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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

द्वादशभावविचाराध्यायः १७३ आठवें भाव में शुक्र हो और अष्टमेश शनि की राशि में हो तो १२- वें या २९वें वर्ष में स्त्री की मृत्यु होती है।।१६६।। लग्नेशे नीचराशिस्थे धनेशे निधनं गते। त्रयोदशे तु सम्प्राप्ते कलत्रस्य मृतिं वदेत्।।१६७।। लग्नेश अपनी नीचराशि में हो और धनेश आठवें भाव में हो तो १३वें वर्ष में स्त्री की मृत्यु होती है।।१६७।। शुक्राज्जामित्रगे चन्द्रे चन्द्राज्जामित्रगे बुधे। रन्ध्रेशे सुतभावस्थे प्रथमं दशमाब्दिकम्।।१६८।। द्वाविंशे च द्वितीयं च त्रयस्त्रिंशं तृतीयकम्। विवाहं लभते मर्त्यो नात्र कार्या विचारणा।।१६९।। शुक्र से सातवें भाव में चन्द्रमा हो और चन्द्रमा से सातवें भाव में बुध हो तथा अष्टमेश पाँचवें भाव में हो तो पहला विवाह १०वें वर्ष में, दूसरा २२वें वर्ष में और तीसरा ३३वें वर्ष में होता है।।१६९।। अथाष्टमभावफलमाह- आयुःस्थानाधिपः पापैः सहैव यदि संस्थितः। करोत्यल्पायुषं जातं लग्नेशोऽप्यत्र संस्थितः।।१७०।। अष्टमेश पापग्रह और लग्नेश के साथ आठवें भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है।।१७०।। एवं हि शनिना चिन्ता कार्या तर्कैर्विचक्षणैः। कर्माधिपेन च तथा चिन्तनं कार्यमायुषः।।१७१।। इसी प्रकार तर्क द्वारा शनि और कर्मेश से भी आयु का विचार करना चाहिए।।१७१।। षष्ठे व्ययेऽपि षष्ठेशो व्ययाधीशो रिपौ व्यये। लग्नेऽष्टमे स्थितो वापि दीर्घमायुः प्रयच्छति।।१७२।। षष्ठेश ६ या १२ भाव में हो और व्ययेश ६ या १२ भाव में हो अथवा लग्न वा आठवें भाव में हो तो दीर्घायु होता है।।१७२।। स्वस्थाने स्वांशके वापि मित्रेशे मित्रमन्दिरे। दीर्घायुषं करोत्येव लग्नेशोऽष्टमपः पुनः।।१७३।। लग्नेश, अष्टमेश और पंचमेश अपने भाव में, अपने नवांश में वा मित्र की राशि में हो तो दीर्घायु होता है।।१७३।।

१७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्नाष्टमकर्मेशमन्दाः केन्द्रत्रिकोणयोः। लाभे वा संस्थितास्तद्वत् दिशेयुर्दीर्घमायुषम् ।।१७४।। लग्नेश, अष्टमेश, कर्मेश और शनि केन्द्र-त्रिकोण और लाभ भाव में हों तो दीर्घायु होती है।।१७४।। अष्टमाधिपतौ केन्द्रे लग्नेशे बलवर्जिते। विंशद्वर्षाण्यसौ जीवेद्द्वात्रिंशत्परमायुषम् ।।१७५ ।। अष्टमेश केन्द्र में हो और लग्नेश निर्बल हो तो २० वर्ष या ३२ वर्ष की आयु होती है।।१७५।। रन्ध्रेशे नीचराशिस्थे रन्ध्रे पापग्रहैर्युते। लग्नेशे दुर्बले यस्य अल्पायुर्भवति ध्रुवम् ।।१७६ ।। अष्टमेश अपनी नीच राशि में हो, अष्टम भाव में पापग्रह हों और लग्नेश दुर्बल हो तो अल्पायु होती है।।१७६।। रन्ध्रेशे पापसंयुक्ते रन्ध्रे पापग्रहैर्युते। व्यये क्रूरग्रहैर्जाते जातमात्रं मृतिर्भवेत् ।।१७७।। अष्टमेश पापग्रह से युक्त हो, आठवें भाव में पापग्रह हों और बारहवें भाव में पापग्रह हों तो उत्पन्न होते ही मृत्यु हो जाती है।।१७७।। केन्द्रत्रिकोणपापस्थाः षष्ठाष्टेषु शुभा यदि। लग्ने रन्ध्रेशनीचस्थे जातः सद्यो मृतो भवेत् ।।१७८ ।। केन्द्र-त्रिकोण में पापग्रह हों, ६/८ भाव में शुभग्रह हों, लग्न में अष्टमेश अपनी नीचराशि का हो तो शीघ्र ही मृत्यु होती है।।१७८।। पञ्चमे पापसंयुक्ते रन्ध्रेशे पापसंयुते। रन्ध्रे पापग्रहैर्युक्ते अल्पायुष्यः प्रजायते ।। १७९ ।। पाँचवें भाव में पापग्रह हो, अष्टमेश पापग्रह से युत हो और अष्टम भाव पापग्रह से युत हो तो अल्पायु होती है।।१७।। रन्ध्रेशे रन्ध्रराशिस्थे चन्द्रे पापसमन्विते। शुभदृग्रहिते विद्वन् मासान्ते च मृतिर्भवेत् ।।१८० ।। अष्टमेश आठवें भाव में और चन्द्रमा पापयुक्त हो, शुभग्रह से न देखा जाता हो तो मास के अंत में मृत्यु होती है।।१८०।। लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे चन्द्रे लाभसमन्विते। रन्ध्रस्थानगते जीवे दीर्घायुष्यं न संशयः ।।१८१ ।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १७५ लग्नेश अपनी उच्चराशि में हो और चन्द्रमा लाभभाव में हो तथा आठवें भाव में गुरु हो तो दीर्घायु होती है, इसमें संशय नहीं है ।।१८१।। अथ नवमभावफलमाह- गुरुस्थानगते जीवे तदीशे केन्द्रसंस्थिते। लग्नेशे बलसंयुक्ते बहुभाग्याधिपो भवेत् ।।१८२।। नवम स्थान में गुरु हो, नवमेश केन्द्र में हो और लग्नेश बलवान् हो तो बड़ा ही भाग्यवान् होता है।।१८२।। भाग्येशे बलसंयुक्ते भाग्ये भृगुसमन्विते। लग्नात्केन्द्रगते जीवे पितृभाग्यसमन्वितः।।१८३।। भाग्येश बलवान् हो, भाग्यस्थान में शुक्र हो, लग्न से केन्द्र में गुरु हो तो पिता भाग्यवान् होता है।।१८३।। भाग्यस्थानाद्द्वितीये वा सुखे भौमसमन्विते। भाग्येशे नीचराशिस्थे पिता निर्धन एव च ।।१८४।। भाग्यस्थान से दूसरे वा चौथे स्थान में भौम हो और भाग्येश नीच राशि में हो तो पिता निर्धन होता है।।१८४।। भाग्येशे परमोच्चस्थे भाग्यांशे जीवसंयुते। लग्नाच्चतुष्टये शुक्रे पिता दीर्घायुरादिशेत् ।।१८५।। भाग्येश परम-उच्चांश में हो, गुरु भाग्यांश में हो, लग्न से केन्द्र में शुक्र हो तो पिता दीर्घायु होता है।।१८५।। भाग्येशे केन्द्रभावस्थे गुरुणा च निरीक्षिते। तत्पिता वाहनैर्युक्तो राजा वा तत्समो भवेत् ।।१८६।। भाग्येश केन्द्र में गुरु से देखा जाता हो तो उसका पिता वाहन से युक्त राजा वा उसके समान होता है।।१८६।। भाग्येशे कर्मभावस्थे कर्मेशे भाग्यराशिगे। शुभयोगे धनाढ्यश्च कीर्त्तिमांस्तत्पिता भवेत् ।।१८७।। भाग्येश कर्मभाव में हो, कर्मेश भाग्यभाव में हो और शुभग्रह से किसी प्रकार का संपर्क हो तो उसका पिता धनी और कीर्त्तिमान् होता है।।१८७।।

