बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८१४ नारदीयपुराणम् प्रतिलोमाविमौ रूपैद्विसप्ततिमिदा मता । यस्या भजनतः सिद्धो नरः स्यात्खेचरः सुखी ॥१५६१॥ निग्रहानुग्रहौ कर्तुं क्षमः स्याद्भुवनत्रये । दीर्घस्वरसमेताभ्यां हंसहृद्ब्यां षडंगकम् ॥१५६२॥ भ्रूमध्ये कण्ठहृन्नाभिगुह्याधारेषु च क्रमात् । विद्याक्षराणि क्रमशो न्यसेद्बिन्दुयुतानि च ॥१५६३॥ व्यापकं च समस्तेन विधाय विधिना पुनः । ध्यायेत्समस्तसम्पत्तित्हेतोः सर्वात्मिकां शिवाम् ॥१५६४॥ उद्यद्भास्करबिम्बाभां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । पद्मरागकृताकल्पामरुणांशुकधारिणीम् ॥१५६५॥ चारुस्मितलसद्वक्त्रषट्सरोजविराजिताम् । प्रतिवक्त्रं त्रिनयनां भुजैर्द्वादशभिर्युताम् ॥१५६६॥ पाशाक्षगुणपुङ्गेक्षुचापखेटत्रिशूलकान् । करैर्वामैर्दधानां च अङ्कुशं पुस्तकं तथा ॥१५६७॥ पुष्पेषुमंबुजं चैव नृकपालाभये तथा । दधानां दक्षिणेर्हस्तैर्ध्यायेद् वीमनन्यधीः ॥१५६८॥ इत्येषैकादशी प्रोक्ता द्वादशीं शृणु नारद । त्वरितायांत्यमाद्यं स्याद्द्युतिदोहस्वरस्वयुक् ॥१५६९॥ हृच्च दाहक्षमास्वयुतं वञ्नेशीपञ्चमं तथा । मरुत्स्वयुक्तो मथ्याढचोदशम्याः परतः पुनः ॥१५७०॥ भूमी रसाक्षमास्वयुता वज्रेशीत्यष्टमः क्रमात् । षडक्षराणि त्वरिता तृतीयं तदनंतरम् ॥१५७१॥ द्युतिर्दाहचरस्वेन अस्या आचमनन्तरम् । उक्ता नीलपताकाख्या नित्या सप्तदशाक्षरी ॥१५७२॥ द्विद्विपक्षाक्षिषड्वर्णैर्मन्त्रोत्थैरंगकल्पनम् । श्रोत्रादिनासायुगले वाचि कण्ठे हृदि क्रमात् ॥१५७३॥ नामावाधारके ऽप्यापि पादसंधिषु च क्रमात् । मन्त्राक्षराणि क्रमशो न्यसेत्सप्तदशापि च ॥१५७४॥ व्यापकं च समस्तेन विदध्याच्च यथाविधि । इन्द्रनीलनिभां भास्वन्मणिमौलि विराजिताम् ॥१५७५॥ पञ्चवक्त्रां त्रिनयनामरुणांशुकधारिणीम् । दशहस्तां लसन्मुक्तामण्याभरणमंडिताम् ॥१५७६॥ ०००मतः" - यह उनका मन्त्र है । उनकी उपासना करने से मनुष्य सुखी, आकाशगामी और तीनों लोक में निग्रह तथा अनुग्रह करने में समर्थ होता है । दीर्घ मात्रा और स्वर वर्ण समेत अजपा मन्त्र तथा प्रणव से षडंगन्यास करे ॥१५६-१६२॥ भौं के मध्य, कंठ, नाभि, गुह्य तथा मूलाधार में क्रमशः बिंदुयुक्त विद्याक्षरों का न्यास करके पुनः विधिपूर्वक सामस्त्येन व्यापक न्यास करे । तदनन्तर अखिल सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये सर्वात्मिका शिवा का ध्यान करे । साधक तन्मनस्क होकर उदयकालीन सूर्यबिंब के समान आभा वाली, शुभ्र मणि का मुकुट तथा पद्मरागमणि जटित रक्तवस्त्र धारण करने वाली, मन्द मुसकान से सुशोभित छः मुख कमल वाली, प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्रों वाली, बारह भुजाओं वाली, बायें हाथों में पाश, रुद्राक्ष, माधवी लता का धनुष, ढाल तथा त्रिशूल धारण करनेवाली, दाहिने हाथों में अंकुश, पुस्तक, पुष्पबाण, कमल, नरकपाल, और अभयास्त्र रखने वाली देवी का ध्यान करे ॥१५६३-१५६८॥ नारद ! यह ग्यारहवीं देवी का वर्णन किया है। अब बारहवीं के बारे में सुनो । नीलपताका नामक नित्या देवी सत्रह अक्षरों वाली हैं। "त्वरिता ००००० अनन्तरम्" - यह उसका मन्त्र है। मन्त्र के चौदह वर्णों से अंगन्यास करना चाहिये । कान, नाक, कंठ, हृदय, नाभि, मूलाधार तथा चरण संधियों में सत्रहों मन्त्रा- क्षरों का क्रमशः न्यास करके विधिपूर्वक सम्पूर्ण रूप से व्यापक न्यास करना चाहिये । तदुपरान्त इन्द्रनील मणि के समान कान्ति वाली, दैदीप्यमान मणि का मुकुट धारण करने वाली, पाँच मुख तथा तीन नेत्र वाली, रक्त वस्त्र पहनने वाली, दशहस्त परिमित दीर्घाकृति वाली, मणि और मुक्ता के आभूषणों से अलंकृता, रत्नावली से सुशोभित, मन्द मुसकान युक्त मुख वाली, बायें हाथों में पाश, पताका, चर्म, धनुष तथा वरास्त्र धारण करनेवाली