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भारतकोश
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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

२२० नारदीयपुराणम् गुरुस्तोत्रं जपेच्चापि तद्गतेनान्तरात्मना । नमस्ते नाथ भगवञ्छिवाय गुरुरूपिणे ॥४॥ विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह । नवाय नवरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५॥ सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्धनाय ते । स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६॥ परतन्त्राय भक्तानां भव्यानाम् भव्यरूपिणे । विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥७॥ प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे । पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमः कुर्यादुपर्यधः ॥८॥ सदा मच्चित्तसदने विधेहि भवदासनम् । इति स्तुत्वा गुरुं भक्त्या परां देवीं विचिंतयेत् ॥६॥ गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् । देवीं मंत्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥१०॥ प्रणमामि महादेवीं मातृकाम् परमेश्वरीम् । कालहल्लोललोलोहकलानाशनकारिणीम् ॥११॥ यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पद्धंते नरः । रवितार्क्ष्यदुकन्दर्पः शंकरानलविष्णुभिः ॥१२॥ यदक्षरशशिज्योत्स्नामंडितं भुवनत्रयम् । वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥१३॥ यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥१४॥ यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगद्व्यापि दृश्यते ॥१५॥ अकचादिटतोन्नद्धषट्पञ्चाक्षरवणिणीम् । ज्येष्ठांगबाहुहृत्कंठकटिपादनिवासिनीम् ॥१६॥ नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् । प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥१७॥ अद्यापि यस्या जानंति न मनागपि देवताः । केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनामू ॥१८॥

इन वस्तुओं का मनोयोग पूर्वक चिन्तन करे। पश्चात् गुरु में चित्त को लगाकर उनके स्तोत्र का इस प्रकार पाठ करे— "नाथ ! आपको नमस्कार है। भगवन् ! गुरुरूप शिव को नमस्कार है ॥१-४॥ विद्या के अवतारों की सिद्धि के लिये अनेक शरीर धारण करने वाले आपको नमस्कार है। नव, नवरूप और परमार्थैकरूप आपको नमस्कार है। संपूर्ण अज्ञानरूपी तम को नष्ट करने वाले ! भानु, चित् एवम् घनरूप आपको नमस्कार है। भक्तों के परतन्त्र, भव्यों के भव्य रूप, विवेकियां के विवेक रूप, विमर्शियों के विमर्श रूप, प्रकाशकों के प्रकाश रूप और ज्ञानियों के ज्ञानरूप आपके आगे, पीछे, ऊपर, नीचे तथा दोनों पार्श्व भाग से नमस्कार करता हूँ। आप सदा मेरे मानस मन्दिर में आसन जमाइये।" इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुरु की स्तुति कर परा देवी का ध्यान करे— "गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि तथा मातृका पीठ रूपिणी एवम् मंत्रमयी देवी को नमस्कार करता हूँ। परमेश्वरी, मातृका तथा समयापहारी लोह-कला का नाश न करने वाली महादेवी को नमस्कार करता हूँ। जिन देवी के मंत्र के एक अक्षर भी सिद्ध हो जाने पर मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा, कन्दर्प, शंकर, अग्नि तथा विष्णु से प्रतिस्पर्धा करता है तथा जिनके अक्षर से तीनों लोक व्याप्त हैं, उन महाश्री, सिद्धि तथा मातृका रूप सर्वेश्वरी देवी की वंदना करता हूँ ॥५-१३॥ जिनके अक्षर रूप महासूत्र में ब्रह्मांड से लेकर कटाह पर्यन्त तीनों जगत् ओत-प्रोत हैं, उन सिद्धमातृका को प्रणाम करता हूँ। ब्रह्माण्डादि कटाह पर्यन्त जगत् जिनके त्रिकोणोत्पन्न एकादश आधार बीज में समाविष्ट होते हुए आज भी दीखता है, उन देवी की मैं वंदना करता हूँ। अ, क, च, ट, प, य तथा श अक्षरों में और शिर, बाहु, हृदय, कंठ तथा चरणों में निवास करनेवाली देवी को नमस्कार करता हूँ। ईकार अक्षर का उद्धार करनेवाली, सार से भी सार, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, परमानन्द रूपिणी महादेवी को प्रणाम करता हूँ। देवगण जिनके विषय में कुछ भी नहीं जानते हैं अर्थात् वे कौन हैं ? किससे हुईं ? कहाँ हुईं ? क्यों हुईं ? इस मूर्तामूर्त भावना को बिलकुल नहीं जानते

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२१ वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् । देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥१९॥ वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् । वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्धादिकेश्वरीम् ॥२०॥ कामपूर्णजकाराख्य सुपीठान्तन्निवासिनीम् । चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥२१॥ एतत्स्तोत्रं तु नित्यानां यः पठेत्सुसमाहितः । पूजादौ तस्य सर्वास्ता वरदाः स्युर्न संशयः ॥२२॥ अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् । येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥२३॥ सर्वतः सर्वदात्मानं ललिता पातु सर्वगा । कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥२४॥ दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा । नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशंमे पातु कौणपीम् ॥२५॥ तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनो । महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥२६॥ वामपार्श्वं सदा पातु इतोभेलांरता ततः । माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धिदायिनी ॥२७॥ पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवताकुलसुंदरी । अधोनीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥२८॥ करोतु मे मंगलांनि सर्वदा सर्वमंगला । देहेंद्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥२९॥ पालयत्वनिशं वित्ता चित्तं मे सर्वदावतु । कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥३०॥ पापान्मां सर्वतः शोकात्संशयात्सर्वतः सदा । असत्यात्क्रूरचिंतातो हिंसातश्चौरतस्तथा ॥३१॥ स्तैमित्याच्च सदा पांतु प्रेरयत्यः शुभं प्रति नित्याः षोडश मां पांतु गजारूढाः स्वशक्तिभिः । तथा हयसमारूढाः पांतु मां सर्वतः सदा ॥३२॥ सिंहारूढास्तथा पांतु पांतु ऋक्षगता अपि । रथारूढाश्च मां पांतु सर्वतः सर्वदा रणे ॥३३॥ उन क्षकाराक्षर रूप वाली, कभी नष्ट न होने वाली, वाम-मार्ग के नाद से चंचल तथा शोभित होने वाली श्रेष्ठ शिवा देवी को प्रणाम करता हूँ। वर्गों के अनुक्रम-योग से जिनके नाम पर उमाष्टक बना है, उन अष्ट वर्ग से उद्भूत महासिद्धि आदि की स्वामिनी की मैं वन्दना करता हूँ। ॥१४-२०॥ कामपूर्ण जकार संज्ञक सुन्दर पीठ के भीतर निवास करने वाली और चार आज्ञाकोशों से युक्त श्री त्रिपुरा को नमस्कार करता हूँ। पूजा के आरम्भ में जो व्यक्ति अत्यन्त सावधानी से नित्याओं के इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे सकल देवियों का वरदान मिलेगा, इसमें संशय नहीं ॥२१-२२॥ इसके उपरान्त देवी के नवरतात्मक कवच को बता रहा हूँ। जिसके पाठ से साधक देवताओं, असुरों, तथा मनुजों पर सदा विजय प्राप्त करता है। कवच-- "सर्वत्र गमन करने वाली ललितादेवी सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। कामेशी अग्रभाग से और भगमाली पृष्ठ भाग से रक्षा करे। नित्यक्लिन्ना मेरे दक्षिण पाश्र्वं तथा पूर्व दिशा की रक्षा करें। भेरुंडा उत्तर दिशा ओर वह्निवासिनी पश्चिम दिशा की रक्षा करें। महावज्रेश्वरी दक्षिण दिशा की रक्षा करें। ललितादेवी सदा मेरे वामपार्श्व की रक्षा करें। सिद्धिदायिनी माहेश्वरी समस्त दिशाओं में मेरी रक्षा करें। कुलसुन्दरी सदा ऊपर से और नीलपताका नीचे से रक्षा करें। विजयादेवी सब ओर से मेरी रक्षा करें। सर्व मंगला सदा मेरा कल्याण करें। ज्वाला- मालिनी देह, इंद्रिय, मन तथा प्राणों की रक्षा करें ॥२३-२९॥ वित्ता सदा मेरे चित्त की रक्षा करें। अपनी शक्तियों समेत गजों पर आरूढ सोलह नित्यादेवियाँ रक्षा करें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, पाप, शोक, क्षय, असत्य, क्रूर चिंता, हिंसा, स्तेय, तथा जड़ता से मुझे बचायें और शुभ कर्मों की प्रेरणा दें। अश्वों पर आरूढ देवियाँ, सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। सिह्मरूढ, ऋक्षारूढ, तथा रथारूढ देवियाँ सदा

६२२ नारदीयपुराणम् तार्क्ष्यारूढाश्च मां पांतु तथा व्योमगताश्च ताः । भूतगाः सर्वगाः पान्तु पान्तु देव्यश्च सर्वदा ॥३४॥ भूतप्रेतापिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् । द्रावयंतु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥३५॥ गजाश्वद्वीपिपंचास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः । असंख्‍याः शक्तयो देव्यः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥३६॥ सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् । कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानंदमास्थितः ॥३७॥ इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् । यस्य संधारणात्मर्त्यो निर्भयो विजयो सुखी ॥३८॥ अथ नाम्नां सहस्रं ते वक्ष्ये सावरणार्चनम् । षोडशानामपि मुने स्वस्वक्रमगतात्मकम् ॥३६॥ ललिता चापि वा कामेश्वरी च भगमालिनी । नित्यक्लिन्ना च भेरुंडा कीर्तिता वह्निवासिनी ॥४०॥ वज्रेश्वरी तथा दूती त्वरिता कुलसुंदरी । नित्या संवित्त्था नीलपताका विजयाह्वया ॥४१॥ सर्वमंगळिका चापि ज्वालामालिनिसंज्ञिता । चित्रा चेति क्रमान्नित्याः षोडशापीष्टविग्रहाः ॥४२॥ कुरुकुल्ला च वाराही द्वे एते चेष्टविग्रहे । वशिनी चापि कामेशी मोहिनी विमलारुणा ॥४३॥ तपिनी च तथा सर्वेश्वरी चाध्यक्ष कौलिनी । मुद्राणंतनुरिष्वर्णरूपा चापार्णविग्रहा ॥४४॥ पाशवर्णशरीरा चाकुर्वर्णमुखपुंदरा । त्रिखंडा स्थापनी सन्निरोधनी चावगुंठनी ॥४५॥ सन्निधानेषु चापाख्या तथा पाशांकुशाभिधा । नमस्कृतिस्तथा संक्षोभणी विद्रावणी तथा ॥४६॥ आकर्षणी च विख्याता तथै वावेशकारिणी । उन्मादिनी महापूर्वा कुशाथो खेचरी मता ॥४७॥ बीजा शक्त्युत्थापना च स्थूलसूक्ष्मपरामिधा । अणिमा लघिमा चैव महिमा गरिमा तथा ॥४८॥ प्राप्तिः प्रकाम्यता चापि चेशिता वशिता तथा । भुक्तिः सिद्धिस्तथैवेच्छा सिद्धिरूपा च कीर्तिता ॥४९॥ ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराहींद्राणी चामुंडा महालक्ष्मीस्वरूपिणी ॥५०॥ मेरी रक्षा करें। गरुड़ पर आसीन देवियां सदा मेरो रक्षा करें। आकाशगामिनी, भूतगामिनी तथा सर्वगामिनी देवियां सर्वदा मेरी रक्षा करें। तथा अपनी शक्तियों के आयुधों से भूत, प्रेत, पिशाच, कृत्या आदिकों का संहार करें। गज, अश्व, व्याघ्र, सिंह तथा गरुड़ पर आरूढ एवम् अखिल आयुधों से युक्त असंख्य शक्ति देवियां सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें ॥३०-३६॥ जो मानव प्रातःकाल तथा सायंकाल इस सर्वरक्षक नित्याकवच का पाठ करता है, वह सर्वदा आनंद को प्राप्त करता है, अशुभ को तो कभी देखता ही नहीं। यह ललिता का मुख- दायक कवच मैंने तुम्हें सुना दिया। जो मनुष्य इसको धारण करेगा, वह निर्भय, विजयी तथा सुखी होगा ॥३७-३८॥ मुने ! अब इसके बाद सोलह नित्याओं के सहस्र नामों को क्रमशः अर्चनविधि पूर्वक बताऊंगा- 'ललिता, कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ना, भेरुंडा, वह्निवासिनी, वज्रेश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, संवित्, नीलपताका, विजया, सर्वमंगळिका, ज्वालामालिनी तथा चित्रा-ये सोलहों नित्यायै इष्टांवग्रहा कहलाती हैं। कुरुकुल्ला तथा वाराही ये दोनों भी इष्टविग्रहा हैं। वशिनी, कामेशी, मोहिनी, विमला, अरुणा, तपिनी, सर्वेश्वरी, कौलिनी, मुद्रातनु, इषूवर्णरूपां, चापवर्णविग्रहा, पाशवर्णशरीरा, चातुवर्णं देहा (?), त्रिखंडा, स्थापनी, सन्निरोधनी, अवगुण्ठनी, समीपेष्वापा, पाशांकुशा, मनस्कृति, संक्षोभणी, विद्रावणी, आकर्षणी, आवेश- कारिणी, उन्मादिनी, महापूर्वा, कुशा, खेचरी, बीजा, शक्त्युत्थापना, स्थूलसूक्ष्मपरा, अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्रकाम्यता, ईशिता, वशिता, भुक्ति, सिद्धि, इच्छासिद्धि, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, महालक्ष्मीस्वरूपिणी, कामा, बुद्धि, अहंकार-शब्द-स्पर्श-स्वरूपिणी, रूपरूपा, रसा,