१७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् परमोच्चांशगे सूर्ये भाग्येशे लाभसंस्थिते । धर्मिष्ठो नृपवात्सल्यः पितृभक्तो भवेन्नरः ।।१९८८ ।। सूर्य परम-उच्चांश में हो, भाग्येश लाभभाव में हो तो जातक धर्मिष्ठ, राजा का प्रेमपात्र और पितृभक्त होता है ।। १९८८ ।। लग्नात्त्रिकोणगे सूर्ये भाग्येशे सप्तमस्थिते । गुरुणा सहिते दृष्टे पितृभक्तिसमन्वितः ।।१९८९।। भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे । द्वात्रिंशात्परतो भाग्यं वाहनं कीर्त्तिसम्भवः ।।१९९०।। लग्न से त्रिकोण में सूर्य हो, भाग्येश धनभाव में और धनेश भाग्यभाव में हो तो ३२वें वर्ष के बाद भाग्य, वाहन और कीर्त्ति का लाभ होता है।।१९९०।। पितृवैरयोगः- लग्नेशे भाग्यराशिस्थे षष्ठेशे भाग्यराशिगे । अन्योऽन्यवैरं ब्रुवते जनकः कुत्सितो भवेत् ।।१९९१।। लग्नेश भाग्यभाव में हो और षष्ठेश भाग्यभाव में हो तो परस्पर पिता- पुत्र में वैर होता हैं तथा पिता निन्दनीय होता है।।१९९१।। भिक्षाशनयोगः- कर्माधिपेन सहितो विक्रमेशो च निर्बलः । नीचास्तगो च भाग्येशो योगो भिक्षाशनप्रदः ।।१९९२।। यदि निर्बल तृतीयेश कर्मेश से युक्त हो और भाग्येश नीच वा अस्त में हो तो जातक भिक्षा से उदरपूर्त्ति करने वाला होता है ।।१९९२।। पितृमरणयोगमाह- षष्ठाष्टमव्यये भानू रन्ध्रेशे भाग्यसंयुते । व्ययेशे लग्नराशिस्थे षष्ठेशे पञ्चमे स्थिते ।।१९९३।। जातस्य जननात्पूर्वं जनकस्य मृतिं वदेत् । सूर्य ६/८/१२ भाव में हो और अष्टमेश भाग्य भाव में हो तथा व्ययेश लग्न में और षष्ठेश पाँचवें भाव में हो बालक के जन्म से पूर्व ही पिता की मृत्यु हो जाती है।।१९९३।। रन्ध्रस्थानगते सूर्ये रन्ध्रेशे भाग्यभावगे ।।१९९४ ।। जातस्य प्रथमाब्दे च पितुर्मरणमादिशेत् ।

