भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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१६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् छठे स्थान में पापग्रह हो, षष्ठेश पापयुत हो, राहु से शनि युत हो तो सर्वदा रोगी होता है। षष्ठस्थान में भौम हो और षष्ठेश आठवें भाव में हो तो छठे, बारहवें वर्ष में ज्वररोग से युक्त होता है ।।११६।। षष्ठस्थानगते जीवे तद्गृहे चन्द्रसंयुते ।।११७।। द्वाविंशकोनविंशके कुष्ठरोगं विनिर्दिशेत्। छठे भाव में गुरु हो और गुरु की राशि में चंद्रमा हो तो २२वें, १९- वें वर्ष में कुष्ठरोग होता है ।।११७।। रोगस्थानं गतो राहुः केन्द्रे मान्दिसमन्वितः ।।११८।। लग्नेशे नाशराशिस्थे षड्विंशे क्षयरोगता। छठे भाव में राहु हो, केन्द्र में गुलिक हो; लग्नेश आठवें भाव में हो तो २६वें वर्ष में क्षयरोग होता है ।।११८।। व्ययेशे रोगराशिस्थे तदीशे व्ययराशिगे ।।११९।। त्रिंशद्वर्षेकोनवर्षे गुल्मरोगं विनिर्दिशेत्। व्ययेश छठे भाव में हो और षष्ठेश बारहवें भाव में हो तो ३०वें वा २९वें वर्ष में गुल्मरोग होता है ।।११९।। रिपुस्थानगते चन्द्रे शनिना संयुते यदि ।।१२०।। पञ्चपञ्चाशताब्देषु रक्तकुष्ठं विनिर्दिशेत्। छठे भाव में शनि से युत चंद्रमा हो तो ५५वें वर्ष में रक्तकुष्ठ होता है ।।१२०।। लग्नेशे लग्नराशिस्थे मन्दे शत्रुसमन्विते ।।१२१।। एकोनषष्टिवर्षे तु वातरोगादितो भवेत्। लग्नेश लग्न में हो और शनि छठे भाव में हो तो ५९वें वर्ष में वात- रोग होता है ।।१२१।। रन्ध्रेशे रिपुराशिस्थे व्ययेशे लग्नसंस्थिते ।।१२२।। चन्द्रे षष्ठेशसंयुक्ते वसुवर्षे मृगाद्भयम्। अष्टमेश छठे भाव में हो और व्ययेश लग्न में हो, चन्द्रमा षष्ठेश से युत हो तो ८वें वर्ष में मृग से भय होता है ।।१२२।। षष्ठाष्टमगतो राहुस्तस्मादष्टगते शनौ ।।१२३।। बालस्य जन्मतो विज्ञ आद्ये चैव द्वितीयके। वत्सरेऽग्निभयं तस्य त्रिवर्षे पक्षिदोषभाक् ।।१२४।।