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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 840, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 840

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२१ वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् । देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥१९॥ वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् । वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्धादिकेश्वरीम् ॥२०॥ कामपूर्णजकाराख्य सुपीठान्तन्निवासिनीम् । चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥२१॥ एतत्स्तोत्रं तु नित्यानां यः पठेत्सुसमाहितः । पूजादौ तस्य सर्वास्ता वरदाः स्युर्न संशयः ॥२२॥ अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् । येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥२३॥ सर्वतः सर्वदात्मानं ललिता पातु सर्वगा । कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥२४॥ दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा । नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशंमे पातु कौणपीम् ॥२५॥ तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनो । महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥२६॥ वामपार्श्वं सदा पातु इतोभेलांरता ततः । माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धिदायिनी ॥२७॥ पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवताकुलसुंदरी । अधोनीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥२८॥ करोतु मे मंगलांनि सर्वदा सर्वमंगला । देहेंद्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥२९॥ पालयत्वनिशं वित्ता चित्तं मे सर्वदावतु । कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥३०॥ पापान्मां सर्वतः शोकात्संशयात्सर्वतः सदा । असत्यात्क्रूरचिंतातो हिंसातश्चौरतस्तथा ॥३१॥ स्तैमित्याच्च सदा पांतु प्रेरयत्यः शुभं प्रति नित्याः षोडश मां पांतु गजारूढाः स्वशक्तिभिः । तथा हयसमारूढाः पांतु मां सर्वतः सदा ॥३२॥ सिंहारूढास्तथा पांतु पांतु ऋक्षगता अपि । रथारूढाश्च मां पांतु सर्वतः सर्वदा रणे ॥३३॥ उन क्षकाराक्षर रूप वाली, कभी नष्ट न होने वाली, वाम-मार्ग के नाद से चंचल तथा शोभित होने वाली श्रेष्ठ शिवा देवी को प्रणाम करता हूँ। वर्गों के अनुक्रम-योग से जिनके नाम पर उमाष्टक बना है, उन अष्ट वर्ग से उद्भूत महासिद्धि आदि की स्वामिनी की मैं वन्दना करता हूँ। ॥१४-२०॥ कामपूर्ण जकार संज्ञक सुन्दर पीठ के भीतर निवास करने वाली और चार आज्ञाकोशों से युक्त श्री त्रिपुरा को नमस्कार करता हूँ। पूजा के आरम्भ में जो व्यक्ति अत्यन्त सावधानी से नित्याओं के इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे सकल देवियों का वरदान मिलेगा, इसमें संशय नहीं ॥२१-२२॥ इसके उपरान्त देवी के नवरतात्मक कवच को बता रहा हूँ। जिसके पाठ से साधक देवताओं, असुरों, तथा मनुजों पर सदा विजय प्राप्त करता है। कवच-- "सर्वत्र गमन करने वाली ललितादेवी सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। कामेशी अग्रभाग से और भगमाली पृष्ठ भाग से रक्षा करे। नित्यक्लिन्ना मेरे दक्षिण पाश्र्वं तथा पूर्व दिशा की रक्षा करें। भेरुंडा उत्तर दिशा ओर वह्निवासिनी पश्चिम दिशा की रक्षा करें। महावज्रेश्वरी दक्षिण दिशा की रक्षा करें। ललितादेवी सदा मेरे वामपार्श्व की रक्षा करें। सिद्धिदायिनी माहेश्वरी समस्त दिशाओं में मेरी रक्षा करें। कुलसुन्दरी सदा ऊपर से और नीलपताका नीचे से रक्षा करें। विजयादेवी सब ओर से मेरी रक्षा करें। सर्व मंगला सदा मेरा कल्याण करें। ज्वाला- मालिनी देह, इंद्रिय, मन तथा प्राणों की रक्षा करें ॥२३-२९॥ वित्ता सदा मेरे चित्त की रक्षा करें। अपनी शक्तियों समेत गजों पर आरूढ सोलह नित्यादेवियाँ रक्षा करें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, पाप, शोक, क्षय, असत्य, क्रूर चिंता, हिंसा, स्तेय, तथा जड़ता से मुझे बचायें और शुभ कर्मों की प्रेरणा दें। अश्वों पर आरूढ देवियाँ, सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। सिह्मरूढ, ऋक्षारूढ, तथा रथारूढ देवियाँ सदा