द्वादशभावविचाराध्यायः १७७ आठवें स्थान में सूर्य हो और अष्टमेश भाग्यभाव में हो तो बालक के पहले वर्ष में ही पिता की मृत्यु होती है।।१९४।। व्ययेशे भाग्यराशिस्थे नीचांशे भाग्यनायके। तृतीये षोडशे वर्षे जनकस्य मृतिर्भवेत् ।।१९५।। व्ययेश भाग्यभाव में, भाग्येश नीचांश में हो तो तीसरे वा सोलहवें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९५।। लग्नेशे नाशराशिस्थे रन्ध्रेशे भानुसंयुते। द्वितीये द्वादशे वर्षे पितुर्मरणमादिशेत् ।।१९६।। लग्नेश आठवें भाव में और अष्टमेश सूर्य से युत हो तो दूसरे वा १२वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९६।। भाग्याद्रन्ध्रगते राहौ भाग्याद्भाग्यगते रवौ। राहुणा सहिते सूर्ये चन्द्राद्भाग्यगते शनौ ।।१९७।। सप्तमैकोनविंशाब्दे तातस्य मरणं भवेत्। भाग्यभाव से आठवें भाव में राहु हो, भाग्य से भाग्यभाव में रवि राहु से युक्त हो और चन्द्रमा से भाग्यभाव में शनि हो तो ७वें या १९वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९७।। भाग्येशे व्ययराशिस्थे व्ययेशे भाग्यराशिगे ।।१९८।। चतुश्चत्वारिवर्षाच्च पितुर्मरणमादिशेत्। भाग्येश १२वें भाव में और व्ययेश भाग्यभाव में हो तो ४४वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९८।। रव्यंशे च स्थिते चन्द्रे लग्नेशे रन्ध्रसंयुते ।।१९९।। पञ्चत्रिंशैकचत्वारिंशद्वर्षे पितृनाशनम्। सूर्य के नवांश में चन्द्रमा हो और लग्नेश आठवें भाव में हो तो ३५वें वा ४१वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।१९९।। पितृस्थानाधिपे सूर्ये मन्दभौमसमन्विते ।।२००।। पञ्चाशद्वत्सरे प्राप्ते जनकस्य मृतिर्भवेत्। पितृस्थान (१०) का स्वामी सूर्य हो और शनि-भौम से युत हो तो ५०वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।।२००।। भाग्यात्सप्तमगे सूर्ये भ्रातृसप्तमगस्तमः ।।२०१।। षष्ठे वा पञ्चविंशाब्दे पितुर्मरणमादिशेत्।

१७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भाग्यभाव से ७वें सूर्य हो और भ्रातृभाव से ७वें राहु हो तो छठे वा २५वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है॥२०१॥ रन्ध्रजामित्रगे मन्दे मन्दाज्जामित्रगे रवौ॥२०२॥ त्रिंशैकविंशे षड्विंशे जनकस्य मृतिर्भवेत्। आठवें से सातवें भाव में शनि हो और शनि से ७वें भाव में राहु हो तो ३०वें, २१वें वा २६वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है॥२०२॥ भाग्येशे नीचराशिस्थे तदीशे भाग्यराशिगे॥२०३॥ षड्विंशे च त्रयस्त्रिंशे पितुर्मरणमादिशेत्। एवं तातस्य भो विद्वन् फलं ज्ञात्वा समादिशेत्॥२९४॥ भाग्येश नीच राशि में और नीच राशि का स्वामी भाग्यभाव में हो तो २६वें वा ३३वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है। इस प्रकार से पिता की मृत्यु का विचार कर आदेश देना चाहिए॥२०३-२०४॥ परमोच्चांशगे शुक्रे भाग्येशेन समन्विते। भ्रातृस्थाने शनियुते बहुभाग्याधिपो भवेत्॥२०५॥ भाग्येश से युत शुक्र परम-उच्चांश में हो और मातृस्थान में शनि हो तो बड़ा भाग्यवान् होता है॥२०५॥ गुरुणा संयुते भाग्ये तदीशे केन्द्रराशिगे। विंशद्वर्षात्परं चैव बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्॥२०६॥ भाग्यस्थान में गुरु हो और भाग्येश केंद्र में हो तो २२ वर्ष के बाद भाग्योदय होता है॥२०६॥ परमोच्चांशगे सौम्ये भाग्येशे भाग्यराशिगे। षट्त्रिंशाच्च परं चैव बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्॥२०७॥ बुध परम उच्चांश में हो और भाग्येश भाग्यभाव में हो तो ३६वें वर्ष के बाद भाग्योदय होता है॥२०७॥ लग्नेशे भाग्यराशिस्थे भाग्येशे लग्नसंयुते। गुरुणा संयुते द्यूने धनवाहनलाभकृत्॥२०८॥ लग्नेश भाग्यभाव में और भाग्येश लग्न में हो तथा गुरु सप्तम भाव में हो तो धन-वाहन से युक्त होता है॥२०८॥

द्वादशभावविचाराध्यायः १७९ भाग्यहीनयोगः भाग्याद्भाग्यगतो राहुर्भाग्येशे निधनं गते । भाग्येशे नीचराशिस्थे भाग्यहीनो भवेन्नरः ॥२०९॥ भाग्यस्थान से नवम भाव में राहु हो तथा भाग्येश अपनी नीच राशि के आठवें भाव में हो तो मनुष्य भाग्यहीन होता है॥२०९॥ भाग्यस्थानगते मन्दे शशिना च समन्विते । लग्नेशे नीचराशिस्थे भिक्षाशी च नरो भवेत् ॥२१०॥ भाग्यस्थान में शनि चन्द्रमा के साथ हो और लग्नेश नीच राशि में हो तो भिक्षा का अन्न खाने वाला होता है॥२१०॥ अथ दशमभावफलमाह- कर्माधिपो बलोनश्चेत्कर्मवैकल्यमादिशेत् । सैंहिः केन्द्रत्रिकोणस्थो ज्योतिष्टोमादियागकृत् ॥२११॥ कर्मेश निर्बल हो तो जातक कर्महीन होता है। राहु केन्द्र-त्रिकोण में हो तो ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने वाला होता है॥२११॥ दशमे पापसंयुक्ते लाभे पापसमन्विते । दुष्कृतिं लभते मर्त्यः स्वजनानां विदूषकः ॥२१२॥ दशम भाव में पापग्रह हो और लाभ भाव में पापग्रह हो तो जातक दुष्कीर्त्ति पाता है॥२१२॥ कर्मेशे नाशराशिस्थे राहुणा संयुतेऽपि च। जनद्वेषी महामूर्खो दुष्कृतिं लभते नरः ॥२१३॥ कर्मेश राहु से संयुक्त होकर आठवें भाव में हो तो मनुष्यों से द्वेष करने वाला, महामूर्ख और दुष्कर्म में प्रवृत्त होता है॥२१३॥ कर्मेशे द्यूनराशिस्थे मन्दभौमसमन्विते । द्यूनेशे पापसंयुक्ते शिश्नोदरपरायणः ॥२१४॥ कर्मेश शनि-भौम से युत होकर सप्तम भाव में हो और सप्तमेश पाप से युत हो तो जातक शिश्न द्वारा उदरपूर्त्ति (जीविका) करने वाला होता है॥२१४॥ तुङ्गराशिं समाश्रित्य कर्मेशे गुरुसंयुते । भाग्येशे कर्मराशिस्थे यानैश्वर्यप्रतापवान् ॥२१५॥

