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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 834, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 834

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८१५ रतनस्तबकसम्पन्नदेहां चारुस्मिताननाम् । पाशं पताकां चर्मापि शाङ्गं चापं वरं करैः ॥१७७॥ दधानां वामपार्श्वस्थैः सर्वाभरणभूषितैः । अंकुशं च तथा शक्तिं खड्गं बाणं तथाभयम् ॥१७८॥ दधानां दक्षिणैर्हस्तैरासीनां पद्मविष्टरे । स्वाकारवर्णवेषास्याण्यायुधविभूषणैः ॥१७६॥ शक्तिवृन्दैर्वृतां ध्यायेद्देवी नित्यार्चनक्रमे । त्रिषट्कोणयुतं पद्ममष्टपत्रं ततो बहिः ॥१८०॥ अष्टास्रं भूपुरद्वन्द्वावृतं तत्पुरयुग्मकम् । चतुर्द्वारयुतं दिक्षु शाखाभिश्च समन्वितम् ॥१८१॥ कृत्वा नामावृतां शक्तिं गणैस्तत्वार्चयेच्छिवाम् । एषा ते द्वादशी नित्या प्रोक्ता नीलपताकिनी ॥१८२॥ समरे विजयं खड्गपादुकांजनसिद्धिदा । वेतालपक्षणीचेटपिशाचादिप्रसाधिनी ॥१८३॥ निधानबिलसिद्धान्तसाधिनी कामचोदिता । अथ त्रयोदशीं नित्यां वक्ष्यामि शृणु नारद ॥१८४॥ रसो नमस्तथा दाहो व्याप्तक्षमावनपूर्विका । स्वेन युक्ता भवेन्नित्या विजयेकाक्षरा मुने ॥१८५॥ विद्याया व्यंजनैर्दीर्घस्वरयुक्तैश्चतुष्टयम् । शेषाभ्यां च द्वयं कुर्यात्षडंगानि करांगयोः ॥१८६॥ ज्ञानेन्द्रियेषु श्रोत्रादिष्वथ चित्ते च विन्यसेत् । अक्षराणि क्रमाद्विन्दुयुतान्यन्यत्तु पूर्ववत् ॥१८७॥ पञ्चवक्त्रां दशभुजां प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनाम् । भास्वन्मुकुटविन्यासचन्द्रलेखाविराजिताम् ॥१८८॥ सर्वाभरणसंयुक्तां पीतांबरसमुज्ज्वलाम् । उद्यद्भास्वद्दिवबस्तुल्यदेहकांति शुचिस्मिताम् ॥१८६॥ शंखं पाशं खेटचापौ कह्लारं वामबाहुभिः । चक्रं तथांकुशं खड्गं सायकं मातुलुंगकम् ॥१६०॥ दधानां दक्षिणैर्हस्तैः प्रयोगे भीमदर्शनाम् । उपासनेति सौम्यां च सिंहोपरि कृतासनाम् ॥१६१॥ व्याघ्रारूढाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । समरे पूजनेऽन्येषु प्रयोगेषु सुखासनाम् ॥१६२॥ शक्तयश्चापि पूजायां सुखासनसमन्विताः । सर्वा देव्याः समाकारमुखपाण्यायुधा अपि ॥१६३॥

दाहिने हाथों में अंकुश, शक्ति, खड्ग, बाण तथा अभयास्त्र रखने वाली, अरविन्द के आसन पर बैठने वाली, अपने समान वर्ण, वेष, आभूषण, तथा आयुधों से युक्त शक्तिगणों से आवृत होने वाली देवी का ध्यान करके पूजन करे । तब नौ कोण वाले अष्टदल कमल और आठ जगहों में निम्नीभूत भूपूर-द्वय का निर्माण करे, जो चार द्वारों तथा शाखाओं से समन्वित हो । वहाँ शक्तियों के साथ शिवा की अर्चना करे । यह नीलपताकिनी नामक बारहवीं नित्या देवी का वर्णन किया, जो समर में विजय तथा खड्ग, पादुका, अंजन, वेताल, यक्षिणी, चेट, पिशाच, निधि, बिल, सिद्धान्त आदि की सिद्धि अविलम्ब प्रदान करती हैं । नारद ! अब इसके बाद तेरहवीं नित्या देवी के विषय में सुनो ॥१६६१-१८४॥ मुने ! "रसो........ भवेत्"-यह एकाक्षरा विजया देवी का मन्त्र है । मन्त्र के व्यंजन तथा दीर्घ स्वर वर्णों से अंगन्यास करना चाहिये । कर्ण आदि ज्ञानेन्द्रियों में तथा चित्त में बिंदु युक्त अक्षरों का क्रमशः न्यास करना चाहिये । तत्पश्चात् दैदीप्यमान मुकुट तथा चन्द्रलेखा से सुशोभित, समस्त आभूषणों से आभूषित, पीतवस्त्रधारिणी, उदयकालीन सूर्य बिम्ब के समान देह कांतिवाली, पवित्र हास्यवाली, वाम करों में शंख, पाश, ढाल, धनुष तथा श्वेत कमल और दक्षिण हस्तोँ में चक्र, अंकुश, खड्ग, बाण तथा बीजपूर धारण करनेवाली, देखने में भयंकर, उपासना करने में अत्यन्त सौम्य, सिंह के ऊपर आरूढ, बाघों के ऊपर चढ़ी शक्तियों से परिवेष्टित, संग्राम, पूजन तथा अन्य प्रयोगों में सुख से आसनोपविष्ट होनेवाली देवी का ध्यान करे । पूजा काल में शक्तियां भी उनके साथ सुख से आसनों पर बैठती हैं । उनके समान ही उन शक्तियों की भी आकृति मुख तथा अस्त्रविशिष्ट हाथ हैं । ॥१८६-१९३॥ चार द्वार