और आप सुनेंगे" ॥११३-१२५॥ इसके अनन्तर उमापति जैसे वृष पर चढ़ते थे उसी तरह हनुमान् के कंधे पर चढ़ गये । शंकर के आरूढ़ हो जाने के बाद पवनसुत पश्चिम की ओर मुंह घुमा कर पहले की तरह सुख से गाने लगे । गीतिसुधा का पान करते हुए महादेव गौतम के घर पहुँचे । वहाँ अन्य देव, ऋषि तथा दानवगण भी आये । गौतम ने सबकी पूजा की और भोजन के लिये आग्रह किया ॥१२६-१२८॥ उस समय हनुमान् का संगीत सुनकर लकड़ी के बने जितने गृहोपकरण थे, वे सजीव-से और समस्त श्रोतागण निर्जीव-से प्रतीत हो रहे थे । हनुमान् के दोनों हाथ शंकर की वन्दना कर रहे थे । उनके समस्त अंगों में आभूषण थे । चेहरा प्रसन्न था । युवा अवस्था थी । ललाट के समीप अंजलि बाँधकर शिव को प्रणाम कर रहे थे । इतने में शंकर ने अपने हाथों से हनुमान् का शिर पकड़ कर पूरब की ओर मुख घुमा दिया । तब