१८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अपनी उच्चराशि में कर्मेश गुरु से युत हो और भाग्येश कर्मराशि में हो तो जातक मान-ऐश्वर्य से युक्त प्रतापी होता है।।२१५।। लाभेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे लग्नसंयुते । तावुभौ केन्द्रगौ वादि सुखजीवनभाग्भवेत् ।।२१६ ।। लाभेश कर्मराशि में हो और कर्मेश लग्न में हो अथवा दोनों केन्द्र में हों तो सुखी जीवन वाला होता है।।२१६।। कर्मेशे बलसंयुक्ते मीने गुरुसमन्विते । वस्त्राभरणसौख्यादि लभते नात्र संशयः ।।२१७ ।। कर्मेश बलवान् होकर मीनराशि में गुरु से युत हो तो जातक वस्त्र, आभूषण सुख आदि से युक्त होता है।।२१७।। कर्महीनयोगः- लाभस्थानगते सूर्ये राहुभौमसमन्विते । रविपुत्रेण संयुक्ते कर्मच्छेत्ता भवेन्नरः ।।२१८ ।। सूर्य लाभभाव में राहु, भौम, शनि से युत हो तो जातक कर्महीन होता है।।२१८।। शुभकर्मयोगाः- मीने जीवे भृगुसुते लग्नेशे बलसंयुते । स्वोच्चराशिगते चन्द्रे सम्यग्ज्ञानार्थवान् भवेत् ।।२१९ ।। मीनराशि में गुरु-शुक्र हों, लग्नेश बलवान् हो और चंद्रमा अपनी उच्चराशि में हो तो ज्ञानी और धनी होता है।।२१९।। कर्मेशे लाभराशिस्थे लाभेशे लग्नसंस्थिते । कर्मराशिस्थिते शुक्रे रत्नवान् स नरो भवेत् ।।२२० ।। कर्मेश लाभभाव में और लग्नेश लग्न में तथा शुक्र कर्मभाव में हो तो मनुष्य रत्नों से युक्त होता है।।२२०।। केन्द्रत्रिकोणगे कर्मनाथे स्वोच्चसमाश्रिते । गुरुणा सहिते दृष्टे स कर्मसहितो भवेत् ।।२२१।। अपनी उच्च राशि में कर्मेश केंद्र-त्रिकोण में और गुरु से युत-दृष्ट हो तो मनुष्य कर्मश्रेष्ठ होता है।।२२१।। कर्मेशे लग्नभावस्थे लग्नेशेन समन्विते । केन्द्रत्रिकोणगे चन्द्रे सत्कर्मनिरतो भवेत् ।।२२२।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १८१ कर्मेश लग्न में लग्नेश के साथ हो, केन्द्र- त्रिकोण में चंद्रमा हो तो पुरुष सत्कर्म में निरत होता है।।२२२।। कर्मस्थानगते चन्द्रे तदीशे तत्त्रिकोणगे। लग्नेशे केन्द्रभावस्थे सत्कीर्त्तिसहितो भवेत् ।। २२३ ।। कर्मस्थान में चंद्रमा हो और कर्मेश उससे त्रिकोण में हो तथा लग्नेश केंद्र में हो तो कीर्त्ति से युक्त होता है।।२२३।। लाभेशे कर्मभावस्थे कर्मेशे बलसंयुते। देवेन्द्रगुरुणा दृष्टे सत्कीर्त्तिसहितो भवेत् ।। २२४ ।। लाभेश कर्मभाव में हो और कर्मेश बलवान् हो, गुरु से देखा जाता हो तो सत्कीर्त्ति से युक्त होता है।।२२४।। कर्मस्थानाधिपे भाग्ये लग्नेशे कर्मसंयुते। लग्नात्पञ्चमगे चन्द्रे ख्यातकीर्त्ति विनिर्दिशेत् ।। २२५ ।। कर्मेश भाग्यभाव में और लग्नेश कर्मभाव में हो तथा लग्न से पाँचवें भाव में चंद्रमा हो तो विख्यात कीर्त्तिवाला पुरुष होता है।।२२५।। अशुभयोगः- कर्मस्थानगते मन्दे नीचखेचरसंयुते। कर्मांशे पापसंयुक्ते कर्महीनो भवेन्नरः ।। २२६ ।। कर्मस्थान में शनि नीचराशिस्थ ग्रह से युत हो और कर्मांश में पापग्रह हो तो जातक कर्महीन होता है।।२२६।। कर्मेशे नाशराशिस्थे कर्मस्थे पापखेचरे। कर्मभात्कर्मगे पापे कर्मवैकल्यमादिशेत् ।। २२७ ।। कर्मेश आठवें भाव में हो और कर्मभाव में पापग्रह हो तथा कर्मभाव से कर्मस्थान में पापग्रह हो तो पुरुष कर्महीन होता है।।२२७।। अथैकादशभावफलमाह- लाभाधिपो यदा लाभे तिष्ठेत्केन्द्रत्रिकोणयोः। बहुलाभं तदा कुर्यादुच्चसूर्यांशगोऽपि वा ।।२२८।। लाभेश लाभभाव में वा केंद्र-त्रिकोण में हो वा अपने उच्च में वा सूर्यांश में हो तो भी फल का बहुत लाभ होता है।।२२८।। लाभेशे धनराशिस्थे धनेशे केन्द्रसंस्थिते। गुरुणा सहिते भावे गुरुलाभं विनिर्दिशेत् ।।२२९।।

