बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाशीतितमोऽध्यायः ८१३ आदिमध्यावसानेषु पूजाजपविधिक्रमात् । प्रत्ये कं तैस्त्रिभिर्भेदैर्दीर्घस्वरसमन्वितैः ॥१४६॥ कुर्यात्करांगषक्वणां न्यासं प्रोक्तं यथाविधि । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदग्व पश्चिमाधरनामभिः ॥१४७॥ सुविनद्यंतरस्थैस्तन्तदात्मसु यथाक्रमम् । आधाररंध्रहृत्स्र्वेकं द्वितीयं लोचनत्रये ॥१४८॥ तृतीयं श्रोत्रचिबुके चतुर्थं घ्राणतालुषु । पंचमं चांसनाभीषु ततः पाणिपदद्वये ॥१४९॥ मूलमध्याग्रतो न्यस्येत्तन्नवधा मूलवर्णकैः । लोहितां लोहिताकारशक्तिवृंदानिवेष्विताम् ॥१५०॥ लोहितांशुकभूषाल्रत्नलेपनां षण्मुखांबुजाम् । अनर्घ्यरत्नघटितमाणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् ॥१५१॥ रत्नस्तबकसंच्छिन्नलसद्रक्षःस्थलां शुभाम् । कारुण्यानंदपरमामरुणांबुजविष्टराम् ॥१५२॥ भुजैर्द्वादशभिर्युक्तां सर्वेषां सर्ववाङ्मयीम् । प्रवालाक्षस्रजं पद्मं कुंडिकां रत्ननिर्मिताम् ॥१५३॥ रत्नपूर्णं तु चषकं लुंगीं व्याख्यानमुद्रिकाम् । दधानां दक्षिणैर्वार्मः पुस्तकं चारुणोत्पलम् ॥१५४॥ हैमों च लेखनीं रत्नमालां कंबुवरं भुजैः । अभितः स्तूयमानां च देवगंधर्वकिन्नरैः ॥१५५॥ यक्षरक्षसदैत्यार्षिसिद्धविद्याधरादिभिः । ध्यात्वैवमर्चयेन्नित्यां वाग्लक्ष्मीकान्तिसिद्धये ॥१५६॥ सितां केवलवाक्सिद्ध्यै लक्ष्म्यै हेमप्रभामपि । धूमाभां वैरिविद्विष्टयौ मृतये निग्रहाय च ॥१५७॥ नीलां च मकीकरणे स्मरेत्तत्तदपेक्षया । इत्येषा दशमी नित्या प्रोक्ता ते कुलसुन्दरी ॥१५८॥ नित्यानित्यां तु दशमीं त्रिकुटां वच्मि सांप्रतम् । हंसश्च हृत्प्राणरसाद्वाहकणैः समन्वितः ॥१५९॥ विद्यया कुलसुंदर्या योजितः संप्रदायतः । नित्यानित्यत्रिवर्णयं षड्भिः कूटाक्षरैर्युता ॥१६०॥ जिनके स्मरणमात्र से सर्वज्ञत्व की प्राप्ति होती है। "शुचिः ....... परः"—यह उनका मन्त्र है। तीन मूल वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये ॥१४१-१४५॥ आदि, मध्य और अवसान में पूजा तथा जप के विधानक्रम से दीर्घस्वरयुक्त तीन बीजमन्त्रों से हाथ, हृदय तथा मुख में न्यास करना चाहिये। ऊपर, नीचे, पूरब, दक्षिण और उत्तर दिशा में भी मूलवर्णों से न्यास करना चाहिये। मूलाधार, रंध्र तथा हृदय में प्रथम अक्षर, तीनों नेत्रों में द्वितीय अक्षर, कान एवम् ठुड्ढी में तृतीय अक्षर, नाक तथा तालू में चतुर्थ अक्षर, कंधे तथा नाभि में पंचम अक्षर और हाथ, पैर, मूल तथा अन्त में छठे, सातवें, आठवे और नवें अक्षर का न्यास करना चाहिये। तदनन्तर देवी का ध्यान करे कि उनका वर्ण लाल है, रक्तवर्ण शक्तियां उनकी परिचर्या में लगी हैं, शरीर में रक्त वस्त्र, आभूषण, माला तथा लेप सुशोभित हैं, उनके छह मुखकमल हैं, बहुमूल्य रत्नजटित शुभ्र मणि का मुकुट शोभायमान हो रहा है, वक्षःस्थल पर रत्नावली लटक रही है, स्वयं देवी मानों करुणा एवम् परमानन्द की प्रति- मूर्ति हैं, रक्तकमल के आसन पर बैठी हुई हैं। उनकी आठ भुजायें हैं, वे सर्ववाङ्मयी हैं, दाहिने हाथों में मूंगा तथा रुद्राक्ष की माला, पद्म, रत्ननिर्मित कमण्डलु, रत्नपूर्ण चषक (प्याला), 'लुंगी' नामक व्याख्यान मुद्रिका को और बायें हाथों में पुस्तक, लाल कमल, सुवर्ण की लेखनी, रत्नमाला और उत्तम शंख को धारण किये हुई हैं, उनकी चारों ओर से देव, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर आदि स्तुति कर रहे हैं ॥१४६-१५५॥ इस प्रकार ध्यान करके वाणी, लक्ष्मी तथा कान्ति की सिद्धि के लिये नित्या देवी की अर्चना करे। केवल वाक्सिद्धि के लिये सिता देवि की, लक्ष्मी की सिद्धि के लिये हेमप्रभा की, और शत्रुविद्वेष, मृत्यु तथा निग्रह करने के लिये धूमाभा की पूजा करे। मूक बनाने के लिये नीला देवी का स्मरण करना चाहिये। यह दसवीं नित्या कुलसुन्दरी का वर्णन किया है। अब दसवीं नित्या-अनित्या त्रिकुटा का वर्णन करूंगा। "हंस ...