भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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द्वादशभावविचाराध्यायः १७३ आठवें भाव में शुक्र हो और अष्टमेश शनि की राशि में हो तो १२- वें या २९वें वर्ष में स्त्री की मृत्यु होती है।।१६६।। लग्नेशे नीचराशिस्थे धनेशे निधनं गते। त्रयोदशे तु सम्प्राप्ते कलत्रस्य मृतिं वदेत्।।१६७।। लग्नेश अपनी नीचराशि में हो और धनेश आठवें भाव में हो तो १३वें वर्ष में स्त्री की मृत्यु होती है।।१६७।। शुक्राज्जामित्रगे चन्द्रे चन्द्राज्जामित्रगे बुधे। रन्ध्रेशे सुतभावस्थे प्रथमं दशमाब्दिकम्।।१६८।। द्वाविंशे च द्वितीयं च त्रयस्त्रिंशं तृतीयकम्। विवाहं लभते मर्त्यो नात्र कार्या विचारणा।।१६९।। शुक्र से सातवें भाव में चन्द्रमा हो और चन्द्रमा से सातवें भाव में बुध हो तथा अष्टमेश पाँचवें भाव में हो तो पहला विवाह १०वें वर्ष में, दूसरा २२वें वर्ष में और तीसरा ३३वें वर्ष में होता है।।१६९।। अथाष्टमभावफलमाह- आयुःस्थानाधिपः पापैः सहैव यदि संस्थितः। करोत्यल्पायुषं जातं लग्नेशोऽप्यत्र संस्थितः।।१७०।। अष्टमेश पापग्रह और लग्नेश के साथ आठवें भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है।।१७०।। एवं हि शनिना चिन्ता कार्या तर्कैर्विचक्षणैः। कर्माधिपेन च तथा चिन्तनं कार्यमायुषः।।१७१।। इसी प्रकार तर्क द्वारा शनि और कर्मेश से भी आयु का विचार करना चाहिए।।१७१।। षष्ठे व्ययेऽपि षष्ठेशो व्ययाधीशो रिपौ व्यये। लग्नेऽष्टमे स्थितो वापि दीर्घमायुः प्रयच्छति।।१७२।। षष्ठेश ६ या १२ भाव में हो और व्ययेश ६ या १२ भाव में हो अथवा लग्न वा आठवें भाव में हो तो दीर्घायु होता है।।१७२।। स्वस्थाने स्वांशके वापि मित्रेशे मित्रमन्दिरे। दीर्घायुषं करोत्येव लग्नेशोऽष्टमपः पुनः।।१७३।। लग्नेश, अष्टमेश और पंचमेश अपने भाव में, अपने नवांश में वा मित्र की राशि में हो तो दीर्घायु होता है।।१७३।।