बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८१० नारदीयपुराणम् शक्तीश्च तत्समाकारतेजोहेतिभिरन्विताः । पूजयेत्तद्बहिः स्मितास्या विजयादिकाः ॥९६॥ पंचम्यं समाख्याता भेरुंडाख्या मुनीश्वर । यस्याः स्मरणतो नश्येद्गरलं विविधं क्षणात् ॥९७॥ या तु षष्ठी द्विजश्रेष्ठ सा नित्या वह्निवासिनी । तद्विधानं शृणुष्वाद्य साधकानां सुसिद्धिदम् ॥९८॥ भेरुंडायग्रिमार्धं स्यान्नित्यक्लिन्नाद्यनन्तरम् । ततोऽम्बुशून्ये हंसाग्निह्युत्तमंबुमरुद्युतम् ॥९६॥ हृदग्निना युतं शून्यं ठ्याप्तेन शुचिना च युक् । शून्यं नमः शक्तियुतं नवार्णेयमुदाहृता ॥१००॥ विद्या द्वितीयबीजेन स्वरान्दीर्घान्नियोजयेत् । मायांतान्षड्भिरेवांगान्याचरेत्सकरांगयोः ॥१०१॥ नवाक्षराणि विद्याया नवरंध्रेषु विन्यसेत् । व्यापकं च समस्तेन कुर्यादात्मसिद्धये ॥१०२॥ सर्वास्वपि च विद्यासु व्यापकन्यासमाचरेत् । तप्तकांचनसंकाशां नवयौवनसुन्दरीम् ॥१०३॥ चारुस्मेरमुखांभोजां विलसन्नयनत्रयाम् । अष्टाभिर्बाहुभिर्युक्तां माणिक्याभरणोज्ज्वलाम् ॥१०४॥ पद्मरागकिरीटांशुसंभेदारुणितांबराम् । पीतकौशेयवसनां रत्नमंजीरमेखलाम् ॥१०५॥ रक्तमौक्तिकसंभिन्नस्तबकाभरणोज्ज्वलाम् । रत्नाब्जकंबुपुंड्रे क्षुचापपूर्णेन्दुमंडलम् ॥१०६॥ दधानां बाहुभिर्वामैः कह्लारं हेमशृंगकम् । पुष्पेषुं मातुलिंगं च दधानां दक्षिणेः करैः ॥१०७॥ स्वस्वनामाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । एवं ध्यात्वार्चयेद्वह्निवासिनों वह्निविग्रहाम् ॥१०८॥ यस्याः स्मरणतो वश्यं जायते भुवनत्रयम् । अथ या सप्तमी नित्या महावज्रेश्वरी मुने ॥१०६॥ तस्या विद्यां प्रवक्ष्यामि साधकानां सुसिद्धिदाम् । द्वितीयं वह्निवासिन्या नित्यक्लिन्ना चतुर्थकम् ॥११०॥ पंचमं भगमालायं भेरुंडाया द्वितीयकम् । नित्यक्लिन्नाद्वितीयं च तृतीयं षष्ठसप्तमौ ॥१११॥
वाली और ईषत् हास्य युक्त मुखवाली विजया आदि देवियों की पूजा करे। मुनीश्वर ! यह भेरुंडा नामक पांचवीं देवी के विषय में कहा है, जिनके स्मरण करने से तत्क्षण तीन प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं ॥८१-९७॥ द्विजश्रेष्ठ ! अब जो छठी वह्निवासिनी नामक नित्या देवी है, उनके विधान को सुनो । वह साधकों को सिद्धि प्रदान करती हैं। 'भेरुंडा' 'शक्तियुतम्'-यह उनका मन्त्र है। वह नवाक्षरी कहलाती हैं। द्वितीय विद्याबीज मन्त्र से दीर्घ स्वर वर्णों का विनियोग करे। तत्पश्चात् छः अक्षरों से षडंगन्यास करे। विद्या- बीज के नौ अक्षरों का नौ रंध्रों में न्यास करे। पुनः आत्मसिद्धि के लिये सामस्त्येन व्यापक न्यास करना चाहिये। सकल विद्याओं में व्यापक न्यास करना चाहिये । तदनन्तर देवी का इस प्रकार ध्यान करे कि वह तप्त सुवर्ण के समान हैं, नवयौवना तथा सौन्दर्य से परिपूर्ण है, मुखारविन्द मन्द मुसकान से युक्त है। तीन नेत्र सुशोभित हो रहे हैं, उनकी आठ बाँहें है, मणि के आभूषणों से कान्ति उज्ज्वल हो रही है, मुकुटस्थ पद्मरागमणि की किरणों से वस्त्र रक्तिम-सा दीखता है, वे पीत रेशमी वस्त्र पहने हुई हैं, नूपुर एवम् कांची रत्नों की बनी हुई है। लाल मोतियों के गुच्छेदार आभूषणों से आकृति उज्ज्वल प्रतीत होती है, बाये हाथों में रत्न, कमल, शंख, माधवीलता के धनुष तथा पूर्ण चन्द्रमण्डल को और दाहिने हाथों में श्वेत कमल, स्वर्णशृंग, पुष्पबाण तथा बीजपुर को धारण किये हुई हैं, शक्तियां चारों ओर से घेरे हुई हैं। इस प्रकार अग्निशरीरधारिणी वह्नि- वासिनी देवी का ध्यान करके पूजन करे, जिनके स्मरणमात्र से तीनों लोक वशीभूत हो जाते हैं ॥९८-१०८॥ मुने ! अब जो सातवीं महावज्रेश्वरी नामक नित्यादेवी हैं, उनके मन्त्र आदि को बता देता हूँ। वे साधकों को सिद्धि देने वाली हैं। "द्वितीयम् द्वयम्" -यह उनका मन्त्र है। उसको मायाबीज से संपुटित करके क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये । प्रत्येक अक्षर को शक्तिसंपुटित करके नेत्र, कर्ण, नासिका, वक्षःस्थल, नाभि,