बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८६ नारदीयपुराणम् पुष्पनद्धसुकेशास्तु ताः शुभाः स्युः सुनिर्मलाः । एवमेवार्चिता नार्य आप्तकुंकुमविग्रहाः ॥१६६॥ युवतयश्चारुसर्वांग्यो नितरां भूषणैरपि । एतादृग्वनिताभिर्वा नरैर्वा दापयेज्जलम् ॥१७०॥ तेऽपि प्रदानसमये सूक्ष्मवस्त्राल्पवेष्टनम् । अथ वामकरे न्यस्य करकं प्रेक्ष्य तत्र हि ॥१७१॥ दोरिकान्यस्तमुन्मुच्य ततस्तोयं प्रदापयेत् । एवं स कारयामास गौतमो भगवान्मुनिः ॥१७२॥ महेशादिषु सर्वेषु भुक्तवत्सु महात्मसु । प्रक्षालितांघ्रिहस्तेषु गंधोद्वर्तितपाणिषु ॥१७३॥ उच्चासनसमासीने देवदेवे महेश्वरे । अथ नीचसमासीना देवाः सर्षिगणास्तथा ॥१७४॥ मणिपात्रेषु संवेष्ट्य पूगखंडान्सुधूपितान् । अकोणान्वर्तुलांन्स्थूलान्सूक्ष्मानंकुशानपि ॥१७५॥ श्वेतपत्राणि संशोध्य क्षिप्त्वा कर्पूरखंडकम् । चूर्णं च शंकरायाथ निवेदयति गौतमे ॥१७६॥ गृहाण देव तांबूलमित्युक्तवचने मुनौ । कपे गृहाण तांबूलं प्रयच्छ मम खंडकान् ॥१७७॥ उवाच वानरो नास्ति मम शुद्धिर्महेश्वर । अनेकफलभोक्तृत्वाद्वानरस्तु कथं शुचिः ॥१७८॥ तच्छ्रुत्वा तु विरूपाक्षः प्राह वानरसत्तमम् । मद्वाक्यादखिलं शुद्ध्येन्मद्वाक्यादमृतं विषम् ॥१७९॥ मद्वाक्यादखिला वेदा मद्वाक्याद्देवतादयः । मद्वाक्याद्धर्मविज्ञानं मद्वाक्यान्मोक्ष उच्यते ॥१८०॥ पुराणान्यागमाश्चैव स्मृतयो मम वाक्यतः । अतो गृहाण तांबूलं मम देहि सुखंडकान् ॥१८१॥ हरिर्वामकरेणाधात्तांबूलं पूगखंडकम् । ततः पत्राणि संगृह्य तस्मै खंडान्समर्पयत् ॥१८२॥ कर्पूरमग्रतो दत्तं गृहीत्वाभक्षयच्छिवः । देवे तु कृततांबूले पार्वती मंदराचलात् ॥१८३॥ जयाविजययोर्हस्तं गृहीत्वायान्मुनेर्गृहम् । देवपादौ ततो नत्वा विनम्रावदनामभवत् ॥१८४॥
किये जायें । इस प्रकार अन्य पवित्र एवं निर्मल नारियां जिनके शरीर में केसर मला गया हो, पूजी जानी चाहिए। सर्वाङ्ग सुन्दरी युवतियों को आभूषणों से सम्मानित करना चाहिए। ऐसी नारियों या नरों से जल दिलाना चाहिए जो कि जल देने के समय सूक्ष्म वस्त्र को थोड़ा-सा लपेट लें । अथवा दर्पण में घटों को देख कर उनकी डोरी खोलकर जल दें। इस प्रकार भगवान् गौतम मुनि ने जल का संस्कार कराया ॥१६५-१७२॥ जब महेश आदि समस्त महात्मा गण भोजन करके हाथ-पैर धो चुके और हाथों में किंचिन्मात्र भी गंध नहीं रही तब देव-देव शङ्कर उच्चासन पर और ऋषिवृन्द समेत देवगण नीचासन पर आसीन हुए। अनन्तर मणिपात्रों में सुगंधित सुपारी के खण्ड, जो कोणों से रहित, गोल, स्थूल, असूक्ष्म तथा अंकुश थे, और श्वेतपत्र (ताम्बूल), जिनमें कर्पूरखण्ड तथा चूर्ण (मसाला) डाला हुआ था, रखकर गौतम ने शिव से कहा—'देव ! तांबूल (मुखशुद्धि) ग्रहण कीजिये ।' मुनि के यह कहने पर महेश्वर ने कपि से कहा—'पान तुम ले लो और सुपारी मुझे दे दो ।' परन्तु हनुमान् ने उत्तर दिया – “विभो ! मेरी शुद्धि नहीं होती। मैं अनेक (कर्म) फलों का भोगने वाला बन्दर हूँ। तब मैं कैसे पवित्र हो सकता ?'' यह बात सुनकर विरूपाक्ष ने वानरश्रेष्ठ से कहा—'मेरे वाक्य से सबकुछ शुद्ध हो जाता है, विष भी अमृत हो जाता है ॥१७३-१७९॥ मेरे ही वाक्य पर अखिल वेद, देवता, धर्म, विज्ञान, मोक्ष, पुराण, शास्त्र तथा स्मृतियां आधारित हैं। इसलिए तुम तांबूल ले लो और सुपारी मुझे दो।, शंकर के कहने पर कपि ने बांये हाथ से तांबूल लेकर सुपारी के खण्ड महेश्वर को समर्पण कर दिये । शिव ने भी कर्पूर सहित पूगीफल खा लिये । जब महादेव मुखशुद्धि कर चुके तब मंदराचल से पार्वती जया, विजया के साथ गौतम के घर आ पहुँचीं। वे शङ्कर की पादवंदना कर मुँह नीचे करके अवस्थित हुईं ॥१८०-१८४॥ किन्तु त्रिलोचन ने उनके मुख को