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२३ कामा बुद्धिरहंकारशब्दस्पर्शस्वरूपिणी । रूपरूपा रसाह्ला च गंधवित्तधृतिस्तथा ॥५१॥ नाभीबीजामृताख्या च स्मृतिदेहात्मरूपिणी । कुसुमा मेखला चापि मदना मदनातुरा ॥५२॥ रेखा संवेगिनी चैव ह्यङ्कुशा मालिनीति च । संशोभिणी तथा विद्राविण्याकर्षणरूपिणी ॥५३॥ आह्लादिनीति च प्रोक्ता तथा संमोहिनीति च । स्तंभिनी जंभिनी चैव वशंकर्यथ रंजिनी ॥५४॥ उन्मादिनी तथैवार्थसाधिनीति प्रकीर्तिता । संपत्तिपूर्णा सा मंत्रमयी द्वंद्वक्षयंकरी ॥५५॥ सिद्धिः संपत्प्रदा चैव प्रियमंगलकारिणी । कामप्रदा निगदिता तथा दुःखविमोचिनी ॥५६॥ मृत्युप्रशमनी चैव तथा विघ्ननिवारिणी । अंगसुंदरिका चैव तथा सौभाग्यदायिनी ॥५७॥ ज्ञानेश्वर्यप्रदा ज्ञानमयी चैव च पंचमी । विंध्यवासनका घोरस्वरूपा पापहारीणी ॥५८॥ तथानंदमयी रक्षा रूपेप्सितफलप्रदा । जयिनी विमला चाथ कामेशी वज्रिणी भगा ॥५९॥ त्रैलोक्यमोहना स्थाना सर्वाशापरिपूरणी । सर्वसंक्षोभणगता सौभाग्यप्रदसंस्थिता ॥६०॥ सर्वार्थसाधकागारा सर्वरोगहरास्थिता । सर्वरक्षाकरास्थाना सर्वसिद्धिप्रदस्थिता ॥६१॥ सर्वानंदमयाधारबिंदुस्थानशिवात्मिका । प्रकृष्टा च तथा गुप्ता ज्ञेया गुप्ततरापि च ॥६२॥ संप्रदायस्वरूपा च कुलकौलनिनिर्गभा । रहस्यापरावरप्राकृत्यैवातिरहस्यका ॥६३॥ त्रिपुरा त्रिपुरेशी च तथैव पुरवासिनी । श्रीमालिनी च सिद्धान्ता महात्रिपुरसुंदरी ॥६४॥ नवरत्नमयद्वीपपवखंडविराजिता । कल्पकोद्यानसंस्था च ऋतुरूषेंद्रियार्चका ॥६५॥ कालमुद्रा मातृकाख्या रत्नदेशोपदेशिका । तत्त्वाग्रहाभिधा मूर्तिस्तथैव विषयद्विपा ॥६६॥ देशकालाकारशब्दरूपा संगीतयोगिनी । समस्तगुप्तप्रकटसिद्धयोगिनिचक्रयुक् ॥६७॥ वह्निसूर्येन्दुभूताह्ला तथात्माष्टाक्षराह्वया । पंचधाचार्यस्वरूपा च नानाव्रतसमाह्वया ॥६८॥ निषिद्धाचाररहिता सिद्धचिह्नस्वरूपिणी । चतुर्द्धा कूर्मभागस्था नित्यार्चास्वरूपिणी ॥६९॥ गंधवित्तधृति, नाभीबीजा, अमृता, स्मृतिदेहा, आत्मरूपिणी, कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, संवे- गिनी, अंकुशा, मालिनी, संक्षोभिणी, विद्राविणी ।।४९ ५३।। आकर्षणरूपिणी, आह्लादिनी, संमोहिनी, स्तंभिनी, जंभिनी, वशंकरी, रंजिनी, ।।५४।। उन्मादिनी, अर्थसाधिनी, संपत्तिपूर्णा, मंत्रमयी, द्वन्द्वक्षयकरी ।।५५।। सिद्धि, संपत्प्रदा, प्रियमंगलकारिणी, कामप्रदा, निगदिता, दुःखविमोचिनी, ।।५६।। मृत्युप्रशमनी, विघ्ननिवारिणी, अंगसुन्दरिका, सौभाग्यदायिनी, ।।५७।। ज्ञानेश्वर्यप्रदा, ज्ञानमयी, पंचमी, विंध्यवासनका, घोरस्वरूपा, पाप- हारिणी, ।।५८।। आनन्दमयी, रक्षारूपा, ईप्सितफलप्रदा, जयिनी, विमला, कामेशी, वज्रिणी, भगा, ।।५९।। त्रैलोक्यमोहनी, स्थाना, निखिल-आशा-परिपूरिणी, सबको संक्षुब्ध करने वाली, सौभाग्य-प्रद-संस्थिता ।।६०।। समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली, अखिल रोगों का नाश करने वाली, सब की रक्षा करने वाली, सकल सिद्धियों को देने वाली, सर्वानन्दमया, मूलाधार और बिन्दु की स्थान, शिवालिका, प्रकृष्टा, गुप्ता, ज्ञेया, गुप्ततरा, संप्रदायस्वरूपा, कौलकुलगर्भगामिनी, रहस्यरूपा, परात्परा, अतिरहस्यका, ।।६१-६३।। त्रिपुरा, त्रिपुरेशी, पुरवासिनी, श्रीमालिनी, सिद्धान्ता, महात्रिपुरसुन्दरी, नवरत्नमय, द्वीपों तथा नवखण्डों में रहनेवाली, कल्पसूपी उद्यान में रहनेवाली, ऋतुरूप इन्द्रियों से पूजित होने वाली, काल-मुद्रारूपिणी, मातृकारूपिणी, रत्न- देशोपदेशिका, तत्त्वा, ग्रहसंज्ञका, मूर्ति, विषयद्विपा, देश-काल-आकार-शब्द-रूपा, संगीतयोगिनी, समस्त गुप्त एवम् प्रकट सिद्धचक्र तथा योगिनी चक्र की अधिष्ठात्री, वह्नि, सूर्य चन्द्र तथा महाभूत कहलाने वाली,

८२४ नारदीयपुराणम् ।॥७०॥ दमनादित्रयभ्यर्चा षट्कर्मसिद्धिदायिनी । तिथिवारपृथग्द्रव्यसमर्चनशुभावहा ॥७१॥ वायोश्वानंगकुसुमा तथैवानंगमेखला । अनंगमदनानंगमदनातुरासाह्वया ॥७२॥ मददेविर्निका चैव तथा भुवनपालिनी । शशिलेखा समुद्दिष्टा गतिलेखाह्वया मता ॥७३॥ श्रद्धा प्रीती रतिश्चैव धृतिः कांतिर्मनोरमा । मनोहरा समाख्याता तथैव हि मनोरथा ॥७४॥ मदनोन्मादिनी चैव मोदिनी शंखिनी तथा । शोषिणी चैव शंकरी सिजिनी सुभगा तथा ॥७५॥ पुषाचैद्वासुमनसा रतिः प्रीतिधृतिस्तथा । ऋद्धिः सौम्या मरीचिश्व तथैव ह्यंशुमालिनी ॥७६॥ शशिनी चांगिरा छाया तथा संपूर्णमंडला । तुष्टिस्तथामृताख्या च डाकिनी साथ लोकपा ॥७७॥ बटुकेभास्वरूपा च दुर्गा क्षेत्रेशरूपिणी । कामराजस्वरूपा च तथा मन्मथरूपिणी ॥७७॥ कंदर्परूपिणी चैव तथा मकरकेतना । मनोभावस्वरूपा च भारती वर्णरूपिणी ॥७८॥ मदना मोहिनी लोला जंभिनी चोद्यमा शुभा । ह्लादिनी द्राविणी प्रोती रती रक्ता मनोरमा ॥७६॥ सर्वोन्मादा सर्वमुखा ह्यभंगा चामितोद्यमा । अनल्पाव्यक्तविभवा विविधाक्षोभविग्रहा ॥८०॥ रागशक्तिद्वेषशक्तिस्तथा शब्दादिरूपिणी । नित्या निरंजना विलिन्ना क्लेदिनी मदनातुरा ॥८१॥ मदद्रवा द्राविणी च द्रविणी चेति कीर्तिता । मदा विला मंगला च मन्मथानी मनस्विनी ॥८२॥ मोहा मोदा मानमयी माया मंदा मितावती । विजया विमला चैव शुभा विश्वा तथैव च ॥८३॥ विभूतिर्बिनता चैव विविधा विनता क्रमात् । कमला कामिनी चैव किराता कीर्तिरूपिणी ॥८४॥ कुट्टिनी च समुद्दिष्टा तथैव कुलसुंदरी । कल्याणी कालकोला च डाकिनी शाकिनी तथा ॥८५॥ लाकिनी काकिनी चैव राकिनी काकिनी तथा । इच्छाज्ञाना क्रियाख्या चाप्यायुधाष्टकधारिणी ॥८६॥ कपर्दिनी समुद्दिष्टा तथैव कुलसुंदरी । ज्वालिनी विस्फुलिंगा च मंगला सुमनोहरा ॥८७॥ आत्मरूपिणी, अष्टाक्षर कहलानेवाली, पंचपूजनस्वरूपा, अनेक व्रतों वाली, निषिद्ध आचरण से रहिता, सिद्धचिह्नस्वरूपा, चार प्रकार से कर्म-भोगों में अवस्थिता नित्य आदि की पूजा स्वरूपा, दमना आदि को अर्चा- रूपा, छह कर्मों को सिद्धि प्रदान करनेवाली, तिथि, दिन, द्रव्य, पूजन तथा मंगलरूपा, वायोश्वो, अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, मददेविर्निका, भुवनपालिनी, शशिलेखा, गतिलेखा, श्रद्धाप्रीति, रति, धृति, कांति, मनोरमा, मनोहरा, मनोरथा ॥६३-७३॥ मदनोन्मादिनी, मोदिनी, शंखिनी, शोषिणी, शंकरी, सिजिनी, सुभगा, पूषा, वासुमनसा, रति, प्रीति, धृति, ऋद्धि, सौम्या, मरीचि, अंशुमालिनी, शशिनो, आंगरा, छाया, संपूर्णमंडला, तुष्टि, अमृता, डाकिनी, लोकपा, बटुका, भास्वरूपा, दुर्गा, क्षेत्रेशरूपिणी, कामराजस्वरूपा, मन्मथरूपिणी, कंदर्परूपिणी, मकरकेतना, मनो- भवस्वरूपा, भारती, वर्णरूपिणी ॥७४-७८॥ मदना, मोहिनी, लोला, जंभिनी, उद्यमा, शुभा, ह्लादिनी, द्राविणी, प्रीति, रति, रक्ता, मनोरमा, सर्वोन्मादा, सर्वमुखा, अभंगा, अमितोद्यमा, अनल्पा, तथा अव्यक्त विभव वाली, विविधा, क्षोभविग्रहा, रागशक्ति, द्वेषशक्ति, शब्दादिरूपिणी, नित्या निरंजना, क्लिन्ना, क्लेदिनी, मदना- तुरा, मदद्रवा, द्राविणी, द्रविणी, मदाविला, मंगला, मन्मथानी, मनस्विनी, मोहा, मोदा, मानमयी, माया, मंदा, मितावती, विजया, विमला, शुभा, विश्वा, विभूति, विनता, कमला, कामिनी, किराता, कीर्तिरूपिणी, कुट्टिनी, कुलसुन्दरी, कल्याणी, कालकोला, डाकिनी, शाकिनी, लाकिनी, काकिनी, राकिनी, इच्छा, ज्ञान एवंम् क्रिया- रूपा, अष्टायुधधारिणी, कपर्दिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिंगा, मंगला, सुमनोहरा, कनका, विनवा, विद्या, मेधा,

