बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६३ शिरः कराभ्यां परिगृह्य शंकरो हनूमतः पूर्वमुखं चकार । पद्मासनासीनहनूमतोऽञ्जलौ निधाय पादं त्वपरं मुखे च ॥१३२॥ पादांगुलीभ्यामथ नासिकां विभुः स्नेहेन जग्राह च मन्दमन्दम् । स्कंधे मुखे त्वंसतले च कण्ठे वक्षःस्थले च स्तनमध्यमे हृदि ॥१३३॥ ततश्च कुक्षावथ नाभिमंडले पादं द्वितीयं विदधाति चांजलौ । शिरो गृहीत्वाऽवनमय्य शंकरः पस्पर्श पृष्ठं चिबुकेन सोऽध्वनि ॥१३४॥ हारं च मुक्तापरिकल्पितं शिवो हनूमतः कंठगतं चकार ॥१३५॥ अथ विष्णुर्महेशानमिदं वचनमुक्तवान् । हनूमता समो नास्ति कृत्स्नब्रह्माण्डमण्डले ॥१३६॥ श्रुतिदेवाद्यगम्यं हि पदं तव कपिस्थितम् । सर्वोपनिषदव्यक्तं त्वत्पदं कपि सर्वयुक् ॥१३७॥ यमादिसाधनैर्योगैर्न क्षणं ते पदं स्थिरम् । महायोगिहृदंभोजे परं स्वस्थं हनूमति ॥१३८॥ वर्षकोटिसहस्रं तु सहस्राब्दैरथान्वहम् । भक्त्या संपूजितोऽपीश पादो नो दर्शितस्त्वया ॥१३९॥ लोके वादो हि सुमहाञ्छंभुर्नारायणप्रियः । हरप्रियस्तथा शंभुर्न तादृग्भाग्यमस्ति मे ॥१४०॥ तच्छ्रुत्वा वचनं शंभुर्विष्णोः प्राह मुदान्वितः । न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोऽन्योऽस्ति हरे क्वचित् ॥१४१॥ पार्वती वा त्वया तुल्या वर्तते नैव भिद्यते । अथ देवाय महते गौतमः प्रणिपत्य च ॥१४२॥ व्यजिज्ञपदमयात्मन्देवेहि करुणानिधे । मध्याह्नोऽयं व्यतिक्रांतो भुक्तिवेलाखिलस्य च ॥१४३॥ विभु ने अपना एक पैर पद्मासन लगा कर बैठे हुए हनुमान् की अंजलि पर और दूसरा उनके मुख पर रखा । फिर स्नेह से उनकी नासिका को पैर की अंगुलियों से धीरे-धीरे पकड़ लिया। अनन्तर दूसरे चरण को हनुमान् के कंधे, मुख, कंठ, वक्षःस्थल, स्तनमध्य, हृदय, कुक्षि, नाभिमंडल तथा अंजलि पर क्रमशः रखा। फिर शिर को पकड़ कर झुकाते हुए अपनी ठुड्डी से उनके पीठ का स्पर्श किया और मोती का एक हार उनके गले में पहना दिया ॥१२९-१३५॥ तदनन्तर विष्णु ने महेश से यह वचन कहा--"निखिल ब्रह्माण्डमंडल में हनुमान् के समान कोई (भाग्यवान्) नहीं है । क्योंकि श्रुति तथा देवादि से अप्राप्य आपका चरण, जो संपूर्ण उपनिषदों का सार तथा अव्यक्त है, हनुमान् के ऊपर अवस्थित हुआ । आपके उस चरण को यम आदि साधन तथा योगाभ्यास के द्वारा एक क्षण के लिये भी कोई अपने हृदय में स्थिर नहीं कर पाता । परन्तु वही चरण महायोगी हनुमान् के हृदय-कमल पर विराजमान रहा । मैंने एक सहस्र कोटि तथा एक हजार वर्षों तक भक्तिपूर्वक आपके चरणों की अर्चना की। परन्तु कभी आपने अपना चरणदर्शन नहीं होने दिया । यद्यपि लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि शम्भु नारायण के अत्यन्त प्रिय हैं और नारायण शम्भु के, किन्तु मैं तो अपने को ऐसा भाग्यवान् नहीं समझता" ॥१३६-१४०॥ विष्णु की बात सुनकर शंकर ने हर्ष से कहा- "हरे ! तुम्हारे समान प्रिय मेरा कोई नहीं है अथवा पार्वती तुम्हारी ही सदृश है, परन्तु वह तो मुझसे भिन्न नहीं है।" एतदुपरान्त गौतम महादेव को प्रणाम कर बोले- "अमेयात्मन् ! करुणानिधे ! मध्याह्न हो गया, भोजन का समय अतिक्रान्त हो रहा है ।"