१८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

लाभेश धन राशि में हो और धनेश केंद्र में हो तथा गुरु से युत हो तो अधिक लाभ होता है।।२२९।। लाभेशे लाभभावस्थे शुभग्रहसमन्विते। षट्त्रिंशे वत्सरे प्राप्ते सहस्रद्वयनिष्कभाक् ।।२३०।। लाभेश लाभभाव में शुभग्रह से युत हो तो ३६वें वर्ष में २ सहस्र निष्क (मोहर) का लाभ होता है।।२३०।। केन्द्रत्रिकोणगे भावनाथे शुभसमन्विते । चत्वारिंशे तु सम्प्राप्ते सहस्रार्थं च निष्कभाक् ।।२३१।। लाभेश शुभग्रह से युत होकर केन्द्र-त्रिकोण में हो तो ४०वें वर्ष में पाँच सौ मोहर का लाभ होता है।।२३१।। लाभस्थाने गुरुयुते धने चन्द्रसमन्विते । भाग्यस्थानगते शुक्रे षट्सहस्राधिपो भवेत् ।।२३२।। लाभभाव में गुरु हो और धनस्थान में चंद्रमा हो तथा भाग्यस्थान में शुक्र हो तो ६ हजार मोहर का अधिपति होता है।।२३२।। लाभाच्च लाभगे जीवे गुरुचन्द्रेण संयुते। धनधान्याधिपः श्रीमान् रत्नाद्याभरणैर्युतः ।।२३३।। लाभस्थान से लाभ में गुरु चंद्रमा से युत हो तो धन-धान्य का स्वामी, श्रीमान्, रत्न आदि आभूषणों से युक्त होता है।।२३३।। लाभेशे लग्नभावस्थे लग्नेशे लाभसंयुते। त्रयस्त्रिंशे तु सम्प्राप्ते सहस्रनिष्कभाग्भवेत् ।।२३४।। लाभेश लग्न में हो और लग्नेश लाभभाव में हो तो ३३वें वर्ष में १ हजार मोहर का लाभ होता है।।२३४।। धनेशे लाभराशिस्थे तदीशे धनराशिगे। विवाहात्परतश्चैव बहुभाग्यं समादिशेत् ।।२३५।। धनेशलाभ भाव में और लाभेश धनभाव में हो तो विवाह के बाद अनेक प्रकार से भाग्योदय होता है।।२३५।। धैर्येशे लाभराशिस्थे लाभेशे भ्रातृसंस्थिते। भ्रातृभावाद्धनप्राप्तिर्दिव्याभरणसंयुतः ।।२३६।। तृतीय भावेश ११वें भाव में और लाभेश तीसरे भाव में हो तो भाइयों से धन का लाभ होता है।।२३६।।

द्वादशभावविचाराध्यायः १८३ अथ द्वादशभावाफलम्— चन्द्रो व्ययाधिपो धर्मलाभमन्त्रेषु संस्थितः। स्वोच्चस्वर्क्षनिजांशे वा लाभधर्मात्मजांशके। दिव्यागारादिपर्यङ्को दिव्यगन्धैकभोगवान्।।२३७।। परार्थ्यं रमणो दिव्यवस्त्रमाल्यादिभूषणः। परार्थ्यसंयुतो वित्तो दिनानि नवतिः प्रभुः।।२३८।। चंद्रमा व्ययेश होकर ९।११।५वें भाव में हो वा अपनी उच्चराशि, अपनी राशि धनभाव के नवांश में हो अथवा लाभ नवम-पंचम के नवांश में हो तो दिव्य मकान, शय्या, गंध, दूसरे के द्रव्य को भोगने वाला होता है।।२३७-२३८।। एवं स्वशत्रुनीचांशेऽष्टमांशे वाष्टमे रिपौ। संस्थितः कुरुते जातं कान्तासुखविवर्जितम्।।२३९।। इसी प्रकार अपने शत्रु की नीचराशि के नवांश में अष्टमभाव के नवांश में, आठवें या छठे भाव में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है।।२३९।। व्ययाधिक्यपरिक्लान्तं दिव्यभोगनिराकृतम्। स हि केन्द्रत्रिकोणस्थः स्वस्त्रियालङ्कृतः स्वयम्।।२४०।। और अधिक खर्च से खिन्न होकर दिव्य भोग आदि से रहित होता है। यदि वह केन्द्र-त्रिकोण में हो तो स्त्रीसुख से युक्त होता है।।२४०।। लग्नस्य पूर्वार्धगतानभोगाः फलं प्रदद्युस्तु प्रत्य्ते। परार्धषट्कोपगताः परोक्षं फलं वदन्तीति बुधाः पुराणाः।।२४१।। लग्न के पूर्वार्ध (१० से ३ भाव तक) मतांतर से (७।८।९।१०।११।१२) में स्थित ग्रह प्रत्यक्ष में फल देने वाले होते हैं और परार्ध (४।५।६।७।८।९) भाव में मतांतर से (१।२।३।४।५।६) में स्थित ग्रह परोक्ष (अप्रत्यक्ष सूर्य) से फल देने वाले होते हैं।।२४१।। व्ययस्थानगतो राहुर्भौमार्करविसंयुतः। तदीशेऽप्यर्कसंयुक्ते नरके पतनं भवेत्।।२४२।। बारहवें भाव में राहु भौम-सूर्य के साथ हो, व्ययेश भी सूर्य से युक्त हो तो जातक नरक में जाता है।।२४२।।

