बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८७ सुप्रसन्नमना नत्वा ययौ नारायणांतिकम् । तत्रापि नारदोऽभीक्ष्णं गतागतपरायणः ॥२४॥ सेवितं योगिभिः सिद्धैर्नारायणमतोषयत् । एतद्वः कीर्तितं विप्रा नारदीयं महत्कथा ॥२५॥ उपाख्यानं वेदसमं सर्वशास्त्रनिदर्शनम् । चतुष्पादसमायुक्तं शृण्वतां ज्ञानवर्द्धनम् ॥२६॥ य एतत्कीर्तयेद्विप्रा नारदीयं शिवालये । समाजे द्विजमुख्यानां तथा केशवमन्दिरे ॥२७॥ मथुरायां प्रयागे च पुरुषोत्तमसन्निधौ । सेतौ काञ्च्यां कुशस्थल्यां गंगाद्वारे कुशस्थले ॥२८॥ पुष्करेषु नदीतीरे यत्र कुत्रापि भक्तिमान् । स लभेत्सर्वयज्ञानां तीर्थानां च फलं महत् ॥२९॥ दानानां चापि सर्वेषां तपसां चाप्यशेषतः । उपवासपरो वापि हविष्याशी जितेंद्रियः ॥३०॥ श्रोता चैव तथा वक्ता नारायणपरायणः । शिवभक्तिरतो वापि शृण्वन् सिद्धिमवाप्नुयात् ॥३१॥ अस्मिन्नशेषपुण्यानां सिद्धीनां च समुद्भवः । कथितः सर्वपापघ्नः पठतां शृण्वतां सदा ॥३२॥ कलिदोषहरं पुंसां सर्वसंपत्तिवर्द्धनम् । सर्वेषामभीप्सितं चेदं सर्वज्ञानप्रकाशकम् ॥३३॥ शैवानां वैष्णवानां च शाक्तानां सूर्यसेविनाम् । तथैव गाणपत्यानां वर्णाश्रमवतां द्विजाः ॥३४॥ तपसां च व्रतानां च फलानां संप्रकाशकम् । मंत्राणां चैव यंत्राणां वेदानानां विभागशः ॥३५॥ तथागमानां सांख्यानां वेदानां चैव संग्रहम् । य एतत्पठते भक्त्या शृणुयाद्वा समाहितः ॥३६॥ स लभेद्वांछितान्कामान्देवादिखपि दुर्लभान् । श्रुत्वेदं नारदीयं तु पुराणं वेदनिरूपितम् ॥३७॥ वाचकं पूजयेद्भक्त्या धनरत्नांशुकादिभिः । भूमिदानैर्गवां दानै रत्नदानैश्च सर्वम् ॥३८॥ हस्त्यश्वस्थदानैश्च प्रीणयेत्सततं गुरुम् । यस्तु व्याकुरुते विप्राः पुराणं धर्मसंग्रहम् ॥३९॥ से उन्हें प्रणाम करके वे नारायण के समीप चले गये ॥१७-२३॥ वहाँ भी गमनागमन में समर्थ नारद ने योगियों एवम् सिद्धों से सुसेवित नारायण को संतुष्ट कर लिया । विप्रवृन्द ! यह नारदीय उपाख्यान, जो अखिल शास्त्रों का निदर्शन, चार पादों से युक्त, वेदतुल्य और श्रोता- [....]ढ़ाने वाला है, आप लोगों को सुना दिया । द्विजो ! जो भक्तिमान् मनुष्य इस नारदीय उपाख्या- ...वाले, उत्तम ब्राह्मणों के समाज, विष्णुमंदिर, मथुरा, प्रयाग, पुरुषोत्तम क्षेत्र, सेतु, कांची, द्वारका, हरिद्वार, कुशस्थल और पुष्कर में या जहाँ-कहीं भी नदी तट पर बांचता है, उसे निखिल यज्ञों, तीर्थों, दानों तथा तपों का महान् फल प्राप्त होता है । उपवास, हविष्य-भोजन तथा इंद्रियसंयम करते हुए नारायण या शिव के भक्त वक्ता तथा श्रोता सिद्धि को प्राप्त करते हैं । इस उपाख्यान में निखिल धर्मों तथा सिद्धियों की उत्पत्ति बताई गई है, जो पढ़ने तथा सुनने वालों के समस्त पापों का नाश करती है ॥२४-३२॥ यह उपा- ख्यान मनुष्यों के कलिजन्य दोषों का हरण करने वाला, सकल संपत्तियों को बढ़ाने वाला, निखिल ज्ञानों को प्रकाशित करने वाला और सब को अभीप्सित फल देने वाला है । द्विजगण ! यह शैव, वैष्णव, शाक्त, सूर्यसेवी, गणपति के उपासक, वर्णाश्रमी सभी को अभीष्ट है और यह समस्त ज्ञानों एवं तप तथा व्रतों के फलों का प्रका- शक है । इसमें मंत्रों, यन्त्रों, वेदांगों, आगमों, सांख्यों एवम् वेदों का संग्रह है । जो व्यक्ति सावधान होकर भक्ति- पूर्वक इसका पाठ या श्रवण करता है, वह देवदुर्लभ वांछित फलों को प्राप्त करता है । इस वेदानुकूल नारदीय- पुराण को सुनकर धन, रत्न, वस्त्र, आदि से भक्तिपूर्वक वाचक की पूजा करे । भूमिदान, गोदान, रत्नदान और हाथी, घोड़े तथा रथदान से गुरु को सदा संतुष्ट करना चाहिए । विप्रवृन्द ! जो इस चतुर्वर्ग के फल को देने