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२५ कनका क्लिन्नना विद्या विविधा च प्रकीर्तिता । मेषा वृषाह्वया चैव मिथुना कर्कटा तथा ॥८८॥ सिंहा कन्या तुला कीटा चापा च मकरा तथा । कुम्भा मीना च सारा च सर्वभक्षा तथैव च ॥८९॥ विश्वात्मा विविधोद्भूतचित्ररूपा च कीर्तिता । निःसपत्ना निरांतंका याचनाचित्यवैभवा ॥९०॥ रक्ता चैव ततः प्रोक्ता विद्याप्राप्तिस्वरूपिणी । हृल्लेखा क्लेदिनी क्लिन्ना क्षोभिणो मदनातुरा ॥९१॥ निरंजना रागवती तथैव मदनावती । मेखला द्राविणी वेगवती चैव प्रकीर्तिता ॥९२॥ कमला कामिनी कल्पा कला च कलिताद्भुता । किराता च तथा काला कदना कौशिका तथा ॥९३॥ कंबुवादनिका चैव कातरा कपटा तथा । कीर्तिश्चापि कुमारी च कुंकुमा परिकीर्तिता ॥९४॥ भञ्जिनी वेगिनी नागा चपला पेशला सती । रतिः श्रद्धा भोगलोला मदोन्मत्ता मनस्विनी ॥९५॥ विह्वला कर्षिणी लोला तथा मदनमालिनी । विनोदा कौतुका पुण्या पुराणा परिकीर्तिता ॥९६॥ वागीशी वरदा विश्वा विभवा विघ्नकारिणी । बोजविघ्नहरा विद्या सुमुखी सुंदरी तथा ॥९७॥ सारा च सुमना चैव तथा प्रोक्ता सरस्वती । समया सर्वगा विद्या शिवा वाणी च कीर्तिता ॥९८॥ दूरसिद्धा तथा प्रोक्तार्थो विग्रहवती मता । नादा मनोन्मनी प्राणप्रतिष्ठारुणवैभवा ॥९९॥ प्राणापाना समाना च व्यानोदाना च कीर्तिता । नागा कूर्मा च कृकला देवदत्ता धनञ्जया ॥१००॥ फट्‍कारी किंकराराध्या जया च विजया तथा । हुंकारी खेचरी चंडा छेदिनी क्षपिणी तथा ॥१०१॥ स्त्रीहुंकारी क्षेमकारी चतुरक्षररूपिणी । श्रीविद्यामत्तवर्णांगी काली याम्या नृपर्णका ॥१०२॥ भाषा सरस्वती वाणी संस्कृता प्राकृता परा । बहुरूपा चित्तरूपा रम्यानंदा च कौतुका ॥१०३॥ त्रयाख्या परमात्मारूयाप्यमेयविभवा तथा । वाक्स्वरूपा बिंदुसर्गरूपा विश्वात्मिका तथा ॥१०४॥ वृषा, मिथुना, कर्कटा, सिंहा, कन्या, तुला, कीटा, चापा, मकरा, कुम्भा, मीना, सारा, सर्वभक्षा, विश्वात्मा, विविधोद्भूतचित्ररूपा, निःसपत्ना, निरांतका, याचना, अर्चित्यवैभवा ॥७६-९०॥ रक्ता, विद्याप्राप्तिस्वरूपिणी, हृल्लेखा, क्लेदिनी, क्लिन्ना, क्षोभिणी, निरंजना, रागवती, मदनावती, मेखला, वेगवती, कमला, कामिनी, कल्पा, कला, कलिता, अद्भुता, किराता, काला, कदना, कोशिका, कंबुवादनिका; कातरा, कपटा, कीर्ति, कुमारी, कुंकुमा, भञ्जिनी, वेगिनी, नागा, चपला, पेशला, सती, रति, श्रद्धा, भोग- लोला, मदोन्मत्ता, विह्वला, कषिणी, लील।, मदनमालिनी, विनोदा, कौतुका, पुण्या, पुराणा, वागीशी, वरदा, विश्वा, विभवा, विघ्नकारिणी, बीजविघ्नहरा, विद्या, सुमुखी, सुन्दरी, सारा, सुमना, सरस्वती, समया, सर्वगा, विद्या, शिवा, वाणी, दूरसिद्धा, विग्रहवती, नादा, मनोन्मनी, प्राणप्रतिष्ठा, अरुणवैभवा; प्राणा, अपाना, समाना, व्याना, उदाना, नागा, कूर्मा, कृकला, देवदत्ता, धनञ्जया ॥९१-१००॥ फट्‍कारी, किंकराराध्या, जया, विजया, हुंकारी, खेचरी, चंडा, छेदिनी, क्षपिणी, स्त्रीहुंकारी, क्षेम- कारी चतुरक्षररूपिणी, श्रीविद्या, श्रेष्ठवर्णांगी, काली, याम्या, नृपर्णका, भाषा, सरस्वती, वाणी, संस्कृता, प्राकृता, परा, बहुरूपा, चित्तरूपा, रम्या, आनन्दा, कौतुका, त्रयाख्या, परमात्मारूपा, अमेयविभवा, वाक्स्वरूपा, बिंदु सर्गरूपा, विश्वात्मिका, त्रैपुरकंदा, ज्ञात्रादित्रिविधात्मिका, आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, भोग, सौंदर्य तथा आरोग्य देने वाली, ऐहिक तथा पारलौकिक ज्ञानमयो, जीवा, विजया, विश्वविन्मयी ॥१०१-१०६॥ हृदादिविद्या, १०४-ना० पु०

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८२६ नारदीयपुराणम् तथा वैपुरकंदाख्या ज्ञात्रादिविविधात्मिका । आयुर्लक्ष्मीकीर्तिभोगसौंदर्यारोग्यदायिका ॥१०५॥ ऐहिकामुष्मिकज्ञानमयी च परिकीर्तिता । जीवाख्या विजयाख्या च तथैव विश्वविन्मयी ॥१०६॥ हृदादिविद्या रूपादिभानुरूपाः जगद्वपुः । विश्वमोहनिका चैव त्रिपुरामृतसंज्ञिका ॥१०७॥ सर्वाप्यायनरूपा च मोहिनी क्षोभणी तथा । क्लेदिनो चापि षट्कूटा पंचकूटा विशुद्धगा ॥१०८॥ संपत्करी हलक्षार्णा सीमामातृतनु रतिः । प्रीतिर्मनोभवा वापि प्रोक्ता वाराधिपा तथा ॥१०९॥ विकटा चापि षट्कूटा पंचकूटा विशुद्धगा । अनाहतगता चैव मणिपूरकसंस्थिता ॥११०॥ स्वाधिष्ठानसमासीनाधारस्थाज्ञासमास्थिता । षट्त्रिंशत्कूटरूपा च पंचाशन्मिथुनात्मिका ॥१११॥ पादुकादिकसिद्धीशा तथा विजयदायिनी । कामरूपप्रदा वेतालरूपा च पिशाचिका ॥११२॥ विचित्रा विभ्रमा हंसी भीषणी जनरंजिका । विशाला मदना तुष्टा कालकंठी महाभया ॥११३॥ माहेंद्री शंखिनी चैंद्री मंगला वटवासिनी । मेखला सकला लक्ष्मीर्मालिनी विश्वनायिका ॥११४॥ सुलोचना सुशोभा च कामदा च विलासिनी । कामेश्वरी नंदिनी च स्वर्णरेखा मनोहरा ॥११५॥ प्रमोदा रागिणी सिद्धा पद्मिनी च रतिप्रिया । कल्याणदा कलादक्षा ततश्च सुरसुन्दरी ॥११६॥ विभ्रमा वाहका वीरा विकला कोरका कविः । सिंहनादा महानादा सुग्रीवा मर्कटा शठा ॥११७॥ विडालाक्षा विडालास्या कुमारी खेचरी भवा । मयूरा मंगला भीमा द्विपवक्त्रा खरानना ॥११८॥ मातंगी च निशाचारा वृषग्राहा वृकानना । सैरिभास्या गजमुखा पशुवक्त्रा मृगानना ॥११९॥ क्षोभका मणिभद्रा च क्रीडका सिंहचक्रका । महोदरा स्थूलशिखा विकृतास्या वरानना ॥१२०॥ चपला कुक्कुटास्या च पाविनी मदनालसा । मनोहरा दीर्घजंघा स्थूलदन्ता दशानना ॥१२१॥ सुमुखा पंडिता क्रुद्धा वराहास्या सटामुखा । कपटा कौतुका काला किंकरा कितवा खला ॥१२२॥ भक्षका भयदा सिद्धा सर्वांगा च प्रकीर्तिता । जया च विजया दुर्गा भद्रा भद्रकरी तथा ॥१२३॥


रूपादिभानुरूपा, जगद्वपु, विश्वमोहनिका, त्रिपुरामृतसंज्ञिका, सबको संवर्धित करनेवाली, मोहिनी, क्षोभिणी, क्लेदिनी, महोदया, संपत्करी, ह, ल एवम् क्ष वर्णों वाली, सीमा, मातृतनु, रति, प्रीति, मनोभवा, वाराधिपा, त्रिकूटा, षट्कूटा, पंचकूटा, विशुद्धगा, अनाहत चक्र में जानेवाली, मणिपूरक में संस्थित होनेवाली, अपने अधि- ष्ठान में संस्थित होने वाली, अपने आंष्ठान में आसोन होने वाली, आधार चक्र तथा आज्ञा चक्र में आस्थित होने वाली, छत्तीस कूटवाली, पचास मिथुन वाली, पादुका आदि सिद्धियों की ईश्वरी, विजयदायिनी, कामरूपप्रदा, बेतालरूपा, पिशाचिका, विचित्रा, विभ्रमा, हंसी, भीषणी, जनरंजिका, विशाला, मदना, तुष्टा, कालकंठी, महाभया, ॥१०७-११३॥ माहेंद्री, शंखिनी, ऐंद्री, मंगला, वटवासिनी, मेखला, सकला, लक्ष्मा, मालिनी, विश्व- नायिका, सुलोचना, सुशोभा, कामदा, विलासिनी, कामेश्वरी, नंदिनी, स्वर्णरेखा, मनोहरा, प्रमोदा, रागिणी सिद्धा, पद्मिनी, रतिप्रिया, कल्याणदा, कलादक्षा, सुरसुन्दरी, विभ्रमा, वाहका, वीरा, विकला, कोरका, कवि, सिंहनादा, महानादा, सुग्रीवा, मर्कटा, शठा, बिडालाक्षा, बिडालास्या, कुमारा, खेचरी, भवा, मयूरा, मंगला, भीमा, व्याघ्रमुखा, खरानना, मातंगी, निशाचरा, वृषग्राहा, वृकानना, महिषानना, गजमुखा, पशुवक्त्रा, मृगानना, क्षोभका, मणिभद्रा, क्रीडका, सिंहचक्रका, महोदरा, स्थूलशिखा, विकृतास्या, वरानना ॥११४-१२०॥ चपला, कुक्कुटास्या, पावती, मदनालसा, मनोहरा, दीर्घजंघा, स्थूलदन्ता, दशानना, सुमुखा, पंडिता, क्रुद्धा, वाराहास्या, जटामुखा, कपटा, कौतुका, काला, किंकरा, कितवा, खला, भक्षका, भयदा, सिद्ध, सर्वांगा, जया

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२७ अम्बिका वामदेवी च महामायास्वरूपिणी । विदारिका विश्वमयी विश्वा विश्वविभंजिता ॥१२४॥ वीरा विक्षोभिणी विद्या विनोदा बाजविग्रहा । वीतशोका विषग्रीवा विपुला विजयप्रदा ॥१२५॥ विभवा विविधा विप्रा तथैव परिकीर्तिता । मनोहरा मंगला च मदोत्सिक्ता मनस्विनी ॥१२६॥ मानिनी मधुरा माया मोहिनी च तथा स्मृता । भद्रा भवानी भव्या च विशालाक्षी शुचिस्मिता ॥१२७॥ ककुभा कमला कल्पा कलाथो पूरणी तथा । नित्या चाप्यमृता चैव जीविता च तथा दया ॥१२८॥ अशोका ह्यमला पूर्णा पूर्णा भाग्योद्यता तथा । विवेका विभवा विश्वा वितता च प्रकीर्तिता ॥१२९॥ कामिनी खेचरी गर्वा पुराणा परमेश्वरी । गौरी शिवा ह्यमेया च विमला विजया परा ॥१३०॥ पवित्रा पद्मिनी विद्या विश्वेशी शिववल्लभा । अशेषरूपा ह्यानंदांबुजाक्षी चाप्यनिंदिता ॥१३१॥ वरदा वाक्यदा वाणी विविधा वेदविग्रहा । विद्या वागीश्वरी सत्या संयता च सरस्वती ॥१३२॥ निर्मलानन्दरूपा च ह्यमृता मानदा तथा । पूषा चैव तथा पुष्टिरतुष्टिश्चापि रतिधृतिः ॥१३३॥ शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । पूर्णा पूर्णामृता कामदायिनीन्दुकलात्मिका ॥१३४॥ तपिनी तापिनी धूम्रा मरीचिज्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बाधिनी धारिणी क्षमा ॥१३५॥ धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिंगिनी । सश्रीः स्वरूपा कपिला हव्यकव्यवहा तथा ॥१३६॥ घस्मरा विश्वकवला लोलाक्षी लोलजिह्विका । सर्वभक्षा सहस्राक्षी निःसंगा च गतिप्रिया ॥१३७॥ अचिंत्याचापमेया च पूर्णरूपा दुरासदा । सर्वा संसिद्धिरूपा च पावनोत्येकरूपिणी ॥१३८॥ तथा यामलवेधाख्या शाक्ते वेदस्वरूपिणी । तथा शांभववेधा च भावनासिद्धिसूचिनी ॥१३९॥ वह्निरूपा तथा दक्षा ह्यमा विघ्ना भुजंगमा । षण्मुखा रविरूपा च माता दुर्गा दिशा तथा ॥१४०॥ विभवा, दुर्गा, भद्रा, भद्रकरी, अंबिका, वामदेवी, महामायास्वरूपिणी, विदारिका, विश्वमयी, विश्वा, विश्वविभंजिता, वीरा, विक्षोभिणी, विद्या, विनोदा, बीजविग्रहा, वीतशोका, विषग्रीवा, विपुला, विजयप्रदा, विभवा, विविधा, विप्रा, मनोहरा, मंगला, मदोत्सिक्ता, मनस्विनी ॥१२१-१२६॥ मानिनी, मधुरा, माया, मोहिनी, भद्रा, भवानी, भव्या, विशालाक्षी, शुचिस्मिता, ककुभा, कमला, कल्पा, कला, पूरणी, नित्या, अमृता, जीविता, दया, अशोका, अमला, पूर्णा, भाग्योद्यता, विवेका, विभवा, विश्वा, वितता, कामिनी, खेचरी, गर्वा, पुराणा, परमेश्वरी, गोरी, शिवा, अमेया, विमला, विजया, परा, पवित्रा, पद्मिनी, विद्या, विश्वेशी, शिववल्लभा, अशेषरूपा, आनन्दांबुजाक्षी, अनिंदिता, वरदा, वाक्यदा, वाणी, वेदविग्रहा, विद्या, वागीश्वरी, सत्या, संमता, सरस्वती ॥१२७ १३२॥ निर्मला, आनन्दरूपा, अमृता, मानदा, पूषा, पुष्टि, तुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णा, पूर्णामृता, कामदायिनी, इन्दुकलात्मिका, तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि, ज्वलिनी रुचि, सुषुम्णा, भागदा, विश्वा, बाधिनी, धारिणी, क्षमा, धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिता, ज्वालिनी, विस्फु- लिंगिनी, सुश्री, स्वरूपा, कपिला, हव्य-कव्यवहा, घस्मरा, विश्वकवला, लोलाक्षी, लोलजिह्विका, सर्वभक्षा, सहस्राक्षी, निःसंगा, गतिप्रिया, अचिंत्या, अप्रमेया, पूर्णरूपा, दुष्प्राप्या, संसिद्धिरूपा, पावना, एकरूपिणी ॥१३३-१३८॥ यामलवेधा, वेदस्वरूपिणी, शांभववेधा, भावनासिद्धिसूचिनी, वह्निरूपा, दक्षा, अमाविघ्ना, भुजंगमा, षण्मुखा, रविरूपा, माता, दुर्गा, दिशा, धनदा, केशवा, यमी, हरा, शश्रा, आश्वनी, यमी, वाह्निरूपा, धात्री,

