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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 713

६६४ नारदीयपुराणम् अथाचम्य महादेवो विष्णुना सहितो विभुः । प्रविश्य गौतमगृहं भोजनायोपचक्रमे ॥१४४॥ रत्नांगुलीयैरथ नूपुराभ्यां दुकूलबन्धेन तडित्सुकांच्‍या । हारैरनेकैश्च कण्ठनिष्क्यज्ञोपवीतोत्तरवाससी च ॥१४५॥ विलंबिचञ्चन्मणिकुंडलेन सुपुष्पधम्मिल्लवरेण चैव । पंचांगगंधस्य विलेपनेन बाह्वंगदैः कंकणकांगुलीयैः ॥१४६॥ अथो विभूषितः शिवो निविष्ट उत्तमासने । स्वसंमुखं हरिं तथा न्यवेशयद्वरासने ॥१४७॥ देवश्रैष्ठौ हरीशौ तावन्योन्याभिमुखस्थितौ । सुवर्णभाजनस्थान्नं ददौ भक्त्या स गौतमः ॥१४८॥ त्रिंशत्प्रभेदान्भक्ष्यांस्तु पायसं च चतुर्विधम् । सुपक्वं पाकजातं च कल्पितं यच्छतद्वयम् ॥१४९॥ अपक्वं मिश्रकं तद्वैत्रिंशतं परिकल्पितम् । शतं शतं सुकन्दानां शाकानां च प्रकल्पितम् ॥१५०॥ पंचविंशतिधा सर्पिःसंस्कृतं व्यंजनं तथा । शर्कराद्यं तथा चूतमोचाखर्जूरदाडिमम् ॥१५१॥ द्राक्षेक्षुनारगं च मिष्टं पक्वं फलोत्करम् । प्रियालकं जम्बुफलं विकंकतफलं तथा ॥१५२॥ एवमादीनि चान्यानि द्रव्याणीशे समर्प्य च । दत्वापोशानकं विप्रो भुंक्ष्वमिति चाब्रवीत् ॥१५३॥ भुंजानेषु च सर्वेषु व्यजनं सूक्ष्मविस्तृतम् । गौतमः स्वयमादाय शिवविष्णू अवीजयत् ॥१५४॥ परिहासमथो कर्तुमियेव परमेश्वरः । पश्य विष्णो हनूमन्तं कथं भुंक्ते स वानरः ॥१५५॥ वानरं पश्यति हरौ मण्डकं विष्णुभाजने । चिक्षेप मुनिसंघेषु पश्यत्स्वपि महेश्वरः ॥१५६॥ हनूमते दत्तांश्च स्वोच्छिष्टं पायसादिकम् । त्वदुच्छिष्टमभोज्यं तु तवैव वचनाद्विभो ॥१५७॥ अनर्हं मम नैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलाविकम् । मह्यं निवेद्य सकलं कूप एव विनिःक्षिपेत् ॥१५८॥ अनन्तर विष्णु सहित महादेव आचमन करके भोजन के लिए गौतम के घर पहुँचे । वहाँ गौतम ने विभु को रत्न की बनी अंगूठी, नूपुर, दुकूलबन्ध (धोती) 'बिजली की तरह चमकती हुई कांची' अनेक प्रकार के हार, स्वर्णयज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, मणि के बने बड़े-बड़े कुंडल, पुष्पसुशोभित पाग (पगड़ी), अंगद तथा कंकण से विभूषित करके पंच गंधों का लेप लगाया । तब शिव उत्तम आसन पर बैठ गये और अपने संमुख श्रेष्ठ आसन पर हरि को भी बैठाया । जब सुरवर हरि तथा हर परस्पर अभिमुख होकर आसीन हुए तब गौतम भक्तिपूर्वक सुवर्णपात्रों में भोजन परोसने लगे ॥१४१-१४८॥ उन्होंने तीस प्रकार का भक्ष्यपदार्थ चार प्रकार का खीर, दो सौ प्रकार का सुन्दरतया पकाया हुआ भोजन तीस प्रकार का अपक्व तथा मिश्रित (पक्वापक्व) भोजन, सौ प्रकार के कंद तथा शाक, पचीस प्रकार के घी से बनाये हुए व्यंजन (तरकारी) शक्कर, आम, केला, खजूर, दाडिम, दाख, ईख, नारंगी, प्रियालक, जंबुफल, विकंकतफल, अन्य मिष्ट एवम् सुपक्व फल तथा भाँति-भाँति के भोज्यपदार्थ परसे । फिर ईश को जल समर्पण कर 'भोजन करिये, यह कहा । जब शिव आदि समस्त देवगणों ने भोजन करना प्रारम्भ किया तब गौतम एक सुमनोहर पंखा लेकर हरि-हर के ऊपर झलने लगे । उस समय शंकर ने मनोविनोद करने के वास्ते केशव से कहा—'विष्णो ! हनुमान् को देखो, कैसे वह बन्दर खा रहा है' ॥१४६-१५५॥ शिव के कहने पर विष्णु कपि की तरफ ताकने लगे । इधर महेश ने मुनिसमूह के देखते ही देखते विष्णु के पात्र में मंडक (मट्ठा) डाल दिया और हनुमान् को अपने उच्छिष्ट पायस आदि दे दिये । परन्तु कपि पूछ बैठे— "विभो ! आपका उच्छिष्ट नहीं खाना चाहिए-यह आप ही का वचन है" ॥१५६-१५७॥ शिव ने उत्तर दिया— "पत्र, पुष्प, फल आदि मेरा नैवेद्य वास्तव में अभोज्य है । उसे समर्पित करके कूप में ही फेंक