१८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् व्ययस्थानगते सौम्ये तदीशे स्वोच्चराशिगे। शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे मोक्षः स्यान्नात्र संशयः।।२४३।। बारहवें भाव में बुध हो, व्ययेश अपनी उच्च राशि में हो, शुभ ग्रह से युत और दृष्ट हो तो मोक्ष होता है।।२४३।। व्ययेशे पापसंयुक्ते व्यये पापसमन्विते। पापग्रहेण सन्दृष्टे देशाद्देशान्तरं गतः।।२४३।। व्ययेश पापग्रह से युत हो और व्ययभाव में पापग्रह हो और पापग्रह से देखा जाता हो तो देश-विदेश में जाने वाला होता है।।२४४।। व्ययेशे शुभराशिस्थे व्ययर्क्षे शुभसंयुते। शुभग्रहेण सन्दृष्टे स्वदेशात्सञ्चरो भवेत्।।२४५।। व्ययेश शुभराशि में हो और व्ययभाव में शुभग्रह हो, शुभग्रह से देखा जाता हो तो अपने देश से अन्य देश को जाने वाला होता है।।२४५।। व्यये मन्दादिसंयुक्ते भूमिजेन समन्विते। शुभदृष्टैर्न सम्प्राप्तिः पापमूलाद्धनार्जनम् ।।२४६।। व्ययभाव शनि-भौम से युत हो, शुभग्रह से न देखा जाता हो तो पाप करने से धन की हानि होती है।।२४७।। लग्नेशे व्ययराशिस्थे व्ययेशे लग्नसंयुते। भृगुपुत्रेण संयुक्ते धर्ममूलाद्धनव्ययम्।।२४७।। लग्नेश बारहवें भाव में हो और व्ययेश लग्न में हो, शुक्र से युत हो तो धर्म करने में धन का व्यय होता है।।२४७।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां द्वादशभावविचारो नाम द्वादशोऽध्यायः। अथ भावेशफलाध्यायः अथ लग्नेशभावफलम्- लग्नेशे लग्नगे पुंसः सुखी भुजपराक्रमी। मनस्वी चातिचाञ्चल्यो द्विभार्यः परगोऽपि वा।।१।। लग्नेश लग्न में हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, मनस्वी, अत्यंत चंचल, दो स्त्रियों वाला और परस्त्रीगामी भी होता है।।१।। लग्नेशे धनगे लाभे सलाभः पण्डितो नरः। सुशीलो धर्मविन्मानी बहुदारगुणैर्युतः।।२।।

भावेशफलाध्यायः १८५ लग्नेश धनस्थान में या लाभस्थान में हो तो जातक लाभ से युक्त पंडित, सुशील, धर्मात्मा, ज्ञानी और अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।।२।। लग्नेशे सहजे षष्ठे सिंहतुल्यपराक्रमी। सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान्सुखी ।।३।। लग्नेश तीसरे या छठे भाव में हो तो जातक सिंह के समान पराक्रमी, सभी सम्पत्ति से युक्त, मानी, दो स्त्रियों वाला और बुद्धिमान् एवं सुखी होता है।।३।। लग्नेशे दशमे तुर्ये पितृमातृसुखन्वितः। बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौन्दर्यसंयुतः ।।४।। लग्नेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो पिता-माता के सुख से युक्त, अनेक भाइयों वाला, कामी, गुण-सौंदर्य से युक्त होता है।।४।। लग्नेशे पञ्चमे दानी सुतसौख्यं च मध्यमम्। प्रथमापत्यनाशः स्यात्क्रोधी लोभी नृपप्रियः।।५।। लग्नेश पाँचवें भाव में हो तो जातक दानी, मध्यम संतान सुखवाला, प्रथम संतान से हीन, क्रोधी, लोभी और राज़प्रिय होता है।।५।। लग्नेशे सप्तमे यस्य भार्या तस्य न जीवति। विरक्तो वा प्रवासी वा दरिद्रो वा नृपोऽपि वा ।।६।। लग्नेश सातवें भाव में हो तो स्त्री का विनाश होता है। वह व्यक्ति विरक्त हो या परदेशी हो, वा दरिद्र हो या राजा होता है।।६।। लग्नेशे व्ययगेऽष्टस्थे सिद्धविद्याविशारदः। द्यूती चौरो महाक्रोधी परनार्यतिभोगकृत् ।।७।। लग्नेश १२वें या ८वें भाव में हो तो जातक जूआ खेलने वाला, चोर, क्रोधी और परस्त्रीगामी होता है।।८।। लग्नेशे नवमे पुंसो भाग्यवान् जनवल्लभः। विष्णुभक्तः पटुर्वाग्मी पुत्रदारधनैर्युतः ।।८।। लग्नेश नवम भाव में हो तो पुरुष भाग्यवान्, जनप्रिय, विष्णुभक्त, पंडित, वक्ता और पुत्र-स्त्री से युक्त होता है।।८।। अथ धनेशभावफलम्– धनेशे च तनौ पुत्री स्वकुटुम्बस्य कण्टकः। धनवान्निष्ठुरः कामी परकार्येषु तत्परः।।९।।

१८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धनेश लग्न में हो तो जातक पुत्रवान्, अपने कुटुम्ब का कंटक, धनी, निष्ठुर, कामी और दूसरे के कार्य में तत्पर होता है॥९॥ धनेशे धनगे मर्त्यः धनवान् गर्वसंयुतः। भार्याद्वयं त्रयं वापि पुत्रहीनः प्रजायते ॥१०॥ धनेश धनभाव में हो जातक धनी, धर्म से युक्त होता है। उसे २ या ३ स्त्रियाँ होती है और पुत्रहीन होता है॥१०॥ धनेशे सहजे तुर्ये विक्रमी मतिमान् गुणी। परदाराभिमानी च लोभी वा देवनिन्दकः ॥११॥ धनेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, बुद्धिमान्, गुणी, परायी स्त्री का अभिमान करने वाला, लोभी या देवनिंदक होता है।॥११।। धनेशे सुतभावस्थे पुत्रतो धनवान् भवेत्। कृपणो दुःखभाग्जातो यशस्वी पुत्रवान् भवेत् ॥१२॥ धनेश पाँचवें भाव में हो तो पुत्र से धनी, कृपण, दुःख भोगने वाला, यशस्वी और पुत्रवान् होता है॥१२॥ धनेशे शत्रुगे शत्रोर्धनं प्राप्नोति निश्चितम्। शत्रुतो वित्तनाशः स्याज्जंघोर्वोर्भवेच्च रुक् ॥१३॥ धनेश छठे भाव में हो तो शत्रु से धन प्राप्त करने वाला, पुत्र द्वारा धन नाश वाला और जंघा तथा उरु प्रदेश में रोग युक्त होता है॥११॥ धनेशे सप्तमे वैद्यः परजायाभिगामिनः। जाया तस्य भवेद्वेश्या माता च व्यभिचारिणी ॥१४॥ धनेश सातवें भाव में हो तो जातक वैद्य होता है, परस्त्रीगामी होता है। उसकी स्त्री वेश्या और माता व्यभिचारिणी होती है॥१४॥ धनेशे मृत्युगेहस्थे भूमिद्रव्यं लभेद् ध्रुवम्। जायासौख्यं भवेत्स्वल्पं ज्येष्ठभ्रातृसुखं न हि ॥१५॥ धनेश आठवें भाव में हो तो जातक को भूमिगत द्रव्य का लाभ, स्त्री का सुख अल्प और ज्येष्ठ भाई का सुख नहीं होता है॥१५॥ धनेशे नवमे लाभे धनवानुद्यमी पटुः। बाल्ये रोगी सुखी पश्चाद्यावदायुः समाप्यते ॥१६॥