८२८ नारदीयपुराणम् घनदा केशवा चापि व्यमी चैव हरा शशा । अश्विनी च यमी वह्निरूपा धात्रीति कीर्तिता ॥१४१॥ चंद्रा शिवादितिर्जीवा सर्पिणी पितृरूपिणी । अर्यम्णा च भगा सूर्या त्वाष्ट्रीमारुतसंज्ञिका ॥१४२॥ इंद्राग्निरूपा मित्रा चाप्येन्द्राणी निऋ तिर्जला । वैश्वदेवी हरित्सूर्वासवी वरुणा जया ॥१४३॥ अहिर्बुध्न्या पूषणी च तथा कारस्करामला । उदुंबरा जंबुका च खदिरा कृष्णरूपिणी ॥१४४॥ वंशा च पिप्पला नागा रोहिणा च पलाशका । पक्षका च तथाम्बष्ठा विल्वा चार्जु नरूपिणी ॥१४५॥ विकंकता च ककुभा सरला चापि संजिका । मंजुला पनसार्का च शमी हलिप्रियाम्रका ॥१४६॥ निम्बा मधूकसंज्ञा चाप्यश्वत्था च गजाद्वया । नागिनी सर्पिणी चैव शुनी चापि बिडालिकी ॥१४७॥ छागी मार्जारिका मूषी वृषभा माहिषी तथा । शार्दू ली सैरिभी व्याघ्री हरिणी च मृगी शुनी ॥१४८॥ कपिरूपा च गोघंटा वानरी च नराश्विनी । नगा गौर्हस्तिनी चेति तथा षट्चक्रवासिनी ॥१४९॥ त्रिखंडा तोरपालाख्या भ्रामणी द्रविणी तथा । सोमा सूर्या तिथिवारा योगाक्षां करणात्मिका ॥१५०॥ यक्षिणी तारणा व्योमशब्दाद्या प्राणिनी च धीः । क्रोधिनी स्तंभिनी चंडोच्चंडा ब्राह्मयादिरूपिणी ॥१५१॥ सिंहस्था व्याघ्रगा चैव गजाश्वगरुडस्थिता । भौमाप्या तैजसी वायुरूपिणी तामसा तथा ॥१५२॥ एकवक्त्रा चतुर्वक्त्रा नववक्त्रा कलानना । पंचविंशतिवक्त्रा च षड्विंशद्वदना तथा ॥१५३॥ ऊनपंचाशदास्या च चतुःषष्टिमुखा तथा । एकाशीतिमुखा चैव शताननसमन्विता ॥१५४॥ स्थूलरूपा सूक्ष्मरूपा तेजोविग्रहधारिणी । वृणावृत्तिस्वरूपा च नाथावृत्तिस्वरूपिणी ॥१५५॥ तत्त्वावृत्तिस्वरूपानि नित्यावृत्तिवपुर्द्धरा ॥१५६॥ अंगावृत्तिस्वरूपा चाप्यायुधावृत्तिरूपिणी । गुरुपंक्तिस्वरूपा च विद्यावृत्तिनुस्तथा ॥१५७॥ ब्रह्माद्यावृत्तिरूपा च परा पश्यंतिका तथा । मध्यमा वैखरी शीर्षंकण्ठतालवोष्ठदन्तगा ॥१५८॥ चंद्रा, शिवा, दिति, जीवा, सर्पिणी, पितृरूपिणी, अर्यम्णा, भगा, सूर्या, त्वाष्ट्री, मारुती, इन्द्रा, अग्निरूपा, मित्रा, इंद्राणी, निऋति, जला, वैश्वदेवी, हरित्भू, वासवी, वरुणा, जया, अहिर्बुध्न्या, पूषणी, कार- स्करा, अमला, उदुंबरा, जंबुका, खदिरा, कृष्णरूपिणी ॥१३६-१४४॥ वंशा, पिप्पला, नागा, रोहिणा, पलाशका, यक्षका, चेष्टा, बिल्वा, अर्जुनरूपिणी, विकंकता, ककुभा, सरला, संजिका, वंजुला, पनसा, काचशमी, हलिप्रिया, आम्रका, निंबा, मधूकसंज्ञा, अश्वत्था, गजा, अजा, नागिनी, सर्पिणी, शुनी, बिडालिकी, छागी, मार्जारिका, मूषी, वृषभा, माहिषी, शार्दूली, सैरिभी, व्याघ्री, हरिणी, मृगी, कपिरूपा, गोघंटा, वानरी, नराश्विनी, नगा, गौ, हस्तिनी, षट्चक्र-वासिनी, त्रिखंडा, तोरपाला, भ्रामणी, द्राविणी, भोमा, सूर्या, तिथि, वारा, योगा, ऋक्षा, करणात्मिका ॥१४५-१५०॥ यक्षिणी, तारणा, व्योमशब्दा, आद्या, प्राणिनो, धी, क्रोधिनी, स्तंभिनी, चंडा, उच्चंडा, ब्रह्मादि रूपिणी, सिंहस्था, व्याघ्रगा, गज, अश्व तथा गरुड़ पर आरूढ होने वाली, आप्या, तैजसी, वायुरूपिणी, तामसा, एकवक्त्रा, चतुर्वक्त्रा, नववक्त्रा, कलानना, पंचविंशतिवक्त्रा, षड्विंशद्वदना, ऊनपंचाशद्वदना, चतुःषष्टि- मुखा, एकाशीतिमुखा, शतानना, स्थूलरूपा, सूक्ष्मरूपा, तेजोविग्रहधारिणी, वृणा, वृत्तिस्वरूपा, मायावृत्ति- स्वरूपिणी, गुरुपंक्तिस्वरूपा, विद्यावृत्तिस्वरूपिणी, तत्त्वावृत्तिस्वरूपा, नित्यावृत्तिशरीरधारिणी, अंगावृत्ति- स्वरूपा, आयुधावृत्तिरूपिणी, ब्रह्माद्यावृत्तिरूपा, परा, पश्यंतिका, मध्यमा, वैखरी, शीर्ष, कंठ, तालु, ओष्ठ,

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२१ जिह्वामूलगता नासागतोरःस्थलगामिनी । पदवाक्यस्वरूपा च वेदभाषास्वरूपिणी ॥१५९॥ सेकाख्या वीक्षणाख्या चोपदेशाख्या तथैव च । व्याकुलाक्षरसंकेता गायत्री प्रणवादिका ॥१६०॥ जपहोमार्चनध्यानयंत्रतर्पणरूपिणी । सिद्धसारस्वता मृत्युंजया च त्रिपुरा तथा ॥१६१॥ गारुडा चान्नपूर्णा चाप्यश्वारूढा नवात्मिका । गौरी च देवी हृदया लक्षदा च मतंगिनी ॥१६२॥ निष्कत्रयपदा चेष्टावादिनी च प्रकीर्तिता । राजलक्ष्मीनर्महालक्ष्मीः सिद्धलक्ष्मीर्गवानना ॥१६३॥ इत्येवं ललितादेव्या दिव्यं नामसहस्रकम् । सर्वार्थसिद्धिदं प्रोक्तं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥१६४॥ एतन्नित्यमुषःकाले यो जपेच्छुद्धमानसः । स योगी ब्रह्मविज्ज्ञानी शिवयोगी तथात्मवित् ॥१६५॥ द्विरावृत्त्या प्रजपतो ह्यायुरारोग्यसंपदः । लोकानुरंजनं नारीनृपावर्जनकर्म च ॥१६६॥ अपृथक्त्वेन सिद्ध्यंति साधकस्यास्य निश्चितम् । त्रिरावृत्त्यास्य वै पुंसो विश्वं ब्रूयाद्वशेऽखिलम् ॥१६७॥ चतुरावृत्तितश्चास्य समीहितमनारतम् । फलत्येव प्रयोगार्हो लोकरक्षाकरो भवेत् ॥१६८॥ पंचावृत्त्या नरा नार्यो नृपा देवाश्च जंतवः । भजंत्येनं साधकं च देव्यामाहितचेतसः ॥१६९॥ षडावृत्त्या तन्मयः स्यात्साधकश्चास्य सिद्धयः । अचिरेणैव देवानां प्रसादात्संभवंति च ॥१७०॥ सप्तावृत्त्यारिरोगादिकृत्यापस्मारनाशनम् । अष्टावृत्त्या नरो भूपान्निग्रहानुग्रहक्षमः ॥१७१॥ नवावृत्त्या मन्मथाभो विक्षोभयति भूतलम् । दशावृत्त्या पठेन्नित्यं वागलक्ष्मीकांतिसिद्धये ॥१७२॥ रुद्रावृत्त्याखिलद्धिश्च तदायत्तं जगद्भवेत् । अर्कावृत्त्या सिद्धिभिः स्याद्दिग्भिर्मर्त्यो हरोपमः ॥१७३॥ तथा दंतगामिनी, ॥१५१-१५८॥ जिह्वामूलगता, नासागता, उरःस्थलगामिनी, षड्वाक्यस्वरूपा, वेदभाषा- स्वरूपिणी, सेका, वीक्षणा, उपदेशा, व्याकुलाक्षरसंकेता, गायत्री, ब्रह्मवादिनी, जप होम, पूजन, ध्यान, यंत्र तथा तर्पण-रूपिणी, सिद्धसारस्वता, मृत्युंजया, त्रिपुरा, गारुडा, अन्नपूर्णा, अश्वारूढा, नवात्मिका, गौरी, देवी, हृदया, लक्षदा, मतंगिनी, निष्कत्रयपदा, चेष्टा-वादिनी, राजलक्ष्मी, महालक्ष्मी, सिद्धलक्ष्मी, ओर गवानना ॥१५६-१६३॥ ये ललितादेवी के सहस्र नाम हैं, जो समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले तथा चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के फल को देने वाले हैं। जो व्यक्ति नित्य प्रातःकाल शुद्ध मन से इन नामों का पाठ करेगा, वह योगी, ब्रह्मवेत्ता, ज्ञानी, शिवयोगी तथा आत्मवेत्ता होगा। जो नित्य दो आवृत्ति पाठ करेगा, उसे, आयु, आरोग्य तथा संपत्ति की प्राप्ति होगी और वह नारी, राजा तथा लोगों को प्रसन्न करेगा। तीन आवृत्ति पाठ करने से विश्व वशीभूत हो जाता है। चार आवृत्ति पाठ करने से सतत इच्छा- नुसार फल मिलता है और प्रयोग करने से लोगों को रक्षा होती है ॥१६४-१६८॥ जो पांच आवृत्ति पाठ करता है, उसकी सेवा नर, नारियाँ, राजा, देवता सभी जन्तु देवी से मोहित- चित्त होकर करते हैं। तन्मय होकर छह आवृत्ति पाठ करने से साधक को देवी की कृपा से शीघ्र ही समस्त सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सात आवृत्ति करने से (पाठक अपने) शत्रुओं को रोग आदि उत्पन्न कर सकता है और अपस्मार (मिरगी) आदि रोगों का नाश भी कर सकता है। आठ आवृत्ति करने से मनुष्य राजाओं के ऊपर निग्रह-अनुग्रह करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। नौ आवृत्ति पाठ करने वाला साधक मदन तुल्य होकर संपूर्ण भूतल को विक्षुब्ध करता है। दश आवृत्ति करने से वाणी, लक्ष्मी तथा कांति की सिद्धि होती है ॥१६९-१७२॥ ग्यारह आवृत्ति करने से अखिल ऋद्धियां प्राप्त होती हैं तथा उसके अधीन निखिल जगत् हो जाता है। बारह आवृत्ति करने से अष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं तथा वह मनुज

