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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 716, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 716

एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८७ उन्नमय्यमुखं तस्या इदमाह त्रिलोचनः । त्वदर्थं देवदेवेशि अपराधः कृतो मया ॥१८५॥ यत्त्वां विहाय भुक्तं हि तथान्यच्छृणु सुन्दरि । यत्त्वां स्वमंदिरे त्यक्त्वा महदेनो मया कृतम् ॥१८६॥ क्षंतुमर्हसि देवेशि त्यक्तकोपा विलोकय । न बभाषेऽप्येवमुक्ता सारुंधत्या विनिर्ययौ ॥१८७॥ निर्गच्छंतीं मुनिर्ज्ञात्वा दंडवत्प्रणनाम ह । अथोवाच शिवा तं च गौतम त्वं किमिच्छसि ॥१८८॥ अथाह गौतमो देवीं पार्वतीं प्रेक्ष्य सस्मिताम् । कृतकृत्यो भवेयं वै भुक्तायां मद्गृहे त्वयि ॥१८९॥ ततः प्राह शिवा विप्रं गौतमं रचितांजलिम् । भोक्ष्यामि त्वद्गृहे विप्र शंकरानुमतेन वै ॥१९०॥ अथ गत्वा शिवं विप्रे लब्धानुज्ञस्त्वरागतः । भोजयामास गिरिजां देवीं चारुंधर्ती तथा ॥१९१॥ भुक्त्वाथ पार्वती सर्वांगधूपपुष्पाद्यलंकृता । सहानुचर कन्याभिः सहस्राभिर्हरं यथा ॥१९२॥ अथाह शंकरो देवीं गच्छ गौतममंदिरम् । संध्योपास्तिमहं कृत्वा ह्यागमिष्ये तवांतिकम् ॥१९३॥ इत्युक्त्वा प्रययौ देवी गौतमस्यैव मंदिरम् । संध्यावंदनकामास्तु सर्व एव विनिर्गताः ॥१९४॥ कृतसंध्यास्तडागे तु महेशाद्याश्च कृत्स्नशः । अथोत्तरमुखः शंभुर्न्यासं कृत्वा जजाप ह ॥१९५॥ अथ विष्णुर्महातेजा महेशमिदमब्रवीत् । सर्वैनमस्यते यस्तु सर्वैरैव समर्च्यते ॥१९६॥ हूयते सर्वयज्ञेषु स भवाञ्कि जपिष्यति । रचितांजलयः सर्वे त्वामेवैकमुपासते ॥१९७॥ स भवान्देवदेवेशः कस्मै विरचितांजलिः । नमस्कारादिपुण्यानां फलदस्त्वं महेश्वर ॥१९८॥ तव कः फलदो वंद्यः को वा त्वत्तोऽधिको वद । तच्छ्रुत्वा शंकरः प्राह देवदेवं जनार्दनम ॥१९८½॥ ऊपर उठा दिया और कहा—'देवों की ईश्वरी ! मैंने तुम्हारा अपराध किया जो तुम्हें छोड़कर भोजन करने आया । सुन्दरि ! तुम्हें अपने घर पर छोड़कर जो मैं निमन्त्रण खाने चला आया—यह मेरा घोर अपराध हुआ । किन्तु देवेश्वरि ! क्षमा करो । क्रोध का त्याग कर मेरी ओर ताको ।' शिव के इस तरह कहने पर भी उमा नहीं बोली; अपितु वहाँ से उठकर अरुंधती के समीप जाने लगी ॥१८५-१९१॥ मुनि ने यह समझकर उन्हें प्रणाम किया तब शिवा ने पूछा—'गौतम ! तुम क्या चाहते हो ?' मुनि ने मुस्कराती हुई पार्वती को देख कर उत्तर दिया—"यदि आप मेरे घर में भोजन कर लेतीं तो मैं कृतकृत्य हो जाता ।" तब गौरी ने अंजलि बांधे गौतम से कहा—'विप्र ! मैं शङ्कर से अनुमति लेकर तुम्हारे घर में भोजन करूँगी ।' यह सुनते ही गौतम शिव से आज्ञा ले आये और उन्होंने अरुंधती सहित देवी गिरजा को भोजन कराया । भोजनोपरान्त गंध, पुष्प आदि से अलंकृता होकर पार्वती सहस्रों परिचारिकाओं के साथ शङ्कर के समीप गईं । परन्तु शंभु ने कहा—"अभी तुम गौतम के घर जाओ । मैं संध्योपासन करके तुम्हारे पास आऊँगा ।" यह सुनकर गौरी गौतम के घर चली गईं और सब देवगण संध्यावंदन करने के लिये बाहर निकले ॥१९२-१९४॥ तालाब में जाकर महेशा आदि देवों ने संध्यावंदन किया । तदुपारन्त जब उत्तर मुख होकर शंभु न्यास तथा जप कर चुके तब महातेजस्वी विष्णु ने शङ्कर से कहा—"जिन्हें समस्त देवगण नमस्कार करते हैं, जिनकी सब अर्चना करते हैं और सकल यज्ञों में जिनको आहुतियाँ दी जाती हैं, वे देव (आप) किस चीज का जप करते हैं ? निखिल सुरगण अंजलि बांध कर एक आप ही की उपासना करते हैं । तब देवदेवेश्वर होकर आप किसको प्रणाम करते हैं ? महेश्वर ! नमस्कार आदि पुण्यों का फल देने वाले आप हैं । फिर आपको कौन फल देगा ? या आपसे बढ़कर कौन है ?—बतलाइए ।" १९५-१९८½॥ यह सुनकर शङ्कर ने देवाधीश्वर जनार्दन से कहा—"गोविन्द ! मैं न कुछ ध्यान करता हूँ, न ८८ ना० पु०