बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पंचम में पापग्रह हो और गुरु से पाँचवें भाव में शनि हो, पंचमेश भौम से युक्त हो, लग्नेश धनभाव में हो तो जितने बालक उत्पन्न हो सभी मर जावें।।१०३।। अथ षष्ठभावफलम्- षष्ठाधिपोऽपि पापश्चेद्देहे वाप्यष्टमे स्थितः । तदा व्रणो भवेद्देहे षष्ठस्थानेऽप्ययं विधिः ।।१०४।। षष्ठेश (६ठे भाव का स्वामी) पापग्रह हो और जन्मलग्न वा आठवें भाव में बैठा हो तो शरीर में व्रण (घाव) के चिह्न होते हैं। छठे भाव में हो तो भी वही फल होता है।।१०४।। एवं पित्रादिभावेशास्तत्तत्कारकसंयुताः । व्रणाधिपयुताश्चापि षष्ठाष्टमयुता यदि ।।१०५।। इसी प्रकार पिता आदि भावैशों के साथ षष्ठेश से युत होकर ६/८ भाव में हो तो उनके शरीर में भी व्रण के चिह्न कहना चाहिए। सूर्य षष्ठेश हो तो शिर में ।।१०५।। तेषामपि व्रणं वाच्यमादित्ये च शिरोव्रणम्। इन्दुना च मुखे कण्ठे भौमज्ञेन च नाभिषु ।।१०६।। चंद्रमा हो तो मुख या कंठ में, भौम-बुध हों तो नाभि में।।१०६।। गुरुणा नासिकायां च भृगुणा नयने पदे। शनिना राहुणा कुक्षौ केतुना च तथा भवेत् ।।१०७।। गुरु हो तो नाक में, शुक्ल हो तो आँख और पैर में, शनि-राहु हों तो कुक्षि (काँख) में, केतु से भी कुक्षि में चिह्न कहना चाहिए।।१०७।। लग्नाधिपः कुजक्षेत्रे बुधस्य यदि संस्थितः । यत्र कुत्र स्थितो ज्ञेन वीक्षितो मुखरुक्प्रदः ।।१०८।। लग्नेश भौम की राशि में वा बुध की राशि में होकर कहीं पर बैठा हो तथा बुध से देखा जाता हो तो मुख में रोग होता है।।१०८।। कुष्ठयोगः- लग्नाधिपो कुजबुधौ चन्द्रेण यदि संयुतौ । राहुणा शनिना सार्धं कुष्ठं तत्र विनिर्दिशेत् ।।१०९।। यदि भौम वा बुध लग्नेश होकर चंद्रमा, राहु वा शनि से युत हों तो कुष्ठ- रोग होता है।।१०९।।