८३० नारदीयपुराणम् विश्वावृत्त्या तु विजयी सर्वतः स्यात्सुखी नरः । शक्रावृत्त्याखिलेष्टाप्तिः सर्वतो मंगलं भवेत् ॥१७४॥ तिथ्यावृत्त्याखिलानिष्टानयत्नादाप्नुयान्नरः । षोडशावृत्तितो भूयान्नरः साक्षान्महेश्वरः ॥१७५॥ विश्वं स्रष्टुं पालयितुं संहर्तुं च क्षमो भवेत् । मंडलं मासमात्रं वा यो जपेद्यद्यदाशयः ॥१७६॥ तत्तदेवाप्नुयात्सत्यं शिवस्य वचनं यथा । इत्येतत्कथितं विप्र नित्याह्यर्चनाश्रितम् ॥१७७॥ नाम्नां सहस्रं मनसोऽभीष्टसंपादनक्षमम् ॥१७८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे ललितास्तोत्रकवचसहस्र- नामकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥८९॥ नवतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथातो विप्र नित्यानां प्रयोगादिसमन्वितम् । पटलं तेऽभिधास्यामि नित्याभ्यर्चनदीपकम् ॥१॥ ललितायास्त्रिभिर्वर्णैः सकलार्थोऽभिधीयते । शेषेण देवीरूपेण तेन स्यादिदमीरितम् ॥२॥ अशेषतो जगत्कृत्स्नं हृल्लेखात्मकमुच्यते । तस्याश्चार्थस्तु कथितः सर्वतंत्रेषु गोपितः ॥३॥ शिव के तुल्य हो जाता है । तेरह आवृत्ति करने से मनुष्य सर्वविजयी तथा सुखी होता है । चौदह आवृत्त करने से समस्त कामनाओं की प्राप्ति तथा सब प्रकार से कल्याण होता है । पन्द्रह आवृत्ति करने से अना- यास ही अखिल वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है। सोलह आवृत्ति करने से मानव साक्षात् महेश्वर होता है और विश्व के सृजन, पालन तथा संहार करने की क्षमता प्राप्त करता है। जो एक मास तक नित्य सत्रह आवृत्ति पाठ करेगा, उसके हृदय में जो-जो अभिलाषायें होंगी, वे तुरन्त पूर्ण हो जायेंगी, यह शिव का सत्य वचन है। विप्र ! सहस्रं मनःकामनाओं को पूर्ण करने वाले नित्याओं के पूजन सहित सहस्र नामों को मैंने बता दिया ॥१७३-१७८॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में ललिता के स्तोत्र, कवच तथा सहस्रनाम कथन नामक नवासीवां अध्याय समाप्त ॥ अध्याय ६० अर्चन-विधि सहित नित्यापटल-कथन सनत्कुमार बोले- विप्र ! अब इसके उपरान्त नित्याओं के प्रयोग, अर्चना आदि बतलाते हुए पटल का निरूपण करूँगा । ललिता के तीन वर्णों से ही सकल पदार्थों का अभिधान होता है । शेष देवी रूप से यह जगत् कहा गया है । संपूर्ण विश्व हृल्लेखा का स्वरूप है। उनका वर्णन सब तन्त्रों में गुप्त रूप से किया गया है।

नवतितमोऽध्यायः ८३१ व्योम्ना प्रकाशमानत्वं ग्रसमानत्वमग्निना । तयोविमर्श ईकारो बिंदुना तन्निफालनम् ॥४॥ पिडकंर्तरि बीजाख्या मन्त्रा मालाभिधाः क्रमात् । एकार्णवन्तो द्वयूर्णाश्च विदिक्ष्मुखमुखार्णकाः ॥५॥ वृत्तिजा र्णांल्लिखेदंकैर्व्यत्यस्तक्रमयोगतः । तर्भेदयोजनं कुर्यात्संभर्भाणामशेषतः ॥६॥ देव्यात्मकं समुदयं विश्रांति च शिवात्मकम् । उभयात्मकमप्यात्मस्वरूपं तैश्च भावयेत् ॥७॥ कालेनान्यच्च दुःखार्तिवासनानाशनो ध्रुवम् । पराहंतामयं सर्वस्वरूपं चात्मविग्रहम् ॥८॥ सदात्मकं स्फुरताख्यमशेषोपाधिवर्जितम् । प्रकाशरूपमात्मत्वे वस्तु तद्भासते परम् ॥६॥ यत एवमतो लोके नास्त्यमंत्रं यदक्षरम् । यद्विद्येति समाख्यातं सर्वथा सर्वतः सदा ॥१०॥ वासरेषु तु तेष्वेवं सर्वापत्तारकं भवेत् । तद्विधानं च वक्ष्यामि सम्यगासवकल्पनम् ॥११॥ गौडी पैष्टी तथा माध्वीत्येवं तत्त्रिविधं स्मृतम् । गुडमुष्णोदके क्षिप्त्वा समालोड्य विनिक्षिपेत् ॥१२॥ घटे काचमये तस्मिन् धातकीसुमनोरजः । खात्वा भूमौ संध्ययोस्तु करैः संक्षोभ्य भूयसा ॥१३॥ मासमात्रे गते तस्मिन्निमग्ने रजसि द्रुतम् । संशोध्य पूजयेत्तेन गौडी सा गुडयोगतः ॥१४॥ एवं मधुसमायोगान्माध्वी पैष्टीं शृणु प्रिये । अध्यर्द्धद्विगुणे तोये श्रपयेत्तन्दुलं शनैः ॥१५॥ दिनत्रयोषिते तस्मिन्धात्यूंकुररजः क्षिपेत् । दिमेकं धृते वाते निवाते स्थापयेत्ततः ॥१६॥ उदकेंलोलितं पश्चाद्गलितं पैष्टिकं मधु । वृक्षजं फलजं चेति द्विविधं क्रियते मधु ॥१७॥ तन्निर्माणं शृणुष्वाय यदास्वादान्मनोलयः । मृद्वीकां वाथ खजूरफलं पुष्पमथापि वा ॥१८॥ उनमें प्रकाशमानता आकाश से आती है और ग्रसमानता (निगलने का भाव) अग्नि से । उन दोनों का विमर्श ईकार है। बिन्दु से उसका अवलोकन करना चाहिए ॥१-४॥ पिंड के कर्त्ता में माला नामक बीज मंत्र क्रमशः स्थापित करने चाहिये । उस मन्त्र में एक वर्ण, चार वर्ण और तीन दिशाओं में मुख वाले वर्ण होने चाहिये । फिर विपरीत क्रम से वृत्तिजन्य अक्षरों को लिखे । उनसे सन्दर्भों का भेद सम्पूर्णतया कर दे । उदय में देवी के रूप, विश्राम में शिव के रूप और दोनों रूपों में आत्म-रूप की भावना करे । ऐसा करने से निश्चित ही दुःख, पीडा तथा वासना का नाश होता है। उत्कृष्ट अहंकारमय, सबका स्वरूप, आत्मरूप, सद्रूप, भासमानता की संज्ञा से युक्त, अक्रोध की उपाधि से रहित तथा प्रकाशरूप वस्तु आत्मा होने में भासित होती है । जिस लिए ऐसी बात है, इसलिए लोक में कोई वस्तु मन्त्र-रहित नहीं है । उस मन्त्र के जो अक्षर हैं और जो विद्या है वह सब बातें भली-भाँति बता दी गईं । विहित दिनों में उस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी आपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। अब मैं भली-भांति आसव बनाने की विधि बताऊँगा । आसव (मद्य) विविध प्रकार के कहे गये हैं - जैसे - गौडी, पैष्टी तथा माध्वी । गरम जल में गुड़ को छोड़कर उसका मन्थन करे । फिर कांच के घड़े में धायके फूल के पराग के साथ उसे रखे। अनन्तर भूमि में उस घड़े को गाड़कर दोनों संध्या हाथों से उसे चलाये। एक मास तक ऐसा करने के उपरान्त उसको परिशोधित करके उससे पूजन करे । इस तरह गुड़योग से गोडी नामक मदिरा तैयार होती है ॥५-१४॥ प्रिय ! इसी प्रकार मधु के योग से माध्वी तथा पैष्टी नामक मद्य बनाया जाता है। ढाई गुने जल में चावल को धीरे-धीरे पकाये । फिर तीन दिनों तक उसे बासी करके धात्रीफल के चूर्ण के साथ मिलाये। पश्चात् एक दिन वायु में रख कर निर्वात स्थान में रख छोड़े । कुछ दिनों बाद जल मिलाकर उसका प्रयोग करे । इस तरह पैष्टिक मद्य बनता है। माध्वी मदिरा दो प्रकार की होती हैं- वृक्ष की एवम् फल की। उसका बनाना

८३२ नारदीयपुराणम्

मधूकस्यांभसि क्षिप्त्वा शतमर्द्धावशेषितम् । प्राक्सूतांशेन मिलितं दिवसद्वयात् ॥१९॥ गालितं स्वादु पूजाहं मनोलयकरं शुभम् । वाक्षं तु नालिकेरं स्याद्धितालस्याथ तालतः ॥२०॥ फलक्रांडात्स्रुतं दुग्धं नीतं सद्यो रसावहम् । नालिकेरफलांतस्थसलिने शशिना युते ॥२१॥ अर्द्धपूगफलोत्थं तु रसं संक्षिप्य तापयेत् । आतपे सद्य एवैतदासवं देवताप्रियम् ॥२२॥ आसवैरेभिरुदितैरर्घ्यं देव्यै निवेदयेत् । देवीः कृत्वा ततः सद्यो दद्यात्तत्सिद्धये द्वयम् ॥२३॥ साधको नियताहारः समाधिस्थः पिबेत्सदा । न कदाचित्पिबेत्सिद्धो देव्यर्घ्यमनिवेदितम् ॥२४॥ पानं च तावत्कुर्वीत यावता स्यान्मनोलयः । ततः करोति चेत्सद्यः पातकी भवति ध्रुवम् ॥२५॥ देवतागुरुशिष्टान्यं पिबन्नासवमाशया । पातकी राजदंड्यश्च रिक्थयोभासक एव च ॥२६॥ साध्यसाधकयोरेतत्काम्य एव समीरितम् । सिद्धश्च सर्वदा प्रोक्तं यतोऽसौ तन्मयो भवेत् ॥२७॥ पूजयेत्प्रोक्तरूपैस्तु प्रोक्तरूपाश्च ताः क्रमात् । उपचारैरासवैश्च मत्स्यैर्मांसैश्च संस्कृतैः ॥२८॥ अथ काम्यार्चनं वक्ष्ये प्रयोगांश्चापि नारद । येषामाचरणात्सिद्धिं साधको लभते ध्रुवम् ॥२९॥ चैत्रे दमनकैरर्चेत्पूर्णायां मदनोत्सवम् । वैशाखे मासि पूर्णायां पूजयेद्धेमपुष्पकैः ॥३०॥ ज्येष्ठ्यां फलैर्यजेद्देवी कदलीपनसाम्रजैः । आषाढ्यां चन्दनैरेलाजाताकंकोलकुङ्कुमैः ॥३१॥


सुन लो, जिसके आस्वादन से मन की एकाग्रता होती है । दाख या खजूर के फल या पुष्प को महुए के जल में छोड़ कर पकाये । आधा शेष रह जाने पर पहले के बने किंचिन्मात्र मद्य के साथ मिलाकर दो दिनों तक छोड़ दे । ऐसा करने से वह मद्य पूजा योग्य तथा मन की एकाग्रता का विधायक होता है । वृक्ष का मद्य तो इस तरह बनाया जाता है कि नारियल, हिंताल, ताल और नागकेसर के तुरन्त निकाले हुए रसावह दूध (ताड़ी) को नारियल के जल में छोड़ दे । फिर उसमें पूगीफल का पूंरस डाल कर धूप में रख दे । इस प्रकार तैयार किय हुआ आसव देवता को अधिक प्रिय होता है ॥१९-२२॥ इस आसवों के तैयार हो जाने पर देवी को इनका अर्ध देना चाहिये । तदनन्तर सिद्धि के लिये देवताओं को दो अर्ध देने चाहिए । साधक नियमपूर्वक आहार करते हुए सदा समाधिस्थ होकर इसका पान करे । सिद्ध पुरुष बिना देवी को समर्पित किये पान कभी न करे पान उतनी मात्रा में करे, जिससे कि मन की एकाग्रता हो जाय । उससे अधिक पान करने वाला निश्चय ही पातक का भागी बनता है । देवता, गुरु और शिष्यों का बिना समर्पित किये जो उपभोग की इच्छा से मद्य का पान करता है, वह पातकी तथा राजा से दण्ड पाने योग्य है । धन की कामना करते हुए जो इसका पान करता है, वह भी पातकी है । साध्य और साधक के लिए यह काम्य रूप से बतलाया गया है (अर्थात् इष्ट सिद्धि के लिए ही साधक इसका पान करे) । किन्तु सिद्ध पुरुष अपनी तन्मयता के लिये सदा इसका उपयोग करे । उक्त प्रकार का व्यक्ति उक्त रूप देवियों की सुसंस्कृत मत्स्य, मांस तथा मद्य से सोपचार अर्चना करे ॥२३-२८॥ नारद ! अब काम्या के पूजन तथा प्रयोगों को बतलाऊँगा, जिनके करने से साधक अवश्यमेव सिद्धि को प्राप्त करता है । चैत्र मास की पूर्णिमा में कुन्द के पुष्पों से देवी की अभ्यर्थना करे । वैशाख की पूर्णिमा में चम्पा के पुष्पों से पूजन करे । ज्येष्ठ की पूर्णिमा में केले, कटहल, तथा आम के पुष्पों (फलों) से पूजा करे । आषाढी पूर्णिमा में चन्दन, इलायची, जूही, कंकोल (कंकल-अशोक) तथा कुंकुम से पूजन करे । श्रावण की पौर्णमासी में

