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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 835, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 835

८१६ नारदीयपुराणम् चतुरस्रद्वयं कृत्वा चतुर्द्वारोपशोभितम् । शाखाष्टकसमोपेतं तत्र प्राग्वत्समर्चयेत् ॥१९४॥ तदंतर्वृत्तयुग्मांतरष्टकोणं विधाय तु । तदंतश्च तथा पद्मं षोडशच्छदसंयुतम् ॥१९५॥ तथैवाष्टच्छदं पद्मं विधायावाह्य तत्र ताम् । तत्तच्छक्त्या वृतां सम्यगुपचारैस्तथार्चयेत् ॥१९६॥ एषा त्रयोदशी प्रोक्ता वादे युद्धे जयप्रदा । चतुर्दशीं प्रवक्ष्येऽथ नित्यां वै सर्वमंगलाम् ॥१९७॥ हृद्वंबुवनयुक्तं खं नित्या स्यात्सर्वमंगला ॥१९८॥ एकाक्षर्यनया सिद्धो जायते खेचरः क्षणात् । षड्दीर्घाढ्यां मूलविद्यां षडंगेषु प्रविन्धसेत् ॥१९९॥ तां नित्यां जातरूपाभां मुक्तामाणिक्यभूषणाम् । माणिक्यधृन्मुकुटां नेत्रद्वयप्रैंखद्दयापराम् ॥२००॥ द्विभुजां शासनां पद्मे त्वष्टषोडशतद्वयेः । पत्त्रैरुपैते सचतुर्द्वारसूमद्मयुग्मके ॥२०१॥ मातुलुंगफलं दक्षे दधानां करपंकजे । वामेन निजभक्तानां प्रयच्छंतीं धनादिकम् ॥२०२॥ स्वसमानाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । षट्सप्ततिभिरन्याभिरप्सरोत्थामिरन्विताम् ॥२०३॥ प्रयोगेष्वन्यदा नित्यं सपर्यासक्तशक्तिकाम् । एषा चतुर्दशी प्रोक्ता तथा पंचदशीं शृणु ॥२०४॥ भूः शून्यं नभसा भूश्च रसश्चाथ स्थिरांबु च । रयोगिना युतीज्यांबुमरुद्युक्तारखा मरुत् ॥२०५॥ नभश्च महता युक्तं रसा शून्येऽपि संयुते । गोत्रा चरेण सहिता अंबुपूवर्क्षरस्तथा ॥२०६॥ अंब्वग्नी हृच्च दाहांबुरसक्ष्मारयहृत्स्वयुक् । हंसश्च महता दाहः प्राणश्च महतायुतः ॥२०७॥ दाहः साग्निप्राणचरौ ज्यामरुत्सहितारयः । चरेणांबु च गोत्राहृत्साग्निर्ज्या'बुरसा स्वयुक् ॥२०८॥ रयः साग्निर्ज्या'बुरसा पुनरेतेजवो ततः । दाहेनानेन ते द्विः स्याद्ध्रस्वो दाहमरुत्स्वयुक् ॥२०९॥ हंसः सदाहवह्निस्त्रो दाहक्ष्मास्वयुतश्च सः । सप्तदाहास्ततोऽस्याः स्युरष्टमाद्यास्तु पंच ते ॥२१०॥ तथा आठ शाखा वाले चतुरस्र (चौकोर) पीठ बनाकर वहाँ पूर्ववत् अर्चना करे । उस पर अष्टकोण, षोडशदल तथा अष्टदल कमल की रचना कर शक्ति समेत देवी का आवाहन करके सम्यक् उपचारों से उनका पूजन करे । यह युद्ध में तथा वाद-विवाद में विजय देने वाली तेरहवीं देवी का वर्णन किया । अब सर्वमंगला नामक चौदहवीं देवी का वर्णन करूँगा । “हृत् ............”—यह उनका मंत्र है । वह एकाक्षरी देवी कहलाती हैं । उनके मन्त्र सिद्ध हो जाने पर मनुष्य तत्क्षण आकाश में विचरने की क्षमता प्राप्त कर लेता है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त मूल मन्त्र से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर देवी का इस प्रकार ध्यान करे कि उनका वर्ण चांदी के समान धवल है, आभूषण मोती और मणि के हैं, मुकुट मणिमय है, दोनों नेत्र दया से आर्द्र हैं, भुजायें दो हैं, चार द्वार वाले भूगृह में वे अष्टदल, षोडशदल तथा शतदल कमल पर आसीन हैं, दाहिने करकमल में बीजपुर धारण किये हुई हैं, बायें हाथ से अपने भक्तों को धन आदि प्रदान करती हैं, अपने समान शक्तिगणों से परिवेष्टित हैं और छिहत्तर अन्य अप्सराओं से भी युक्त हैं ॥१९४-२०३॥ प्रयोग में तथा अन्य समय भी उक्त शक्तियों के साथ देवी की अर्चना करनी चाहिये । यह चौदहवीं देवी का वर्णन किया । अब पन्द्रहवीं देवी का वर्णन सुनो । “भूः......”—यह उनका मंत्र है । वह ज्वालामालिनी नामक नित्या देवी तिरसठ अक्षरों से युक्त हैं । मूलमंत्र के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम तथा दशम अक्षरों से अंगन्यास करे । आदि से छह कर तथा अंगों में न्यास करे । तदनन्तर शेष अक्षरों से व्यापकन्यास करके सवातनी देवी का इस तरह ध्यान करे कि प्रज्वलित अग्नि के समान उनका वर्ण है, शुभ्र मणि का मुकुट है, छह मुख हैं, बारह भुजायें हैं, वे समस्त आभूषणों से भूषिता हैं, करकमलों में पाश, अंकुश, खड्ग, ढाल, बाण