भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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१७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्नाष्टमकर्मेशमन्दाः केन्द्रत्रिकोणयोः। लाभे वा संस्थितास्तद्वत् दिशेयुर्दीर्घमायुषम् ।।१७४।। लग्नेश, अष्टमेश, कर्मेश और शनि केन्द्र-त्रिकोण और लाभ भाव में हों तो दीर्घायु होती है।।१७४।। अष्टमाधिपतौ केन्द्रे लग्नेशे बलवर्जिते। विंशद्वर्षाण्यसौ जीवेद्द्वात्रिंशत्परमायुषम् ।।१७५ ।। अष्टमेश केन्द्र में हो और लग्नेश निर्बल हो तो २० वर्ष या ३२ वर्ष की आयु होती है।।१७५।। रन्ध्रेशे नीचराशिस्थे रन्ध्रे पापग्रहैर्युते। लग्नेशे दुर्बले यस्य अल्पायुर्भवति ध्रुवम् ।।१७६ ।। अष्टमेश अपनी नीच राशि में हो, अष्टम भाव में पापग्रह हों और लग्नेश दुर्बल हो तो अल्पायु होती है।।१७६।। रन्ध्रेशे पापसंयुक्ते रन्ध्रे पापग्रहैर्युते। व्यये क्रूरग्रहैर्जाते जातमात्रं मृतिर्भवेत् ।।१७७।। अष्टमेश पापग्रह से युक्त हो, आठवें भाव में पापग्रह हों और बारहवें भाव में पापग्रह हों तो उत्पन्न होते ही मृत्यु हो जाती है।।१७७।। केन्द्रत्रिकोणपापस्थाः षष्ठाष्टेषु शुभा यदि। लग्ने रन्ध्रेशनीचस्थे जातः सद्यो मृतो भवेत् ।।१७८ ।। केन्द्र-त्रिकोण में पापग्रह हों, ६/८ भाव में शुभग्रह हों, लग्न में अष्टमेश अपनी नीचराशि का हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।१७८।। पञ्चमे पापसंयुक्ते रन्ध्रेशे पापसंयुते। रन्ध्रे पापग्रहैर्युक्ते अल्पायुष्यः प्रजायते ।। १७९ ।। पाँचवें भाव में पापग्रह हो, अष्टमेश पापग्रह से युत हो और अष्टम भाव पापग्रह से युत हो तो अल्पायु होती है।।१७।। रन्ध्रेशे रन्ध्रराशिस्थे चन्द्रे पापसमन्विते। शुभदृग्रहिते विद्वन् मासान्ते च मृतिर्भवेत् ।।१८० ।। अष्टमेश आठवें भाव में और चन्द्रमा पापयुक्त हो, शुभग्रह से न देखा जाता हो तो मास के अंत में मृत्यु होती है।।१८०।। लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे चन्द्रे लाभसमन्विते। रन्ध्रस्थानगते जीवे दीर्घायुष्यं न संशयः ।।१८१ ।।