६८८ नारदीयपुराणम् चतुर्वर्गप्रदं नृणां कोन्वस्तत्समो गुरुः । कायेन मनसा वाचा धनाद्यैरपि संततम् ॥४०॥ प्रियं समाचरेत्तस्य गुरोर्द्धर्मोपदेशिनः । श्रुत्वा पुराणं विधिवद्धोमं कृत्वा सुरार्चनम् ॥४१॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छतं मिष्टान्नपायसैः । दक्षिणां प्रददेच्छक्त्या भक्त्या प्रीयेत माधवः ॥४२॥ यथा श्रेष्ठा नदी गंगा पुष्करं च सरो यथा । काशी पुरी नवं मेरुर्देवो नारायणो हरिः ॥४३॥ कृतं युगं सामवेदो धेनुर्विप्रोऽन्नमंबु च । मार्गा मृगेंद्रः पुक्षोऽश्वत्थः प्रह्लाद आननम् ॥४४॥ उच्चैःश्रवा वसंतश्च जपः शेषोऽर्यमा धनुः । पावको विष्णुरिंद्रश्च कपिलो वाक्पतिः कविः ॥४५॥ अर्जुनो हनुमान्धर्मश्चित्तं चित्ररथोऽम्बुजम् । उर्वशी कांचनं यद्वच्छ्रेष्ठाश्चैते स्वजातिषु ॥४६॥ तथैव नारदीयं तु पुराणेषु प्रकीर्तितम् । शांतिरस्तु शिवं चास्तु सर्वेषां वो द्विजोत्तमाः ॥४७॥ गमिष्यामि गुरोः पार्श्वं व्यासस्यामिततेजसः । इत्युक्त्वाभ्यर्चितः सूतः शौनकाद्यैर्महात्मभिः ॥४८॥ आपृष्टश्च पुनः सर्वैर्दर्शनार्थं गुरोर्ययौ । तेऽपि सर्वे द्विजश्रेष्ठाः शौनकाद्याः समाहिताः ॥४९॥ श्रुतं सम्यगनुष्ठाय तत्र तस्थुश्च सत्रिणः ॥४९॥ कलिकल्मषविषनाशनं हरिं यो जपपूजनविधिमेवजोषसेवी । स तु निर्विषमनसा समेत्य यागं लभते सततप्रभीप्सितं हि लोकम् ॥५०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे पुराणसंहितावर्णनं नाम पंचविंशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१२५॥ वाले धर्मसंग्रहभूत पुराण का उपदेश करता है, उसके समान अन्य कोई गुरु नहीं होता ! शरीर, मन, वाणी तथा धन आदि से प्रिय आचरण करना चाहिए ॥३३-४०३॥ पुराणश्रवणानन्तर विधिवूवर्क हवन तथा देवार्चन करके सौ ब्राह्मणों को मधुर तथा खीर खिलाये। पश्चात् उन्हें भक्तिपूर्वक दक्षिणा दे; क्योंकि भक्ति से माधव प्रसन्न होते हैं। जैसे नदियों में गंगा, सरोवरों में पुष्कर, पुरियों में काशी, पर्वतों में मेरु, देवों में नारायण, युगों में सत्ययुग, वेदों में सामवेद और अपनी अपनी जातियों में धेनु, विप्र, अन्न, जल, योग, सिंह, सारस, हंसों में प्रह्लाद, मुख, उच्चैःश्रवा, वसंत, जप, अनंतशेष, अर्यमा, धनु, पावक, विष्णु, इंद्र, कपिल, बृहस्पतिः होता रहता है, हनुमान्, कुश, चित्त, चित्ररथ, कमल, उर्वशी तथा सुवर्ण श्रेष्ठ हैं, उसी तरह समस्त पुराणों में नारदीयपुराण श्रेष्ठ है। द्विजवर्यवृन्द ! आप लोगों का कल्याण हो, शान्ति मिले ! अब मैं अमिततेजस्वी गुरु व्यास के समीप जाऊँगा ।४१-४७३॥ इतना कहकर, महात्मा शौनक आदि से संमानित हो, पुनः उनसे विदा ले, गुरु के दर्शनार्थ सूतजी चले गये । शौनक आदि द्विजवर भी सावधान होकर सुने हुए पुराण के अनुसार यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त हुए। जो व्यक्ति कलि-पातक रूप विष को नष्ट करने वाले हरि के जप-पूजन रूप ओषधि का सेवन करता है, वह विष (पाप) रहित मन से सतत याग (के पुण्य) को प्राप्त कर मनोवांछित लोक को जाता है ॥४८-५०॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में पुराण-महिमा-वर्णन नामक एकसौ पच्चीसवां अध्याय समाप्त ॥१२५॥ (नारदीयपुराण का पूर्वभाग समाप्त)
हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्रकाशित पुराण साहित्य • (मूल-पाठ, हिन्दी अनुवाद एवं पाठान्तर सहित) १. ब्रह्मपुराणम् अनुवादक—श्री तारिणीश झा १५०.०० २. ब्रह्मवैवर्तपुराणम् [१, २, ३] अनुवादक—श्री तारिणीश झा २६०.०० ३. अग्निपुराणम् [१, २] अनुवादक—श्री तारिणीश झा १५०.०० ४. वायुपुराणम् अनुवादक—पं० रामप्रताप त्रिपाठी, शास्त्री १२०.०० मुद्रणाधीन १. बृहन्नारदीयपुराणम् (उत्तर भाग:) २. मत्स्यपुराणम् (पूर्व भाग:) • प्रकाशक हिन्दी साहित्य सम्मेलन ⊙ प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग ० इलाहाबाद