भावेशफलाध्यायः १८७ धनेश नवम भाव वा लाभभाव में हो तो जातक धनी, उद्यमी, विद्वान् होता है। बाल्य अवस्था में रोगी और पीछे आयु पर्यन्त सुखी होता है॥१९६।। धनेशो दशमे यस्य कामी मानी च पण्डितः। बहुदारधनैर्युक्तः सुतहीनो प्रजायते ॥१९७।। धनेश दशम भाव में हो तो जातक कामी, मानी, पंडित, अनेक स्त्री तथा धन से युक्त और पुत्रहीन होता है॥१९७।। धनेशे व्ययगे ज्ञानी साहसी धनवर्जितः। जीविका नृपगेहाच्च ज्येष्ठपुत्रसुखं न हि।।१९८।। धनेश बारहवें भाव में हो तो जातक ज्ञानी, साहसी, धनहीन, राजगृह से जीविकावाला और ज्येष्ठ पुत्र के सुख से हीन होता है।।१९८।। अथ सहजेशभावफलम्— तृतीयेशे तनौ लाभे स्वभुजार्जितवित्तवान्। मूर्खः कृशो महारोगी साहसी परसेवकः।।१९९।। तृतीयेश लग्न या लाभ भाव में हो तो जातक अपनी कमाई से धनी, मूर्ख, कृश, महारोगी अपितु साहसी, दूसरे का सेवक होता है।।१९९।। गुदाभञ्जनिकः स्थूलः परभार्याधने रुचिः। स्वल्पारम्भी सुखी न स्यात्तृतीयेशे धनं गते ।।२००।। तृतीयेश दूसरे भाव में हो तो जातक स्त्री के स्वभाव का, स्थूल, परस्त्री के धन से कार्य आरम्भ करने वाला और सुखी नहीं होता है।।२००।। तृतीयेशे तृतीयस्थे विक्रमी सुतसंयुतः। धनयुक्तो महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम्।।१२१.।। तृतीयेश तीसरे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, पुत्रवान्, धनी; प्रसन्न और अद्भुत सुख को भोगने वाला होता है।।१२१।। तृतीयेशे सुखे कर्मे पञ्चमे वा सुखी सदा। अतिक्रूरा भवेद्भार्या धनाढ्यो मतिमान् भवेत्।।१२२।। तृतीयेश चौथे, दसवें और पाँचवें भाव में हो तो जातक सदा सुखी, अतिक्रूर स्त्री से युक्त, धनी और बुद्धिमान् होता है।।१२२।।

१८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तृतीये शो रिपौ यस्य भ्राता शत्रुर्महाधनी। मातुलानां सुखं न स्यान्मातुल्या भोगमिच्छति॥२३॥ तृतीयेश छठे भाव में हो तो जातक का भाई शत्रु होता है। जातक स्वयं महाधनी, मामा के सुख से हीन और मामी से संभोग की इच्छावाला होता है॥२३॥ तृतीयेऽष्टमे द्यूने राजद्वारे मृतिर्भवेत्। चोरो वा परगामी वा बाल्ये कष्टं दिने दिने॥२४॥ तृतीयेश आठवें या सातवें भाव में हो तो जातक की मृत्यु राजद्वार में होती है, चोर, परस्त्रीगामी और बाल्य समय में कष्ट भोगने वाला होता है॥२४॥ तृतीये शे व्यये भाग्ये स्त्रीभिर्भाग्योदयो भवेत्। पिता तस्य महाचोरः सुखेऽपि दुःखदर्शकः॥२५॥ तृतीयेश बारहवें या भाग्यभाव में हो तो जातक का भाग्योदय स्त्री के द्वारा होता है और उसका पिता बड़ा चोर होता है॥२५॥ अथ सुख

भावेशफलाध्यायः १८९ सुखेश सुख भाव में हो तो मंत्री सभी प्रकार की संपत्ति से युक्त, चतुर, शीलवान्, मानी, धनी और स्त्रीप्रिय तथा सुखी होता है।।२९।। तुर्येशे पञ्चमे भाग्ये सुखी सर्वजनप्रियः। विष्णुभक्तिरतो मानी स्वभुजार्जितवित्तवान् ।।३०।। सुखेश पाँचवें वा नवम भाव में हो तो जातक सुखी, सर्वजनप्रिय, विष्णुभक्त, मानी और अपने पराक्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता है।।३०।। सुखेशे शत्रुगेहस्थे सदा स्याद्बहुयातुकः। क्रोधी चौरोऽभिचारी च दुष्टचित्तो मनस्वपि ।।३१।। सुखेश छठे भाव में हो तो जातक हर समय परदेश में रहनेवाला, क्रोधी, चोर, घात करने वाला, दुष्ट और मनस्वी होता है।।३१।। सुखेशे सप्तमे लग्ने बहुविद्यासमन्वितः। पित्रार्जितधनत्यागी सभायां मूकवद्भवेत् ।।३२।। सुखेश सातवें भाव में हो तो जातक अनेक विद्याओं से युक्त, पिता के धन को त्यागने वाला, सभा में मूक होता है।।३२।। सुखेशे व्ययरन्ध्रस्थे सुखहीनो भवेन्नरः। पितृसौख्यं भवेदल्पं क्लीबो वा जारजोऽपि वा ।।३३।। सुखेश बारहवें या ८वें स्थान में हो तो जातक सुखहीन होता है और उसे पिता का अल्पसुख नपुंसक अथवा जार से उत्पन्न हुआ होता है।।३३।। सुखेशे कर्मगेहस्थे राजमान्यो भवेन्नरः। रसायनी महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम् ।।३४।। सुखेश कर्मभाव में हो तो जातक राजमान्य, रसायन क्रिया को जानने वाला, प्रसन्न और सुख को भोगने वाला होता है।।३४।। अथ सुतेशभावफलम्— सुतेशे लग्नसहजे मायावी पिशुनो महान्। लोष्ठं दत्त्वात्रैव काचिद्द्रव्यस्य का कथा ।।३५।। पंचमेश लग्न और तीसरे भाव में हो तो जातक मायावी और कृपण होता है।।३५।।

