बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशभावविचाराध्यायः १६५ लग्नाधिपं विना लग्ने स्थितश्चेत्तमसा शशी । श्वेतकुष्ठं तथा कृष्णकुष्ठं च शनिना सह ।।११० ।। कुजेन रक्तकुष्ठं स्यात्तत्तदेवं विचारयेत् । यदि लग्नेश को छोड़कर चंद्रमा राहु के साथ लग्न में हो तो सफेद कुष्ठ होता है। शनि के साथ हो तो काला कुष्ठ, भौम के साथ हो तो लाल कुष्ठ होता है।।११०।। गण्डादिरोगयोगाः- लग्ने षष्ठाष्टमाधीशौ रविणा यदि संस्थितौ ।।१११ ।। ज्वरगण्डः कुजे ग्रन्थिः शस्त्रव्रणमथापि वा । बुधेन पित्तं गुरुणा रोगाभावं विनिर्दिशेत् ।।११२ ।। यदि सूर्य से युत होकर षष्ठेश अष्टमेश लग्न में हों तो ज्वर से उत्पन्न गंडरोग, भौम से युत हो तो गठिया वा शस्त्र से आघात, बुध हो तो पित्त से उत्पन्न गंड और गुरु हो तो रोग का अभाव कहना चाहिए।।११२।। स्त्रीभिः शुक्रेण शनिना वायुना संयुतो यदि । गण्डश्चाण्डालतो नाभौ तमःकेत्वोर्युते भयम् ।।११३।। शुक्र से युत हो तो स्त्रीजनित रोग, शनि से युत हो तो वायुजनित गंड, राहु से युत हो तो चांडाल से नाभि में गंडरोग और केतु से युत हो तो भय होता है।।११३।। चन्द्रेण गण्डः सलिलैः कफश्लैष्मादिना भवेत् । एवं पित्रादिभावानां तत्तत्कारकयोगतः ।।११४।। चंद्रमा से युत हो तो जल से तथा कफरोग होता है। इसी प्रकार पिता आदि के भावेशों से उन लोगों के भी रोग का विचार करना चाहिए।।११४।। रोगप्राप्तिसमयः- गण्डो तेषां भवेदेवमूह्यमत्र मनीषिभिः । रोगस्थानगते पापे तदीशे पापसंयुते ।।११५।। राहुणा संयुते मन्दे सर्वदा रोगसंयुतः । रोगस्थानगते भौमे तदीशे रन्ध्रसंयुते ।।११६।। षड्वर्षे द्वादशे वर्षे ज्वररोगी भवेन्नरः ।