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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 714, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 714

एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६५ अभुक्ते त्वद्वचो नूनं भुक्ते चापि कृपा तव । बाणलिंगे स्वयंभूते चन्द्रकांते हृदि स्थिते ॥१५८॥ चांद्रायणसमं ज्ञेयं शम्भोर्नैवेद्यभक्षणम् । भुक्तिवेलेयमधुना तद्वैरस्यं कथांतरात् ॥१६०॥ भुक्त्वा तु कथयिष्यामि निर्विशंकं विभुंश्व तत् । अथासौ जलसंस्कारं कृतवान् गौतमो मुनिः आरक्तसुस्निग्धसुसूक्ष्मगात्राननेकधाधौतसुशोभितांगान् । तडागतोयैः कतबीजघर्षितैर्विशोधितैस्तैः करकानपूरयत् ॥१६२॥ नद्याः सैकतवेदिकां नवतरां संछाद्य सूक्ष्मांबरैः, शुद्धैः श्वेततरैरथोपरि घटांस्तोयेन पूर्णान्निक्षिपेत् । लिप्त्वा नालकजातिमास्तपुटकं तत्कौल्कं कारिका- चूर्णं चन्दनचन्द्ररश्मिविशदां मालां पुटांतं क्षिपेत् । यामस्यापि पुनश्च वारिवसनेनाशोध्य कुम्भेन तत्- चंद्रग्रन्थिमथो निधाय बकुलं क्षिप्त्वा तथा पाटलम् ॥१६३॥ शेफालीस्तवकमथो जलं च तत्र विन्यस्य प्रथमत एव तोयशुद्धिम् । कृत्वाथो मृदुतरसूक्ष्मवस्त्रखण्डेनावेटेत्सूणिकमुखं च सूक्ष्मचन्द्रम् ॥१६४॥ अनातपप्रदेशे तु निधाय करकानथ । मंदवातसमोपेते सूक्ष्मव्यजनवीजिते ॥१६५॥ सिंचेच्छीतैर्जलैश्चापि वासितैः सृणिकामपि । संस्कृताः स्वायतास्तव नरा नार्योऽथवा नृपाः ॥१६६॥ तत्कन्या वा क्षालितांगा धौतपादास्सुवाससः । मधुपिंगमनिर्यासम्सांद्रमगुरुद्भवम् ॥१६७॥ बाहुमूले च कंठे च विलिप्यासांद्रमेव च । मस्तके जापकं न्यस्य पंचगंधविलेपनम् ॥१६८॥ देना चाहिये। फिर हनुमान् ने कहा-- "अब यदि मैं नहीं खाऊंगा तो आपके वचन का पालन नहीं होगा और यदि खा लूंगा तो आपकी कृपा होगी।" (तब शंकर ने कहा-- "मेरे स्वयंभूत बाणलिंग या चंद्रकांतमणि- निर्मित लिंग या मुझे हृद्गत करके जो मेरा नैवेद्य भक्षण करता है, उसे चांद्रायण व्रत करने का फल मिलता है। हे अथवा अभी भोजन करने का समय है। इसलिये इस तरह की बात करना छोड़ दो। भोजनोपरान्त मैं बता दूंगा। तावत्काल शंकारहित होकर भोजन करो" ॥१५८-१६०३॥ सबके भोजन कर लेने के बाद गौतम मुनि ने जलसंस्कार किया (अर्थात् सबको हाथ-मुंह धुलाया)। (जलसंस्कार इस प्रकार किया जाता हैः- किञ्चित् लाल रंग वाले तथा बहुत चिकने अवयवों वाले और अनेक वार धोये जाने के कारण सुन्दर अंगों वाले घटों को तालाब के ऐसे जल से, जो निर्मली से स्वच्छ कर दिया गया हो, भर देना चाहिए ॥१६१-१६२॥ अनन्तर नदी के रेतीले तट पर नया चबूतरा बनाकर उसे उज्ज्वल सूक्ष्म वस्त्रों से ढककर उस उन (जल) पूर्ण घटों को स्थापित करे। उन पर चावल के चूर्ण तथा सिन्दूर से चित्रकारी करके चन्द्रकिरण के समान धवल माला को चन्दनचर्चित करके उनमें डाल दें। फिर एक पहर तक जल से शुद्ध करके कर्पूरचूर्ण, मोलसिरोपुष्प, पाटलपुष्प तथा शेफालिका के गुच्छे उनमें डाले, पुनः जल-शुद्धि करे। पश्चात् उनके मुखों को, जहाँ कर्पूरचूर्ण से लिप्त अंकुश रखा हुआ हो, कोमल तथा महीन वस्त्र खंडों से लपेट दे। उन घटों को धूप-रहित स्थान में रखना चाहिए ॥१६३-१६४३॥ मंद वायु से युक्त हल्के पंखे को चलाकर शीतल, सुगंधित जल से अंकुश (या लार ?) को भी सींचे। वहाँ सुसंस्कृत तथा स्वाधीन नर- नारियों या राजा या राजकन्याओं का पूजन करना चाहिए। वे रमणियां शरीर की स्वच्छता करके पैरों को धोकर सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित हों। वे अगर के गोंद को, जो ललाई लिये भूरे रंग का हो, बाहुमूल तथा कंठ में लगावें। फिर मस्तक पर मंत्र जप करके पांच सुगन्धित पदार्थों का लेप करें। उनके बाल फूलों से सुसज्जित