बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 842, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोननवतितमोऽध्यायः ८२३ कामा बुद्धिरहंकारशब्दस्पर्शस्वरूपिणी । रूपरूपा रसाह्ला च गंधवित्तधृतिस्तथा ॥५१॥ नाभीबीजामृताख्या च स्मृतिदेहात्मरूपिणी । कुसुमा मेखला चापि मदना मदनातुरा ॥५२॥ रेखा संवेगिनी चैव ह्यङ्कुशा मालिनीति च । संशोभिणी तथा विद्राविण्याकर्षणरूपिणी ॥५३॥ आह्लादिनीति च प्रोक्ता तथा संमोहिनीति च । स्तंभिनी जंभिनी चैव वशंकर्यथ रंजिनी ॥५४॥ उन्मादिनी तथैवार्थसाधिनीति प्रकीर्तिता । संपत्तिपूर्णा सा मंत्रमयी द्वंद्वक्षयंकरी ॥५५॥ सिद्धिः संपत्प्रदा चैव प्रियमंगलकारिणी । कामप्रदा निगदिता तथा दुःखविमोचिनी ॥५६॥ मृत्युप्रशमनी चैव तथा विघ्ननिवारिणी । अंगसुंदरिका चैव तथा सौभाग्यदायिनी ॥५७॥ ज्ञानेश्वर्यप्रदा ज्ञानमयी चैव च पंचमी । विंध्यवासनका घोरस्वरूपा पापहारीणी ॥५८॥ तथानंदमयी रक्षा रूपेप्सितफलप्रदा । जयिनी विमला चाथ कामेशी वज्रिणी भगा ॥५९॥ त्रैलोक्यमोहना स्थाना सर्वाशापरिपूरणी । सर्वसंक्षोभणगता सौभाग्यप्रदसंस्थिता ॥६०॥ सर्वार्थसाधकागारा सर्वरोगहरास्थिता । सर्वरक्षाकरास्थाना सर्वसिद्धिप्रदस्थिता ॥६१॥ सर्वानंदमयाधारबिंदुस्थानशिवात्मिका । प्रकृष्टा च तथा गुप्ता ज्ञेया गुप्ततरापि च ॥६२॥ संप्रदायस्वरूपा च कुलकौलनिनिर्गभा । रहस्यापरावरप्राकृत्यैवातिरहस्यका ॥६३॥ त्रिपुरा त्रिपुरेशी च तथैव पुरवासिनी । श्रीमालिनी च सिद्धान्ता महात्रिपुरसुंदरी ॥६४॥ नवरत्नमयद्वीपपवखंडविराजिता । कल्पकोद्यानसंस्था च ऋतुरूषेंद्रियार्चका ॥६५॥ कालमुद्रा मातृकाख्या रत्नदेशोपदेशिका । तत्त्वाग्रहाभिधा मूर्तिस्तथैव विषयद्विपा ॥६६॥ देशकालाकारशब्दरूपा संगीतयोगिनी । समस्तगुप्तप्रकटसिद्धयोगिनिचक्रयुक् ॥६७॥ वह्निसूर्येन्दुभूताह्ला तथात्माष्टाक्षराह्वया । पंचधाचार्यस्वरूपा च नानाव्रतसमाह्वया ॥६८॥ निषिद्धाचाररहिता सिद्धचिह्नस्वरूपिणी । चतुर्द्धा कूर्मभागस्था नित्यार्चास्वरूपिणी ॥६९॥ गंधवित्तधृति, नाभीबीजा, अमृता, स्मृतिदेहा, आत्मरूपिणी, कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, संवे- गिनी, अंकुशा, मालिनी, संक्षोभिणी, विद्राविणी ।।४९ ५३।। आकर्षणरूपिणी, आह्लादिनी, संमोहिनी, स्तंभिनी, जंभिनी, वशंकरी, रंजिनी, ।।५४।। उन्मादिनी, अर्थसाधिनी, संपत्तिपूर्णा, मंत्रमयी, द्वन्द्वक्षयकरी ।।५५।। सिद्धि, संपत्प्रदा, प्रियमंगलकारिणी, कामप्रदा, निगदिता, दुःखविमोचिनी, ।।५६।। मृत्युप्रशमनी, विघ्ननिवारिणी, अंगसुन्दरिका, सौभाग्यदायिनी, ।।५७।। ज्ञानेश्वर्यप्रदा, ज्ञानमयी, पंचमी, विंध्यवासनका, घोरस्वरूपा, पाप- हारिणी, ।।५८।। आनन्दमयी, रक्षारूपा, ईप्सितफलप्रदा, जयिनी, विमला, कामेशी, वज्रिणी, भगा, ।।५९।। त्रैलोक्यमोहनी, स्थाना, निखिल-आशा-परिपूरिणी, सबको संक्षुब्ध करने वाली, सौभाग्य-प्रद-संस्थिता ।।६०।। समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली, अखिल रोगों का नाश करने वाली, सब की रक्षा करने वाली, सकल सिद्धियों को देने वाली, सर्वानन्दमया, मूलाधार और बिन्दु की स्थान, शिवालिका, प्रकृष्टा, गुप्ता, ज्ञेया, गुप्ततरा, संप्रदायस्वरूपा, कौलकुलगर्भगामिनी, रहस्यरूपा, परात्परा, अतिरहस्यका, ।।६१-६३।। त्रिपुरा, त्रिपुरेशी, पुरवासिनी, श्रीमालिनी, सिद्धान्ता, महात्रिपुरसुन्दरी, नवरत्नमय, द्वीपों तथा नवखण्डों में रहनेवाली, कल्पसूपी उद्यान में रहनेवाली, ऋतुरूप इन्द्रियों से पूजित होने वाली, काल-मुद्रारूपिणी, मातृकारूपिणी, रत्न- देशोपदेशिका, तत्त्वा, ग्रहसंज्ञका, मूर्ति, विषयद्विपा, देश-काल-आकार-शब्द-रूपा, संगीतयोगिनी, समस्त गुप्त एवम् प्रकट सिद्धचक्र तथा योगिनी चक्र की अधिष्ठात्री, वह्नि, सूर्य चन्द्र तथा महाभूत कहलाने वाली,