भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 800 में से

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द्वादशभावविचाराध्यायः १६७ छठे, आठवें भाव में राहु हो, उससे आठवें भाव में शनि हो तो, बालक को १, २. वर्ष में अग्नि का भय और ३ वर्ष में पक्षि का भय होता है।।१२३।। षष्ठाष्टमगते सूर्ये तद्व्यये चन्द्रसंयुते। पञ्चमे नवमेऽब्दे च जलभीतिं विनिर्दिशेत् ।।१२५।। ६, ८ भाव में सूर्य हो, उससे बारहवें चन्द्रमा हो तो ५, ९ वर्ष में जल से भय होता है।।१२४।। अष्टमे मन्दसंयुक्ते रन्ध्राद्धे द्वादशे कुजः। त्रिंशांके च दशांके च स्फोटकादि विनिर्दिशेत् ।।१२६।। आठवें भाव में शनि हो, उससे बारहवें भाव में भौम हो तो ३०वें वा १० वें वर्ष में चेचक आदि का भय होता है।।१२६।। रन्ध्रेशे राहुसंयुक्ते तदंशे रन्ध्रकोणगे। द्वाविंशेऽष्टादशे वर्षे ग्रन्थिमेहादिपीडनम् ।।१२७।। अष्टमेश राहु से युत होकर अपने ही अंश में आठवें ५/९ भाव में हो तो २२वें, १८वें वर्ष में गठिया, प्रमेह आदि से पीड़ा होती है।।१२७।। लाभेशे रिपुभावस्थे तदीशे लाभराशिगे। एकत्रिंशदेकचत्वारि शत्रुमूलाद्धनक्षयः ।।१२८।। लाभेश छठे भाव में हो और षष्ठेश लाभ भाव में होतो ३१वें, ४१वें वर्ष में शत्रु द्वारा द्रव्य का व्यय होता है।।१२८।। सुतेशे रिपुभावस्थे षष्ठेशे गुरुसंयुते। व्ययेशे लग्नभावस्थे तस्य पुत्रो रिपुर्भवेत् ।।१२९।। पंचमेश छठे भाव में हो, षष्ठेश गुरु से युत हो और व्ययेश लग्न में हो तो उसका पुत्र शत्रु होता है।।१२९।। लग्नेशे षष्ठराशिस्थे तदीशे षष्ठराशिगे। दशमैकोनविंशे च शुनकाद्भीतिरुच्यते ।।१३०।। लग्नेश छठे भाव में हो, षष्ठेश षष्ठ भाव में हो तो १०वें, १९वें वर्ष में कुत्ता से भय होता है।।१३०।। अथ सप्तमभावफलम्- कलत्रपो विनास्वर्क्षषडादित्रयसंस्थितः। रोगिणीं कुरुते नारीं तथा तुङ्गादिकं विना ।।१३१।।

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