बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० नारदीयपुराणम् गुरुस्तोत्रं जपेच्चापि तद्गतेनान्तरात्मना । नमस्ते नाथ भगवञ्छिवाय गुरुरूपिणे ॥४॥ विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह । नवाय नवरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५॥ सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्धनाय ते । स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६॥ परतन्त्राय भक्तानां भव्यानाम् भव्यरूपिणे । विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥७॥ प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे । पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमः कुर्यादुपर्यधः ॥८॥ सदा मच्चित्तसदने विधेहि भवदासनम् । इति स्तुत्वा गुरुं भक्त्या परां देवीं विचिंतयेत् ॥६॥ गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् । देवीं मंत्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥१०॥ प्रणमामि महादेवीं मातृकाम् परमेश्वरीम् । कालहल्लोललोलोहकलानाशनकारिणीम् ॥११॥ यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पद्धंते नरः । रवितार्क्ष्यदुकन्दर्पः शंकरानलविष्णुभिः ॥१२॥ यदक्षरशशिज्योत्स्नामंडितं भुवनत्रयम् । वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥१३॥ यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥१४॥ यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगद्व्यापि दृश्यते ॥१५॥ अकचादिटतोन्नद्धषट्पञ्चाक्षरवणिणीम् । ज्येष्ठांगबाहुहृत्कंठकटिपादनिवासिनीम् ॥१६॥ नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् । प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥१७॥ अद्यापि यस्या जानंति न मनागपि देवताः । केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनामू ॥१८॥
इन वस्तुओं का मनोयोग पूर्वक चिन्तन करे। पश्चात् गुरु में चित्त को लगाकर उनके स्तोत्र का इस प्रकार पाठ करे— "नाथ ! आपको नमस्कार है। भगवन् ! गुरुरूप शिव को नमस्कार है ॥१-४॥ विद्या के अवतारों की सिद्धि के लिये अनेक शरीर धारण करने वाले आपको नमस्कार है। नव, नवरूप और परमार्थैकरूप आपको नमस्कार है। संपूर्ण अज्ञानरूपी तम को नष्ट करने वाले ! भानु, चित् एवम् घनरूप आपको नमस्कार है। भक्तों के परतन्त्र, भव्यों के भव्य रूप, विवेकियां के विवेक रूप, विमर्शियों के विमर्श रूप, प्रकाशकों के प्रकाश रूप और ज्ञानियों के ज्ञानरूप आपके आगे, पीछे, ऊपर, नीचे तथा दोनों पार्श्व भाग से नमस्कार करता हूँ। आप सदा मेरे मानस मन्दिर में आसन जमाइये।" इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुरु की स्तुति कर परा देवी का ध्यान करे— "गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि तथा मातृका पीठ रूपिणी एवम् मंत्रमयी देवी को नमस्कार करता हूँ। परमेश्वरी, मातृका तथा समयापहारी लोह-कला का नाश न करने वाली महादेवी को नमस्कार करता हूँ। जिन देवी के मंत्र के एक अक्षर भी सिद्ध हो जाने पर मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा, कन्दर्प, शंकर, अग्नि तथा विष्णु से प्रतिस्पर्धा करता है तथा जिनके अक्षर से तीनों लोक व्याप्त हैं, उन महाश्री, सिद्धि तथा मातृका रूप सर्वेश्वरी देवी की वंदना करता हूँ ॥५-१३॥ जिनके अक्षर रूप महासूत्र में ब्रह्मांड से लेकर कटाह पर्यन्त तीनों जगत् ओत-प्रोत हैं, उन सिद्धमातृका को प्रणाम करता हूँ। ब्रह्माण्डादि कटाह पर्यन्त जगत् जिनके त्रिकोणोत्पन्न एकादश आधार बीज में समाविष्ट होते हुए आज भी दीखता है, उन देवी की मैं वंदना करता हूँ। अ, क, च, ट, प, य तथा श अक्षरों में और शिर, बाहु, हृदय, कंठ तथा चरणों में निवास करनेवाली देवी को नमस्कार करता हूँ। ईकार अक्षर का उद्धार करनेवाली, सार से भी सार, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, परमानन्द रूपिणी महादेवी को प्रणाम करता हूँ। देवगण जिनके विषय में कुछ भी नहीं जानते हैं अर्थात् वे कौन हैं ? किससे हुईं ? कहाँ हुईं ? क्यों हुईं ? इस मूर्तामूर्त भावना को बिलकुल नहीं जानते