बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 828, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअक्षरोक्ताभिरन्याभिः स्मरोन्मादमदात्मभिः । एषा तृतीया कथिता वनिता जनमोहिनी ॥५७॥ चतुर्थीं शृणुविप्रेन्द्र नित्यक्लिन्नासमाह्वयाम् । हंसस्तु दाहवह्निस्थैर्युक्तः प्रथममुच्यते ॥५८॥ कामेश्वर्यास्तृतीयादिवर्णानामष्टकं भवेत् । हृदंबुमरुता युक्तः स एवैकादशाक्षरः ॥५९॥ एकादशाक्षरी चेयं विद्याऽनैरंगकल्पनम् । आद्येन मन्त्रवर्णेन हृदयं समुदीरितम् ॥६०॥ द्वाभ्यां द्वाभ्यां तु शेषाणि अंगानि परिकल्पयेत् । न्यसेदंगुष्ठमूलादिकनिष्ठोप्रांतमूर्द्धगम् ॥६१॥ शेषं तद्वत्तये न्यस्य हृद्दृक्वक्त्रेष्वे नसोर्द्वयोः । त्वचि ध्वजे च पायौ च पादयोर्णकानन्यसेत् ॥६२॥ ॥६३॥ अरुणांमरुणाकल्पामरुणशुकधारिणीम् । अरुणस्रग्विलेपां तां चारुस्मेरमुखाम्बुजाम् ॥६४॥ नेत्रत्रयोल्लसदद्वक्त्रां भाले घर्मार्बुमौक्तिकै । विराजमानां मुकुटलसदर्द्धेन्दुशेखराम् ॥६५॥ चतुर्भिर्बाहुभिः पाशमंकुशं पानपात्रकम् । अभयं बिभ्रतों पद्ममध्यासीनां मदालसाम् ॥६६॥ ध्यात्वैवं पूजयेन्नित्यक्लिन्नां नित्यां स्वशक्तिभिः । पुण्या चतुर्थी गदिता नित्या क्लिन्नाह्वया मुने ॥६७॥ वनिता नवनीतस्य दाविकाग्निर्जयादिना । भूः स्वेन युक्ता प्रथमं प्राणो दाहेन तद्युतः ॥६८॥ रसो दाहेन तद्युक्तं प्रभादाहेन तद्युता । ज्या च दाहेन तद्युक्ता नित्याक्लिन्नांतगद्वयम् ॥६९॥ एषा नवाक्षरी नित्या भेरुण्डा सर्वसिद्धिदा । प्रणवं ठद्वयं त्यक्त्वा मध्यस्थैः षड्भिरक्षरैः ॥७०॥ षडंगानि प्रकुर्वीत वर्णन्यासं ततः परम् । रंध्राद्यामुखकंठेषु हृन्नाभ्यां धारयद्वयम् ॥७१॥ न्यसेन्मंत्राणर्नवकं मातृकान्यासपूर्वकम् । अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि देव्याः सर्वार्थसिद्धिदम् ॥७२॥ तप्तकांचनसंकाशदेहां नेत्रत्रयान्विताम् । चारुस्मितां चितमुखीं दिव्यालंकारभूषिताम् ॥७३॥ ताटंकहारकेयूररत्नस्तबकमंडिताम् । रसनान्नूपुरोर्म्यादिजूंबणैरतिसुन्दरीम् ॥७४॥ पाशांकुशौ चर्मखड्गौ गदावह्निधनुःशरान् । करैर्दधानामासीनां पूजायां मत्परां स्थिताम् ॥७५॥
हिनी वनिता तीसरी कही गई है। अब नित्य क्लिन्ना नामक चौथी देवी के विषय में सुनो। "हंसः.... एकादशाक्षरः"--यह उनका मन्त्र है। ॥५२-८०॥ मंत्र के प्रथमाक्षर से हृदय का और दो दो अक्षरों से शेष अंगों का न्यास करे । अंगुष्ठ के मूल में कनिष्ठा के अन्त में शिर पर, पादतलों में, हृदय, नेत्र, कर्ण, त्वचा, लिंग, गुदा तथा चरणों में वर्णों का न्यास करे। तदनन्तर रक्तवर्णा, रक्तवस्त्रा, रक्तमाला तथा रक्त लेप धारण करनेवाली, ईषत् हास्ययुक्त मुखकमल वाली, त्रिनेत्र से सुशोभित आनन वाली, मोतीकण सदृश घर्मबिंदु से युक्त भाल पर अर्धचन्द्र धारण करनेवाली, चार हाथों में पाश, अंकुश, पानपात्र तथा अभयास्त्र रखनेवाली, कमलों के बीच बैठनेवाली और मद से अलसा नित्यक्लिन्ना देवी का ध्यान करके अपनी शक्त्यनुसार उनकी पूजा करे । मुने ! चौथी नित्यक्लिन्ना के बारे में सुना दिया। अब पांचवी भेरुंडा नामक देवी के विषय में सुनो, जो समस्त सिद्धियों को देने वाली है। "वनिता....... द्वयम्"-यह उनका नवाक्षर मन्त्र है। इसमें प्रणव तथा दो ठकारों को छोड़कर शेष छह अक्षरों से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर मातृकान्यास पूर्वक रन्ध्र, मुख, कंठ, हृदय तथा नाभि में मन्त्र के अक्षरों का न्यास कर देवी का सकलसिद्धिदायक ध्यान करना चाहिये । उनका शरीर तप्त सुवर्ण के समान चमकता है, उनके तीन नेत्र हैं, हास्य मनोहर होता है, मुख प्रसन्न रहता है, शरीर दिव्य आभूषणों से विभूषित है, ताटंक (तड़की) हार, केयूर, रत्नावली, कांची, नूपुर तथा अंगूठी आदि अलंकरण उनके सौन्दर्य को बढ़ा रहे हैं, हाथों में पाश, अंकुश, चर्म, खड्ग, गदा, वह्नि, धनुष तथा बाण सुशोभित हैं और स्वयं देवी पूजा पर बैठी हुई हैं। उनकी चारों तरफ उन्हीं के समान तेज- १०२ ना० पु०