नवतितमोऽध्यायः ८३३ श्रावण्यामागमौक्तेन विधानाचैत्पवित्रकैः । प्रौष्ठपद्यां गन्धपुष्पैर्यजेद्वा केतकीकुसुमैः ॥३२॥ आश्वयुज्यां कन्यकाञ्चां भूषावस्त्रधनादिभिः । कार्त्तिक्यां कुंकुमैश्चैव निशि दीपगणैरपि ॥३३॥ सचन्द्रैर्मार्गशीर्ष्यां तु नालिकेरैरपूपकैः । पौष्यां सशर्करंगुडैर्गवां दुग्धैः समर्चयेत् ॥३४॥ स्वर्णरौप्यैः पंकजैस्तु माघ्यां सौगन्धिकादिभिः । फाल्गुन्यां विविधैर्द्रव्यैः फलैः पुष्पैः सुगंधिभिः ॥३५॥ पर्वताग्रे यजेद्दे वीं पलाशकुसुमैर्निशि । सिद्धद्रव्यैश्च सप्ताहात्खेचरीमेलनं भवेत् ॥३६॥ अरण्ये वटमूले वा कुंजे वा धरणीभृताम् । कदम्बजातिपुष्पाभ्यां सिद्धद्रव्यैः शिवां यजेत् ॥३७॥ मासेन सिद्धा यक्षिण्यः प्रत्यक्षा वांछितप्रदाः । केतकीकुसुमैः सिद्धाश्चेटका वारिधेस्तटे ॥३८॥ आज्ञामभीष्टां कुर्वन्ति रणे मायां महाद्भुताम् । वसूनि मालां भूषां च दद्युरस्येहह्यानिशम् ॥३६॥ पीठमृक्षद्रुमैः कृत्वा तत्र देवीं यजेन्निशि । शाल्मलैः कुसुमैः सिद्धद्रव्यैर्मासं तु निर्भयः ॥४०॥ श्मशानवेशे विप्रेंद्र सिद्धयंत्यस्य पिशाचकाः । अश्मपातप्रहाराद्यैर्जयावारिभिद्विषञ्चिरम् ॥४१॥ निर्जने विपिने रात्रौ मासमात्रं तु निर्भयः । यजेद्देवीं चक्रगतां सिद्धद्रव्यसमन्विताम् ॥४२॥ मालतीजातपुन्नागकेतकीमरुभिः क्रमात् । तेन सिद्ध्यंन्ति वेतालास्ताना रुह्येच्छया चरेत् ॥४३॥ श्मशाने चंडिकागेहे निर्जने विपिनेऽपि वा । मध्यरात्रे यजेद्देवीं कृष्णवस्त्रविभूषणैः ॥४४॥ तन्त्रोक्त विधि से कुशों से अर्चना करे । भाद्र मास की पूर्णिमा में गन्ध-पुष्पों से या केतकी कुसुमोँ से पूजन करे । ॥२९-३२॥ आश्विनो पूर्णिमा में वस्त्र, आभूषण, धन आदि से कुमारिका पूजन करना चाहिए । कात्तिको पूर्णिमा में कुंकुमों से देवी का पूजन करके रात्रि में दीप मालिका का उत्सव करे । अगहण की पूर्णिमा में कर्पूर, नारियल तथा पूओं से पूजा करे । पौषी पूर्णिमा में शक्कर, गुड तथा गाय के दूध से अर्चना करनी चाहिए । माघी पूर्णिमा में सुवर्ण, चांदी, कमल, तथा सुगंधित द्रव्यों से पूजा करे । फाल्गुनी पूर्णिमा में फल, पुष्प तथा विविध प्रकार के सुगंधित द्रव्यों से पूजन करे ॥३३-३५॥ रात्रि को पर्वत की चोटी पर पलाशपुष्प तथा सिद्ध द्रव्यों से देवो की अर्चना करनी चाहिये । एक सप्ताह ऐसा करने से खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है (अर्थात् देवी प्रत्यक्ष होतो है) । वन में या वट वृक्ष के मूल में या लताकुंज में कदम्ब, जूही तथा सिद्ध द्रव्यों से शिवा की अर्चना करनी चाहिए । इस तरह एक मास तक करने से वांछितफलदायिनी यक्षिणियां प्रत्यक्ष होती हैं । समुद्र के तट पर केतको के पुष्पों से पूजन करने से दास सिद्ध होते हैं । वे साधक की आज्ञा का पालन करते हैं, रण में अद्भुत माया रचते हैं और सदा धन, माला, आभूषण आदि देते रहते हैं ॥३६-३९॥ विप्रवर ! जो व्यक्ति एक मास तक रात को श्मशान में निर्भय होकर सेमल के फूलों तथा सिद्ध द्रव्यों से देवी की अर्चना करता है, उसके पिशाच सिद्ध होते हैं । वे (पिशाच) संग्राम में उस (साधक) के शत्रुओं को पत्थर से मार गिराते हैं । निर्जन वन में रात्रि के समय जो निर्भय होकर एक मास तक चक्र स्थित देवो का मालती, जूही, पुंनाग, केतको तथा मरु के पुष्पों एवम् सिद्ध द्रव्यों से पूजन करता है, उसके वेताल सिद्ध होते हैं । उन वेतालों के ऊपर चढ़कर वह इच्छानुसार विचरण करता है ॥४०-४३॥ श्मशान में या चंडिका गृह में या निर्जन वन में जो साधक एक मास तक मध्य रात्रि के समय क्रुद्ध होकर कृष्णचक्र स्थित अतिकृष्णवर्णा देवी की कृष्णवस्त्र तथा आभूषणों से पूजा करते हुए सिद्ध द्रव्य समेत १०५ ना० पु०

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८३४ नारदीयपुराणम् कृष्णचक्रेऽतिकृष्णां तामतिक्रुद्धाशयो यजेत् । साध्ययोनिं तदग्रे तु बलिं च्छिन्नन्निवेदयेत् ॥४५॥ सिद्धद्रव्यसमेतं तु मासात्तद्भाललोचनात् । जायन्ते भीषणाः कृत्यास्ताभ्यः सिद्धिं निवेदयेत् ॥४६॥ विश्वसंहारसंतृष्टाः पुनरेत्य निजेच्छया । देव्या ललाटनेत्रे स्युः प्रार्थिते तु तिरोहिताः ॥४७॥ रक्तभूषांबरालेपमालाभूषितविग्रहाः । उद्याने निर्जने देवीं चक्रे संचित्य पूजयेत् ॥४८॥ कह्लारचंपकाशोकपाटलाशत्तपत्रकैः । सिद्धद्रव्यसमोपेतैर्मायाः सिद्धयंति मासततः ॥४६॥ यासां प्रसादालाभेन कामरूपो भवेन्नरः । याभिर्विश्वजयो विश्वचारी विश्वविनोदवान् ॥५०॥ षडाधाराब्जमध्ये तु चक्रं संचित्य पूजयेत् । चंद्रचंदनकस्तूरीमृगनाभिमहोदयैः ॥५१॥ त्रिकालज्ञो भवेद्देवी तेषु सम्यग्यिचिंतयेत् । पूर्णप्रतीतौ भव्यानि विकलेऽभव्यमीरितम् ॥५२॥ देवींचक्रेण संहतां स्मरेद्भक्तियुतो नरः । विवेका विभवा विश्वा वितता च प्रकीर्तिता ॥५३॥ कामिनी खेचरी गर्वा पुराणा परमेश्वरी । गौरी शिवा ह्यमेया च विमला विजया परा ॥५४॥ पवित्रा पीडनी विद्या विश्वेशी शिववल्लभा । अशेषरूपा स्वानंदांबुजाक्षी चाप्यनिंदिता ॥५५॥ वरदा वाक्यदा वाणी विविधा वेदविग्रहा । विद्या वागीश्वरी सत्या संयता च सरस्वती ॥५६॥ निर्मलानन्दरूपा च ह्यमृता मानदा तथा । पूषा चैव तथा तुष्टिः पुष्टिंश्चापि रतिधृतिः ॥५७॥ शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । देवीनामानि चैतानि चुलुके सलिले स्मरन् ॥५८॥ मातृकासहितां विन्नां विरावृत्यामृतात्मिकाम् । ताडों सरस्वतीं जिह्वां दीपाकारां स्मरन्पिबेत् ॥५६॥ अब्दाच्चतुर्विधं तस्य पांडित्यं भुवि जायते । एवं नित्यमुषःकाले यः कुर्याच्छुद्धमानसः ॥६०॥ स योगी ब्रह्मविज्ञानी शिवयोगी तथात्मवित् । अनुग्रहोक्तचक्रस्थां देवीं ताभिर्वृतां स्मरेत् ॥६१॥ बलि समर्पित करता है, उसके ललाट से भयंकर कृत्यायँ उत्पन्न होती हैं, जिनके शरीर रक्त भूषण, वस्त्र, लेप तथा मालाओं से विभूषित रहते हैं । उनसे सिद्धि का निवेदन कर देने पर वे विश्व का संहार कर बैठती हैं । पुनः प्रार्थना करने पर वे देवी के ललाटस्थ नेत्र में तिरोहित हो जाती हैं । उद्यान के जनशून्य स्थान में चक्र पर अवस्थित देवी का ध्यान करके रक्त कमल, चम्पा, अशोक, पाटल, सामान्य कमल तथा सिद्ध द्रव्यों से एक मास तक उनका पूजन करने से माया सिद्ध होती हैं, उनकी कृपा से मनुष्य विश्वविजयी, विश्वचारी, विश्वविनोदी तथा इच्छानुरूप फलभोक्ता होता है । मूलाधार कमल के मध्य देवी का ध्यान करके कर्पूर, चन्दन, तथा कस्तूरी से पूजन करने वाला व्यक्ति त्रिकालज्ञ होता है ॥४४-५२॥ जो नर भक्तिपूर्वक चक्रसहित देवी का स्मरण करके उनके विवेका, विभवा, विश्वा, वितता, कामिनी, खेचरी, गर्वा, पुराणा, परमेश्वरी, गौरी, शिवा, अमेया, विमला, विजया, परा, पवित्रा, पीडनी, विद्या, विश्वेशी, शिववल्लभा, अशेषरूपा, स्वानन्दानु जाक्षी, अनिंदिता, वरदा, वाक्यदा, वाणी, विविधा, वेदविग्रहा, विद्या, वागीश्वरी, सत्या, संयता, सरस्वती, निर्मला, आनंदरूपा, अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अंगदा—इन नामों का पाठ करके एक चुल्लू जल पिये । फिर मातृका सहित विन्ना, अमृतात्मिका, ताडो, सरस्वती, जिह्वा तथा दीपाकारा का ध्यान करते हुए उस जल का पान कर जाय । एक वर्ष तक, ऐसा करने से अद्भुत पांडित्य की प्राप्ति होती है । जो व्यक्ति नित्य प्रातःकाल शुद्ध मन से ऐसा करता है, वह योगी, ब्रह्मविज्ञानी, शिवयोगी तथा आत्मवेत्ता होता है । उपर्युक्त शक्तियों के साथ अनुग्रहचक्र पर अवस्थित देवी का ध्यान करके चम्पा तथा कमल के पुष्पों से पूजा करने से आरोग्य लाभ होता हैं ॥५३- ६१३॥

