बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशभावविचाराध्यायः १६९ शनि, राहु, केतु हों तो नीचजाति ओर रजोधर्मवती से सम्पर्क होता है। सप्तम में भौम हो तो अच्छे स्तनोंवाली, शनि हो तो रोगिणी, दुर्बल, भौम-गुरु हों तो कठिन ऊँचे कुचों वाली, शुक्र हो तो मोटे उन्नत कुचों वाली स्त्री होती है।।१३८।। पापे द्वादशकामस्थे क्षीणचन्द्रस्तु पञ्चमे। जातश्च भार्यावश्यः स्यादिति जातिविरोधकृत्।।१३९।। १२वें, ७वें भाव में पापग्रह हों और क्षीण चंद्रमा पाँचवें भाव में हो तो पुरुष स्त्री के वश में होता है और जाति से विरोध करने वाला होता है।।१३९।। जामित्रे मन्दभौमे च तदीशे मन्दभूमिगे।।१४०।। वेश्या वा जारिणी वापि तस्य भार्या न संशयः। भौमांशकगते शुक्रे भौमक्षेत्रगतेऽथवा।।१४१।। भौमयुक्ते च दृष्टे वा भगचुम्बनतत्परः। सातवें भाव में शनि-भौम हों अथवा सप्तमेश शनि के गृह में हो तो उसकी स्त्री वेश्या या जारिणी होती है। यदि शुक्र-भौम के नवांश में हो वा भौम की राशि में हो अथवा भौम से युत वा दृष्ट हो तो पुरुष भगचुम्बन करने वाला होता है।।१४१।। मन्दांशकगते शुक्रे मन्दक्षेत्रगतेऽपि वा।।१४२।। मन्दयुक्ते च दृष्टे च शिश्नचुम्बनतत्परः। शुक्र शनि के नवांश में अथवा शनि की राशि में हो, शनि से युत वा दृष्ट हो तो शिश्न (लिंग) का चुम्बन करने वाला होता है।।१४२।। दारेशे स्वोच्चराशिस्थे दारे शुभसमन्विते। दारे लग्नेशसंयुक्ते सत्कलत्रसमन्वितः।।१४३।। सप्तमेश अपनी उच्चराशि में हो और सप्तम में शुभग्रह हों तथा लग्नेश भी सातवें हो तो अच्छी स्त्री से युक्त होता है।।१४३।। कलत्रनाथे रिपुनीचसंस्थे मूढोऽथवा पापनिरीक्षिते वा। कलत्रभे पापयुते च दृष्टे कलत्रहानिं प्रवदन्ति सन्तः।।१४४।। सप्तमेश शत्रु राशि में वा अपनी नीचराशि में हो अथवा अस्तंगत हो, पापग्रह से युत वा दृष्ट हो और सप्तम भाव पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो स्त्री की हानि होती है।।१४४।।