बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् षष्ठाष्टमव्ययस्थे चेन्मदेशो दुर्बलो यदि। नीचराशिगतो वापि दारनाशं विनिर्दिशेत् ।।१४५ ।। सप्तमेश दुर्बल होकर ६/८/१२वें भाव मे हो वा नीचराशि में हो तो स्त्री का नाश होता है।।१४५।। कलत्रस्थानगे चन्द्रे तदीशे व्ययराशिगे। कारको बलहीनश्च दारसौख्यं न विद्यते ।।१४६ ।। सप्तम भाव में चंद्रमा हो और सप्तमेश १२वें भाव में हो और कारक निर्बल हो तो स्त्री का सुख नहीं होता है।।१४६।। भार्याधिपे नीचगृहे च पापे पापर्क्षगे वा बहुपापयुक्ते। क्लीबे ग्रहे सप्तमराशिसंस्थे तस्योदयांशे द्विकलत्रसिद्धिः।। सप्तमेश नीचराशि में हो और पापग्रह हो, पापग्रह की राशि में हो वा पापग्रह से युत हो और नपुंसक ग्रह सातवें भाव में हो वा नपुंसक की राशि सातवें भाव में हो तो २ स्त्रियाँ होती हैं।।१४७।। कलत्रस्थानगे भौमे शुक्रे जामित्रगे शनौ। लग्नेशे रन्ध्रराशिस्थे कलत्रत्रयवान् भवेत् ।।१४८।। सातवें भाव में भौम, शुक्र, शनि हों और लग्नेश आठवें भाव में हो तो ३ स्त्रियाँ होती हैं।।१४८।। द्विस्वभावगते शुक्रे स्वोच्चे तद्राशिनायके। दारेशे बलसंयुक्ते बहुदारसमन्वितः ।।१४९।। शुक्र द्विस्वभाव राशि में हो, द्विस्वभाव राशि का स्वामी अपने उच्च में हो और सप्तमेश बली हो तो अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।१४९।। विवाहसमयमाह- दारेशे शुभराशिस्थे स्वोच्चस्वर्क्षगतो भृगुः। पञ्चमे नवमेऽब्दे च विवाहः प्रायशो भवेत् ।।१५०।। सप्तमेश शुभग्रह की राशि में हो, शुक्र अपने उच्च या अपनी राशि में हो तो पाँचवें या नवें वर्ष में विवाह होता है।।१५०।। दारस्थानगते सूर्ये तदीशे भृगुसंयुते। सप्तमैकादशे वर्षे विवाहः प्रायशो भवेत् ।।१५१।। सप्तम भाव में सूर्य हो, सप्तमेश शुक्र से युत हो तो ७वें या १२वें वर्ष में विवाह होता है।।१५१।।