नवतितमोऽध्यायः ८३५ चंपकैर्दीवरैर्मासादारोग्यमुपजायते । ज्वरभूतग्रहोन्मादशीतकाकामलाक्षिहृत् ॥६२॥ दंतकर्णज्वरशिरःशूलगुल्मादि कुक्षिजाः । व्रणप्रमेहच्छद्यर्शोग्रहण्यमत्रिदोषजाः ॥६३॥ सर्वे तथा शमं यांति पूजया परमेश्वरी । द्रव्यं चक्रस्य निर्माणे काश्मीरं समुदीरितम् ॥६४॥ सिंदूरं गैरिकं लाक्षा दरदं चंदनद्वयम् । बिल्वद्वारे ऽलिखेत्त्र्यस्त्रं षोडशत्र्यस्रसंयुतम् ॥६५॥ दरदेनास्थ मध्यस्थां पूजयेत्परमेश्वरीम् । ताभिस्तच्छक्तिभिः सार्क सिद्धद्रव्यैः सुगंधिभिः ॥६६॥ कुसुमैर्मासमात्रेण नागकन्यासमन्वितम् । पातालादिषु लोकेषु रमयत्यनिशं चिरम् ॥६७॥ यक्षराक्षसगंधर्वसिद्धविद्याधरांगनाः । पिशाचा गुह्यका वीराः किन्नराः भुजगास्तथा ॥६८॥ सिद्धयंति पूजनात्तत्र तथा तत्प्रोक्तकालतः । किंशुकैर्भूषणावाप्तौ पाटलैर्गजसिद्धये ॥६९॥ रक्तोत्पलैरश्वसिद्धौ कुमुदैश्चरसिद्धये । उत्पलैरूष्ट्रसंसिद्धयै तगरैः पशुसिद्धये ॥७०॥ जंबीरीर्म्महिषावाप्त्यै लकुचैरजसिद्धये । दाडिमैर्निधिसंसिद्धयै मधुकैर्गानसिद्धये ॥७१॥ बकुलैरंगनासिद्धयै कह्लारैः पुत्रसिद्धये । शतपत्रैर्जयावाप्त्यै केतकेर्वाहनाप्तये ॥७२॥ सौरभाढ्यैः प्रसूनैस्तु नित्यं सौभाग्यसिद्धये । पूजयेन्मासमात्रं वा द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥७३॥ यावत्फलावाप्तिकांक्षी शर्कराघृतपायसैः । सचक्रपरिवारां तां देवीं सलिलमध्यगाम् ॥७४॥ तर्पयेत्कुसुमैः साध्यैः सर्वोपद्रवशान्तये । घृतैः पूर्णायुषः सिद्धयै क्षौद्रैः सौभाग्यसिद्धये ॥७५॥ दुग्धेरारोग्यसंसिद्धयै त्रिमिरैश्वर्यंसिद्धये । नालिकेरोदकैः प्रीत्ये हिमतोयैर्नृपाप्तये सर्वार्थसिद्धये तोयैरभिषिंचेन्महेश्वरोम् ॥७६॥

परमेश्वरी की पूजा करने से ज्वर, भूत, ग्रह, उन्माद, सर्दी, नेत्ररोग, हृदयरोग, दन्तरोग, कर्णरोग, शिरोव्यथा, उदररोग, व्रण, प्रमेह, बवासीर, संग्रहणी तथा अन्य रोग नष्ट हो जाते हैं। चक्र के निर्माण में कुंकुम, सिंदूर, गेरू, लाक्षा, दरद तथा दोनों चन्दनों का उपयोग करना चाहिये । बिल्वद्वार में तीन तथा सोलह त्रिकोणों का उल्लेख करे। मध्य में दरद से परमेश्वरी का पूजन करे। इस तरह एक मास तक सुगंधित सिद्ध द्रव्यों तथा पुष्पों से शक्तियों समेत देवी की आराधना करने से, पाताल, आदि लोकों में रात्रिंदिव नागकन्याओं के साथ रमण करने की क्षमता प्राप्त होती है और यक्ष, राक्षस, गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर, अंगना, पिशाच, गुह्यक, वीर, किन्नर तथा सर्प उसके वशीभूत हो जाते हैं ॥६२-६८॥ पलाश पुष्पों से पूजा करने से आभूषणों की प्राप्ति होती है और यावल (त) (जूही) से पूजन करने से हाथी की। रक्त कमल से अश्व की, कुमुद से वाहन की, कमल से ऊँट की, तगर से पशुओं की, नीबू से भैंस की, बड़हल से बकरे की, दाड़िमों से निधि की, महुए से गाने की, मोलसिरी से रमणी की, रक्तकमल से पुत्र की, सौ दल वाले कमल से स्त्री की, केतकी से वाहन की और अत्यन्त सुगंधित कुसुमों से नित्य सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पूर्णफल प्राप्ति के लिये एक मास या दो मास या तीन मास तक पूजा करनी चाहिए। अखिल उपद्रवों की शान्ति के लिये शक्कर, घी तथा खीर से चक्र-परिवार सहित सलिलमध्यगामिनी देवी को तृप्त करके पुष्प सहित अर्घ्य प्रदान करे। घृत से देवी को तृप्त करने से पूर्णायु की प्राप्ति होती है और मधु से सौभाग्य की। दूध से आरोग्य की, उक्त तीनों से ऐश्वर्य की, नारियल के जल से प्रेम की, हिमजल से राजा की और जल से सकल प्रयोजनों की प्राप्ति होती है ॥६९-७६॥

८३६ नारदीयपुराणम् पूगोद्याने यजेद्देवीं सिद्धद्रव्यैर्दिवाशिनम् । निवसंस्तत्र तत्पुष्पैर्जायते मन्मथोपमः ॥७७॥ पूर्णासु नियतं देवीं कन्याकायां समर्चयन् । कृत्याः प्रेरिता मंत्रा विमुखांस्तान् ग्रसंति वै ॥७८॥ लिंगत्रयमयीं देवीं चक्रस्थाभिश्च शक्तिभिः । पूजयन्निष्टमखिलं लभतेऽत्र परत्र च ॥७९॥ शतमानकृतैः स्वर्णपुष्पैः सौरभ्यवासितैः । पूजयन्मासमात्रेण प्राग्जन्माद्यैर्विमुच्यते ॥८०॥ तथा रत्नैश्च नवभिर्मासं तु यदि पूजयेत् । विमुक्तसर्वपापौघैस्तां च पश्यति चक्षुषा ॥८१॥ अंशुकैरर्चयेद्देवीं मासमात्रं सुगन्धिभिः । मुच्यते पापकृत्यादिदुःखौघैरितरैरपि ॥८२॥ देवीरूपं स्वमात्मानं चक्रं शक्तीः समंततः । भावयन्विषयैः पुष्पैः पूजयंस्तन्मयो भवेत् ॥८३॥ षोडशानां तु नित्यानां प्रत्येकं तिथयः क्रमात् । तत्तत्तिथौ तद्भजनं जपहोमादिकं चरेत् ॥८४॥ घृतं च शर्करा दुग्धमपूपं कदलीफलम् । क्षौद्रं गुडं नालिकेरफलं लाजा तिलं दधि ॥८५॥ पृथुकं चणकं मुद्गपायसं च निवेदयेत् । कामेश्वर्यादिशक्तीनां सर्वासामपि चोदितम् ॥८६॥ आद्याया ललितायास्तु सर्वाण्येतानि सर्वदा । निवेदयेच्च जुहुयाद्वह्नौ दद्यान्नृणामपि ॥८७॥ तत्तद्विद्याक्षरोक्तामौषधं तत्प्रमाणतः । संपिष्य गुटिकीकृत्य ताभिः सर्वं च साधयेत् ॥८८॥ रविवारेऽरुणांभोजैः कुमुदैः सोमवारके । भौमे रक्तोत्पलैः सौम्येवारे तगरसंभवैः ॥८९॥ गुरुवारे सुकल्हारैः शुक्रवारे सितांबुजैः । नीलोत्पलैर्मंदवारे पूजयेदिष्टमादरात् ॥९०॥ निवेदयेत्क्रमात्तेषु रविवारादिषु क्रमात् । पायसं दुग्धकदलीनवनीतसिताघृतम् ॥९१॥ एवमिष्टं समाराध्य देवीं गंधादिभिर्यजेत् । ग्रहपीडां विजित्याशु सुखानि च समश्नुते ॥९२॥ पूगीफल के उद्यान में निवास करते हुये उसके पुष्पों तथा सिद्ध द्रव्यों से देवी की अर्चना करने से मनुष्य कन्दर्पत्तुल्य हो जाता है। कन्या (राशि) संक्रान्ति में पड़ने वाली पूर्णिमा में जो देवी की आराधना करता है, उसकी भेजी हुई कृत्यायै शत्रुओं को खा डालती हैं, चक्रावस्थित शक्तियों के साथ लिंगत्रयमयी देवी की पूजा करने से इहलोक तथा परलोक में सकल कामनाओं की पूर्ति होती है। एक सौ सुवासित स्वर्णपुष्पों से एक मास तक देवी पूजन करने वाला व्यक्ति पूर्व जन्मादि के कर्मों से मुक्त हो जाता है। उसी तरह नौ रत्न-पुष्पों से एक मास तक पूजा करने वाला समस्त पापों से रहित होकर अपने चक्षु से देवी का दर्शन करता है ॥७७-८१॥ सुवासित वस्त्रों से एक मास तक पूजा करने वाला समस्त पापकर्मों तथा दुःखों से मुक्त हो जाता है। अपनी आत्मा को चारों ओर शक्तियों से परिवेष्टित देवी समझकर विषय रूपी पुष्पों से उनका पूजन करते हुए तन्मय हो जाना चाहिए। सोलह नित्याओं में से प्रत्येक की अलग-अलग तिथि है। तत्तत् तिथि में तत्तत् नित्या के लिये जप, होम, भजन आदि करना चाहिये । घी, शक्कर, दूध, पुआ, केला, मधु, गुड़, नारियल, लावा, तिल, दधि, चिड़वा ,चना तथा मूंग की खीर कामेश्वरी आदि समस्त शक्तियों को समर्पित करे ॥८२-८६॥ आद्या तथा ललिता को ये वस्तुएं सदा समर्पण करे, तदपश्चात् वह्नि में हवन करे। तत्तत् मंत्रों के अक्षर प्रमाण औषधि को पीस कर गोली बनाये और उनसे सबको सिद्ध करे। रविवार में लाल कमलों से, सोमवार में कुमुदों से, मंगल को रक्त कमलों से, बुध को तगर से, वृहस्पति को रक्त कमलों से, शुक्रवार को श्वेत कमलों से ओर शनिवार को नीलकमलों से आदरपूर्वक इष्ट देवी की पूजा करनी चाहिये। रविवार आदि दिनों में क्रमश: खीर, दूध, केला, मक्खन, चीनी तथा घी समर्पित करना चाहिए ॥८७-९१॥ इस प्रकार इष्ट की पूजा कर गन्ध आदि से देवी की आराधना करने वाला व्यक्ति शीघ्र ग्रहपीडा को

नवतितमोऽध्यायः ८३७

अर्धरात्रे तु साध्यां स्त्रीं स्मरन्मदनवह्निना । दह्यमानां हृतस्वांतां मस्तकस्थःपितांजलिम् ॥९३॥ विकीर्णकेशीमालोललोचनामरुणारुणाम् । वायुप्रेखत्पताकास्थपदां पद्मकलेवराम् ॥९४॥ विवेकविधुरां मत्तां मानलज्जाभयातिगाम् । चिंतयन्नर्चयेच्चक्र' मध्ये देवीं दिगंबराम् ॥९५॥ जपादाडिमबंधूककिंशुकैद्यैः समर्चयेत् । अन्यैः सुगंधिशेफालीकुसुमाद्यैः समर्चयेत् ॥९६॥ त्रिसप्तरात्रादायाति प्रोक्तरूपा मदाकुला । यावच्छरीरपातः स्याच्छापो वानपगास्य सा ॥९७॥ पद्मैरक्तैस्त्रिमध्वक्तैर्होमाल्लक्ष्मीमवाप्नुयात् । तथैव कैरवै रक्तरंगनाः स्ववशं नयेत् ॥९८॥ समानरूपवत्सायाः शुक्लाया गोः पयःप्लुतैः । मल्लिकामलतीजातीशत्पत्रैर्हुतैर्भवेत् ॥९९॥ कीर्तिविद्याधनारोग्यसौभाग्यवित्तपादिकम् । आरग्वधप्रसूनैस्तु क्षौद्रायुतैर्हवनाद्भवेत् ॥१००॥ स्वर्णादिस्तंभनं शत्रोर्नृपादीनां क्रुधोऽपि च । आज्याक्तैः करवीरोत्थैः प्रसूनैररुणैर्हुतैः ॥१०१॥ रक्तांबराणि वनिता नृपामात्यवशं तथा । भूषावाहनवाणिज्यसिद्धयश्चास्य वांछिताः ॥१०२॥ लवणैः सर्षपैर्गौरैस्तैलैर्वाथ होमतः । सतैलावर्तैनिशामध्ये स्वा नयेद्वांछितां वधूम् ॥१०३॥ तैलाक्तैर्जुहुयात्कृष्णदत्तूरपुष्पैनिशांतरे । मासादरातस्तस्यातिज्वरेण भवति ध्रुवम् ॥१०४॥ आरुष्करैघृताभ्यक्तैस्तत्तद्बीजैर्निशि होमतः । शत्रोर्दाहव्रणानि स्युर्दुःसाध्यानि चिकित्सकैः ॥१०५॥ तथा तत्तैलसंसिक्तैर्बीजैरंकोलकेरपि । मरिचैः सर्षपाज्याक्तैनिशि होमानुसारतः ॥१०६॥ वांछितां वनितां कामज्वरातमानयेदद्भुतम् । शालिभिश्चाज्यसंसिक्तैर्होमाच्छालीनवाप्नुयात् ॥१०७॥

