बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२२ नारदीयपुराणम् तार्क्ष्यारूढाश्च मां पांतु तथा व्योमगताश्च ताः । भूतगाः सर्वगाः पान्तु पान्तु देव्यश्च सर्वदा ॥३४॥ भूतप्रेतापिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् । द्रावयंतु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥३५॥ गजाश्वद्वीपिपंचास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः । असंख्याः शक्तयो देव्यः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥३६॥ सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् । कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानंदमास्थितः ॥३७॥ इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् । यस्य संधारणात्मर्त्यो निर्भयो विजयो सुखी ॥३८॥ अथ नाम्नां सहस्रं ते वक्ष्ये सावरणार्चनम् । षोडशानामपि मुने स्वस्वक्रमगतात्मकम् ॥३६॥ ललिता चापि वा कामेश्वरी च भगमालिनी । नित्यक्लिन्ना च भेरुंडा कीर्तिता वह्निवासिनी ॥४०॥ वज्रेश्वरी तथा दूती त्वरिता कुलसुंदरी । नित्या संवित्त्था नीलपताका विजयाह्वया ॥४१॥ सर्वमंगळिका चापि ज्वालामालिनिसंज्ञिता । चित्रा चेति क्रमान्नित्याः षोडशापीष्टविग्रहाः ॥४२॥ कुरुकुल्ला च वाराही द्वे एते चेष्टविग्रहे । वशिनी चापि कामेशी मोहिनी विमलारुणा ॥४३॥ तपिनी च तथा सर्वेश्वरी चाध्यक्ष कौलिनी । मुद्राणंतनुरिष्वर्णरूपा चापार्णविग्रहा ॥४४॥ पाशवर्णशरीरा चाकुर्वर्णमुखपुंदरा । त्रिखंडा स्थापनी सन्निरोधनी चावगुंठनी ॥४५॥ सन्निधानेषु चापाख्या तथा पाशांकुशाभिधा । नमस्कृतिस्तथा संक्षोभणी विद्रावणी तथा ॥४६॥ आकर्षणी च विख्याता तथै वावेशकारिणी । उन्मादिनी महापूर्वा कुशाथो खेचरी मता ॥४७॥ बीजा शक्त्युत्थापना च स्थूलसूक्ष्मपरामिधा । अणिमा लघिमा चैव महिमा गरिमा तथा ॥४८॥ प्राप्तिः प्रकाम्यता चापि चेशिता वशिता तथा । भुक्तिः सिद्धिस्तथैवेच्छा सिद्धिरूपा च कीर्तिता ॥४९॥ ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराहींद्राणी चामुंडा महालक्ष्मीस्वरूपिणी ॥५०॥ मेरी रक्षा करें। गरुड़ पर आसीन देवियां सदा मेरो रक्षा करें। आकाशगामिनी, भूतगामिनी तथा सर्वगामिनी देवियां सर्वदा मेरी रक्षा करें। तथा अपनी शक्तियों के आयुधों से भूत, प्रेत, पिशाच, कृत्या आदिकों का संहार करें। गज, अश्व, व्याघ्र, सिंह तथा गरुड़ पर आरूढ एवम् अखिल आयुधों से युक्त असंख्य शक्ति देवियां सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें ॥३०-३६॥ जो मानव प्रातःकाल तथा सायंकाल इस सर्वरक्षक नित्याकवच का पाठ करता है, वह सर्वदा आनंद को प्राप्त करता है, अशुभ को तो कभी देखता ही नहीं। यह ललिता का मुख- दायक कवच मैंने तुम्हें सुना दिया। जो मनुष्य इसको धारण करेगा, वह निर्भय, विजयी तथा सुखी होगा ॥३७-३८॥ मुने ! अब इसके बाद सोलह नित्याओं के सहस्र नामों को क्रमशः अर्चनविधि पूर्वक बताऊंगा- 'ललिता, कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ना, भेरुंडा, वह्निवासिनी, वज्रेश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, संवित्, नीलपताका, विजया, सर्वमंगळिका, ज्वालामालिनी तथा चित्रा-ये सोलहों नित्यायै इष्टांवग्रहा कहलाती हैं। कुरुकुल्ला तथा वाराही ये दोनों भी इष्टविग्रहा हैं। वशिनी, कामेशी, मोहिनी, विमला, अरुणा, तपिनी, सर्वेश्वरी, कौलिनी, मुद्रातनु, इषूवर्णरूपां, चापवर्णविग्रहा, पाशवर्णशरीरा, चातुवर्णं देहा (?), त्रिखंडा, स्थापनी, सन्निरोधनी, अवगुण्ठनी, समीपेष्वापा, पाशांकुशा, मनस्कृति, संक्षोभणी, विद्रावणी, आकर्षणी, आवेश- कारिणी, उन्मादिनी, महापूर्वा, कुशा, खेचरी, बीजा, शक्त्युत्थापना, स्थूलसूक्ष्मपरा, अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्रकाम्यता, ईशिता, वशिता, भुक्ति, सिद्धि, इच्छासिद्धि, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, महालक्ष्मीस्वरूपिणी, कामा, बुद्धि, अहंकार-शब्द-स्पर्श-स्वरूपिणी, रूपरूपा, रसा,