सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 836, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 836

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५१७ उपांख्याधः स्थितं नीलपताकाया अनंतरम् । त्वरिता त्वं च भेरुंडाष्टमं च नवमं तथा ॥२११॥ सा ज्वालामालिनी नित्या त्रिषष्टचर्णा समीरिता । एकद्वयचतुःपंचचतुष्टयदशाक्षरैः ॥२१२॥ कुर्यादंगानि मूलार्णैरादितः षट्करांगयोः । शेषैस्तु व्यापकं कुर्यात्ततो ध्यायेत्सनातनीम् ॥२१३॥ ज्वलज्ज्वलनसंकाशां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । षड्वक्त्रां द्वादशभुजां सर्वाभरणभूषिताम् ॥२१४॥ पाशांकुशौ खड्गखेटौ चापबाणौ गदादरौ । शूलवह्नी वराभीतौ दधानां करपंकजैः ॥२१५॥ स्वप्रमाणाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । चारुस्मितलसद्वक्त्र सरोजां त्रीक्षणान्विताम् ॥२१६॥ ध्यात्वैवमुपचारैस्तैरर्चयेत्तां तु नित्यशः । चतुरस्रद्वयं कृत्वा चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥२१७॥ सशाखमष्टपत्राब्जमंतरा त्र्यस्रकं ततः । षट्कोणं मध्यतस्त्यस्रं विधायाथ शिवां यजेत् ॥२१८॥ एषा पंचदशी प्रोक्ता षोडशीं शृणु नारद । वायुप्रणवतत्त्वैस्तु चित्रास्पादक्षरद्वया ॥२१९॥ या सिद्धा धनधान्यात्मनिधिलाभाय कल्प्यते । विद्याद्यवायुना कुर्याद्दीर्घस्वरयुजा क्रमात् ॥२२०॥ षडंगानि यथापूर्वं मातृकां विद्यया न्यसेत् । उद्यदादित्यबिंबाभां नवरत्नविभूषणाम् ॥२२१॥ नवरत्नकिरीटां च चित्रपट्टांशुकोज्ज्वलाम् । चतुर्भुजां त्रिनयनां शुचिस्मितलसन्मुखीम् ॥२२२॥ सर्वानंदमयीं नित्यां समस्तेप्सितदायिनीम् । चतुर्भुजेषु वै पाशमंकुशं वरदाभये ॥२२३॥ दधानां मंगलापद्मकर्णिकायोनिमध्यगाम् । तच्छक्तिभिश्च तच्चक्रे तथैवार्चनमीरितम् ॥२२४॥ प्राणदाहौ धरायुक्तौ पुनराद्यं रसे महत् । व्यासं मरुच्छक्तियुतं भूः स्वयुक्ता ततस्त्रयम् ॥२२५॥ अस्या आद्यं रसाक्षुब्धं चरणेन प्रयोजितम् । दाहेन वन्हिशक्तिभ्याम् युतो हंसस्ततः परम् ॥२२६॥ नभो दिहंत्सदाहांबुज्या शून्यं स्वेन संयुतम् । अंबु पश्चाद्विषयुतं मरुता तु नज्ञोयुतम् ॥२२७॥ शून्यं व्याप्तं भुजा हंसः पूर्वोक्त्यो स्यान्मनुत्रयम् । अस्याः षष्ठादिपंचाणां दैत्यास्यादाद्य ईरितः २२८॥ एकादशाक्षरादंत्या द्वितीयः खंड ईरितः । तृतीयः पंचविंशार्णः प्रोक्ता मंत्रा इति क्रमात् ॥२२९॥ बाण, गदा, त्रिशूल, अग्नि, वरास्त्र एवम् अभयास्त्र धारण किये हुई हैं। अपने सदृश शक्तियों से परिवेष्टित रहती हैं, उनका मुखारविन्द मनोहर हास्य से सुशोभित है और नेत्र तीन हैं। इस प्रकार ध्यान करके सकल उप- चारों से उनकी पूजा करे। तदनन्तर चार द्वार वाले भूगृह का निर्माण कर उसके भीतर अष्टदल कमल तथा शाखाओं से युक्त चौकोर तथा षट्कोण पीठ की रचना करे। फिर वहाँ शिवा की अर्चना करे ॥२०४-२१८॥ नारद ! यह पन्द्रहवीं नित्या का वर्णन हुआ। अब सोलहवीं देवी का वर्णन सुनो। वायु और प्रणव तत्त्वों से युक्त चित्रा देवी दो अक्षरों की हैं, जिनकी सिद्धि हो जाने पर धन, धान्य तथा आत्मनिधि का लाभ होता है, दीर्घस्वर युक्त बीजमंत्र से क्रमशः षडंगन्यास तथा मातृकान्यास करना चाहिए। तत्पश्चात् उदयकालीन सूर्यबिंब के समान कान्तिवाली, नौ रत्नों के आभूषण तथा मुकुट धारण करनेवाली, चित्र-पट्ट एवम् शुक्ल वस्त्र धारण करने वाली, चार भुजाओं तथा तीन नेत्रों वाली मन्द मुस्कान से सुशोभित मुखवाली, सबको आनन्द देनेवाली, सकल कामनाओं को पूर्ण करनेवाली, चारों भुजाओं में पाश, अंकुश, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करनेवाली, और पद्मकर्णिका के समान बनी योनिमुद्रा के मध्य में बैठनेवाली मंगलमयी देवी का ध्यान करके शक्तियों समेत उनकी अर्चना करे ॥२१९-२२४॥ तदुपारान्त "प्राण दाहो••••••••", "अस्या'•••••" एवम् "नभः•••• •••" इन तीन मंत्रों से षडंगन्यास करके बिखरे हुए केश वाली, नग्ना, रक्तवर्णा, आनंद स्वरूपिणी तथा हाथों १०३ ना० पु०