जीतकर सुखों को प्राप्त करता है । (स्त्री को सिद्ध करने वाला साधक) अर्ध रात्रि के समय साध्य स्त्री का इस प्रकार स्मरण करे, कि वह कामाग्नि से दग्ध हो रही है, चित्त को चुराने वाली हैं, मस्तक पर हाथों को रखे हुई है, उसके बाल बिखरे हुए हैं, नेत्र दीर्घ तथा अरुण हैं, पैर वायु में झूलती हुई पताका पर स्थित हैं, शरीर कमल तुल्य कोमल है, उसमें विवेक का लेश नही है, वह उन्माद से युक्त है और मान, लज्जा तथा भय का अतिक्रमण करने वाली है ॥९२-९४½॥ ऐसी स्त्री का ध्यान कर चक्र के मध्य में दिगंबरा देवी की जपापुष्प (अड़हुल) दाड़िम, बन्धूक (दोपहरिया फूल), पलाशपुष्प तथा अन्य सुगंधित शेफालिका आदि पुष्पों से पूजा करे । इक्कीस रात तक ऐसा करने से उक्त रूपक मद विह्वल स्त्री सिद्ध हो जाती है । त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से हवन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होतो है । रक्त कुमुदों से हवन करने से ललनायें वशीभूत होती हैं। उजले रंग के वछड़े वाली शुक्लवर्णा गौ के दूध से सिंचित मालती, जूही तथा कमल से हवन करने से यश, विद्या, धन, आरोग्य तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है । मधुयुक्त आरग्वध (छितिवन) के कुसुमों से हवन करने से स्वर्णा आदि की प्राप्ति और शत्रु एवम् राजा का स्तंभन होता है ॥९५-१००½॥ घृतयुक्त लाल करवीर से होम करने से वनिता, राजा तथा मन्त्री वशीभूत होते हैं और रक्त वस्त्र, आभूषण, वाहन तथा व्यापार का लाभ होता है । नमक तथा उजले सरसों में तेल मिलाकर निशामध्ये में हवन करने से मन- चाही स्त्री की प्राप्ति होती है । तैलयुक्त कृष्ण दरपुष्पों से एक मास तक होम करने से शत्रु को विषम ज्वर हो जाता है । घृतयुक्त भिलावें के बीजों से रात्रि में होम करने से शत्रु को दाह व्रण होते हैं, जिनकी चिकित्सा वैद्य भी नहीं कर पाते । उसी के तेल भिलाये बीज, अंकोल, मरिच तथा सर्षप से रात्रि में हवन करने से शीघ्र कामज्वर पीड़ित रमणी को प्राप्ति होती है । घृताक्त चावल से होम करने से चावल की प्राप्ति होती है ॥१०१-१०७॥

८३८ नारदीयपुराणम् मुद्‌गैर्मुद्‌गं घृतैराज्यं सिद्धैरित्थं हुतैर्भवेत् । साध्यक्षंवृक्षसंसूतां विष्टपादरजः कृताम् ॥११०८॥ राजीमरीचिलोणोत्थां पुत्तलीं जुहुयान्निशि । प्रपदाभ्यां च जंघाभ्यां जानुभ्यामुरुयुग्मतः ॥११०६॥ नाभेरधस्ताद्धृदयान्मनेनाकण्ठतस्तथा । शिरसा च सुतीक्ष्णेन छित्त्वा शस्त्रेण वै क्रमात् ॥१११०॥ एवं द्वादशधा होमान्नरनारीनराधिपाः । वश्या भवंति सप्ताहाज्ज्वरार्त्तीश्चास्य वांछया ॥११११॥ पिष्टेन गुडयुक्तेन मरिचैर्जीरकैर्युताम् । कृत्वा पुत्तलिकां साध्यनामयुक्तामथो हृदि ॥१११२॥ सनामहोमसंपातघृते पाच्यतां पुनः । स्पृशन्निजकराग्रेण सहस्रं प्रजपेन्मनुम् ॥१११३॥ अभ्यर्च्य तद् घृताभ्यक्तं भक्षयेत्तद्धिया जपन् । नरनारीनृपास्तस्य वश्याःस्युर्मरणावधि ॥१११४॥ शश्वदष्टगंधं संपिष्य कन्यया शिशिरे जले । तेन वै तिलकं भाले धारयन्वश्ययेज्जगत् ॥१११५॥ शालितंडुलमादाय प्रस्थं भांडे नवे क्षिपेत् । समानवर्णवत्साया रक्ताया गोः पयस्तथा ॥१११६॥ द्विगुणं तत्र निक्षिप्य श्रपयेत्संस्कृतेऽनले । घृतेन सिक्तं सिक्थं तु कृत्वा तत्ससितं करे ॥१११७॥ विधाय विद्यामष्टोर्ध्वशतं जप्त्वा हुनेत्ततः । एवं होमो महालक्ष्मीमावहेत्प्रतिपत्कृतः ॥१११८॥ शुक्रवारेष्वपि तथा वर्षान्नृपसमो भवेत् । पंचम्यां तु विशेषेण प्राग्वद्धोमं समाचरेत् ॥१११६॥ तस्यां तिथौ त्रिमध्वक्तैर्मल्लिकाद्यैः सितैर्हुनेत् । अन्नाद्याभ्यांच्च नियतं हुत्वान्नाढ्यो भवेन्नरः ॥११२०॥ यद्यद्धि वांछितं वस्तु तत्तत्सर्वं तु सर्वदा । घृतहोमादवाप्नोति तथैव तिलतंडुलैः ॥११२१॥ अरुणैः पंकजैर्होमं कुर्वंस्त्रिमथुराप्लुतैः । मंडलाल्लभते लक्ष्मीं महतीं श्लाघ्यविग्रहाम् ॥११२२॥ कल्हारैः क्षौद्रसंयुक्तैः पूर्णाद्यं तद्दिनावधि । जुहुयान्नित्यशो भक्त्या सहस्रं विकचैः शुभैः ॥११२३॥ स तु कीर्ति धनं पुत्रान्प्राप्नुयान्नात्र संशयः । चंपकैः क्षौद्रसंसिक्तैः सहस्रहवनाद्‌ध्रुवम् ॥११२४॥ मूंग से होम करने से मूंग की, घृत से घी की और सर्षप से सर्षप की प्राप्ति होती है । साध्यवृक्ष के पुष्पराज, राई, मरिच, तथा लोनी के साग से रात्रि में हवन करने से नर, नारी, तथा नराधिप एक सप्ताह में वशीभूत होते हैं और साधक से इच्छानुसार उन्हें ज्वरपीड़ा भी हो जाती है । यहां होम चरणों के अग्रभाग, जानु, ऊरु, नाभि, हृदय, सिर, कंठ तथा अत्यन्त तेज शिलाशस्त्र से करना चाहिये । गुड़, मरिच तथा जीरे को पीस कर गुड़िया बनाये । उस पर साध्य वस्तु का नाम लिखकर उसे घी में पका डाले । फिर कराग्र से उसका स्पर्श करते हुए एक सहस्र मन्त्र का जप करे । पुनः पूजा करके उसका भक्षण करे । ऐसा करने से मरण पर्यन्त नर, नारियां तथा राजा वशीभूत होते हैं । अष्टगन्धों को शीतल जल से पीस कर किसी कुमारी के द्वारा ललाट पर तिलक लगाये । ऐसा करने से जगत् वशीभूत होता है ॥११०८-१११५॥ एक सेर चावल को लाल रंग के बछड़ वाली रक्तवर्णा गौ के दूध के साथ नवीन पात्र में संस्कृत अग्नि पर पका कर उसमें घी चीनी मिलाकर एक सौ आठ वार मन्त्र पूर्वक हवन करे । प्रतिपदा में ऐसा करने से महा- लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । शुक्रवार को भी इस तरह करने से नृप की समता प्राप्त होती है । पंचमी में विशेष करके पूर्ववत् होम करना चाहिए । उस तिथि में त्रिमधुयुक्त मालती से हवन करना चाहिये । अन्न-घी से नियम- पूर्वक होम करने से मनुष्य धनाढ्य होता है । घृत एवम् तिल-तंडुल से होम करने से समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति होती है । त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से हवन करने से महालक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो पूर्णिमा से पूर्णिमा तक मधुयुक्त विकसित रक्त कमलों से भक्तिपूर्वक नित्य सहस्र बार हवन करता है, उसे कीर्ति धन तथा पुत्रों की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं ॥१११६-१२३½॥ नारद ! जो एक मास तक मधुयुक्त सहस्र चंपकपुष्पों से होम

नवतितमोऽध्यायः ८३६ लभते स्वर्णनिष्काणां शतं मासेन नारद । पाटलेर्घृतसंसिक्तैस्त्रिसहस्रं हुतैस्तथा ॥१२५॥ दर्शादिमासाल्लभते चित्राणि वसनानि च । कर्पूरचंदनाद्यानि सुगन्धानि तु मासतः ॥१२६॥ वस्तूनि लभते हुद्यैरन्यैर्भोगोपयोगिभिः । शालिभिः क्षीरसिक्तैश्च सप्तमीषु शतं हुतम् ॥१२७॥ तेन शालिसमृद्धिः स्यान्मासैः षड्भिरसंशयम् । तिलैर्हुतैस्तु दिवसैर्वर्षैदारोग्यमाप्नुयात् ॥१२८॥ स्वजन्मर्क्षत्रिषु तथा दूर्वामिञ्जुहुयान्नरः । निरांतको महाभोगः शतं वर्षाणि जीवति ॥१२९॥ गुडूचीतिलदूर्वाभिस्त्रिषु जन्मसु वा हुनेत् । तेनायुःश्रीयशोभोगपुण्यनिध्वादिमान्भवेत् ॥१३०॥ घृतपायसदुग्धैस्तु हुतैस्तेषु त्रिषु क्रमात् । आयुरारोग्यविभवेनृपामात्यो भवेत्तथा ॥१३१॥ सप्तम्यां कदलीहोमात्सौभाग्यं लभतेऽन्वहम् । दूर्वात्रिकैस्तु प्रादेशमानैस्त्रिस्वादुसंयुतैः ॥१३२॥ जुहुयाद्दिनशो घोरे सन्निपातज्वरे तथा । तद्दिनेषु जपेद्विद्यां नित्यशः सलिलं स्पृशन् ॥१३३॥ सहस्रवारं तत्तोयैः स्नानं पानं समाचरेत् । पाकाद्यमपि तैरेव कुर्याद्रोगविमुक्तये ॥१३४॥ साध्यर्क्षवृक्षसंचूर्णं त्र्यूषणं सर्षपं तिलम् । पिष्टं च साध्यपादोत्थरजसा च समन्वितम् ॥१३५॥ कृत्वा पुत्तलिकां सम्यग्धृदये नामसंयुताम् । प्राग्वच्छित्वायसैस्तीक्ष्णैः शस्त्रैः पुत्तलिकां हुनेत् ॥१३६॥ एवं दिनैः सप्तभिस्तु साध्यो वश्यो भवेद्दृढम् । तथाविधां पुत्तलिकां कुंडमध्ये निखन्य च ॥१३७॥ उपर्यग्निं निधायाथ विद्यया दिनशो हुनेत् । त्रिसहस्रं त्रियामायां सर्षपैस्तद्रसाप्लुतः ॥१३८॥ शतयोजनदूरादप्यानयेद्दनितां बलात् । वशयेद्वनितां होमात्कौशिकैर्मधुमिश्रितैः ॥१३९॥ नारिकेरफलोपेतैर्गुडैलक्ष्मीमवाप्नुयात् । तथाज्यसिक्तैः कह्लारैः क्षीराक्तैस्तरुणोत्पलैः ॥१४०॥ करता है, वह सौ स्वर्णमुद्राओं को प्राप्त करता है। जो अमावस्या से लेकर एक मास तक तीन हजार घृतयुक्त पाटल-पुष्पों से हवन करता है, उसे चित्रित वस्त्र, कर्पूर, चन्दन, सुगंधित द्रव्य तथा अन्य भोगोपयोगी सुन्दर वस्तुओं का लाभ होता है। सप्तमी तिथि में दूध युक्त चावल से होम करने से छह मासों में मनुष्य के पास चावल की समृद्धि हो जाती है। तिल से होम करने से एक वर्ष में आरोग्य लाभ होता है। जो नर अपने जन्म-नक्षत्र के दिन दूर्वा से, हवन किया करता है, वह महाभोगी तथा सुप्रसन्न रहते हुए सौ वर्षों तक जीता हैं। गुडूच, तिल तथा दूर्वा से जन्म नक्षत्रों के दिन हवन करने से आयु, लक्ष्मी, यश, भोग, पुण्य तथा निधि की प्राप्ति होती है ॥१२४-१३०॥ घी, खीर तथा दूध से जन्म नक्षत्रों में होम करने से आयु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य का लाभ और राजा एवम् मन्त्री वशीभूत होते हैं सप्तमियों में केले से होम करने वाला सौभाग्य को प्राप्त करता है। सन्निपात ज्वर के नाश के लिए हरें, बहेड़े और आंवले से हवन करना चाहिये। रोगमुक्ति के लिये मन्त्र का सहस्र बार जप करके जल का स्पर्श करे और उसी जल से स्नान, पान तथा भोजन बनाये। साध्यवृक्ष के चूर्ण, सोंठ, मरिच तथा पीपल के चूर्ण, सरसों और तिल को मिला कर पुत्तलिका बनाये। उस (पुत्तलिका) के हृदय पर साध्य का नाम लिख दे। फिर पहले की तरह तीक्ष्ण शस्त्रों से उस पुत्तलिका को काटकर हवन करे। सात दिनों तक ऐसा करने से साध्य निश्चय ही वशीभूत हो जाता है ॥१३१-१३६॥ उस पुत्तलिका को कुंड के मध्य में गाड़कर ऊपर से आग लगा कर दिन में मन्त्र पूर्वक तीन सहस्र बार हवन करे। फिर रात्रि में उसके ऊपर सरसों के तेल तथा सरसों चढ़ाये। ऐसा करने से वह सौ योजन दूर से भी वनिता को बलपूर्वक ला देती है। मधु मिश्रित गुग्गुल से होम करने से रमणी वशीभूत होती है। गुड़ तथा