१९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सुतेशे चायुधि धने बहुपुत्री न संशयः। कासश्वाससुखी न स्यात्क्रोधयुक्तो धनान्वितः।।३६।। पंचमेश ८वें वा रसरे भाव में हो तो जातक अनेक पुत्रों से युक्त, कांस-श्वास रोगी, क्रोधी और धनी होता है।।३६।। सुतेशे मातृभवने चिरं मातृसुखं भवेत्। लक्ष्मीयुक्तः सुबुद्धिश्च सचिवोऽप्यथवा गुरुः ।।३७।। सुतेश ४ भाव में हो तो जातक को माता का सुख अधिक, लक्ष्मीयुक्त, बुद्धिमान्, मंत्री वा गुरु होता है। मुंहूर्त्त को जानने वाला, टेढ़ा बोलने वाला, धनी और बुद्धिमान् होता है।।३७।। सुतेशे पञ्चमे यस्य तस्य पुत्रो न जीवति। क्षणिकः क्रूरभाषी च धनिको मतिमान्भवेत् ।।३८।। सुतेश ५वें भाव में हो तो जातक का पुत्र नहीं जीता है।।३८।। सुतेशे षष्ठरिःफस्थे पुत्रः शत्रुत्वमाप्नुयात्। मृतापत्यो दत्तपुत्रो धनपुत्रोऽथवा भवेत् ।।३९।। सुतेश छठे, बारहवें भाव में हो तो जातक को पुत्र से शत्रुता होती है और उसके पुत्र मर जाते हैं। उसे दत्तक पुत्र या क्रीत पुत्र होता है।।३९।। सुतेशे कामगे मानी सर्वधर्मसमन्वितः। तुंगबष्टिस्तनुस्वामी भंक्तियुक्तैकचेतसा ।।४०।। सुतेश ७वें भाव में हों तो जातक मानी, सभी धर्मों से युक्त, ऊँचे नाक वाला और भक्ति युक्त होता है।।४०।। सुतेशे नवमे कर्मे पुत्रो भूपसमो भवेत्। अथवा ग्रन्थकर्ता च विख्यातः कुलदीपकः।।४१।। सुतेश ९वें या १०वें भाव में हो तो जातक का पुत्र राजा के समान होता है अथवा प्रसिद्ध ग्रंथकर्त्ता होता है।।४१।। सुतेशे लाभभवने पण्डिंतो जनवल्लभः। ग्रन्थकर्त्ता महादक्षो बहुपुत्रधनान्वितः।।४२।। सुतेश लाभभाव में हो तो जातक पंडित, लोकप्रिय, ग्रंथकर्त्ता, दक्ष, अनेक पुत्र और धन से युक्त होता है।।४२।।

भावैशफलाध्यायः १९१ अथ षष्ठेशभावफलम्- षष्ठेशे सप्तमे लाभे लग्ने वा कीर्त्तिमान् भवेत्। धनवान् गुणवान् मानी साहसी पुत्रवर्जितः ।।४३।। षष्ठेश सातवें, ग्यारहवें या लग्न में हो तो जातक कीर्त्तिमान्, धनवान्, गुणी, मानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।।४३।। षष्ठेशे कर्मवित्तस्थे साहसी कुलविश्रुतः। परदेशे सुखी वक्ता स्वकर्मै चैकनिष्ठिकः ।।४४।। षष्ठेश दशम वा दूसरे भाव में हो तो जातक साहसी, कुल में विख्यात, परदेशी, वक्ता और अपने कर्म में निष्णात होता है।।४४।। षष्ठेशे सहजे तुर्ये क्रोधेनारक्तलोचनः। मनस्वी पिशुनो द्वेषी चलचित्तोऽतिवित्तवान् ।।४५।। षष्ठेश तीसरे या चौथे भाव में हो जातक का नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण का, मनस्वी, कृपण, द्वेष करने वाला, अस्थिरचित्त और अत्यंत धनी होता है।।४५।। षष्ठेशे पञ्चमे यस्य चलमित्रधनादिकम्। दयायुक्तः सुखी सौम्यः स्वकार्ये चतुरो महान् ।।४६।। पाँचवें भाव में हो तो जातक के मित्र तथा धन चंचल होते हैं। दयावान्, सुखी, सौम्यमूर्त्ति और अपने कार्य में अत्यंत चतुर होता है।।४६।। षष्ठेशे रिपुभावस्थे स्वज्ञातिः शत्रुवद्भवेत्। परजातिर्भवेन्मित्रं भूमौ न चलति ध्रुवम् ।।४७।। षष्ठेश छठे भाव में हो जातक के जातिवाले ही उसके शत्रु होते हैं, परजाति के लोग मित्र होते हैं और हमेशा सवारी से चलता है।।४७।। षष्ठेशेऽष्टमरिःफस्थे रोगी शत्रुर्मनीषिणाम्। परजायाभिगामी च जीवहिंसासु तत्परः ।।४८।। षष्ठेश ८वें या १२वें भाव में हो तो जातक रोगी और अच्छे लोगों का शत्रु, परस्त्रीगामी और हिंसक होता है।।४८।। षष्ठेशो नवमे यस्य काष्ठपाषाणविक्रयी। व्यवहारे क्वचिद्धानिः क्वचिद्वृद्धिर्भवेत्किल ।।४९।।

१९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् षष्ठेश नवम स्थान में हो तो जातक लकड़ी, पत्थर आदि बेचने वाला, व्यापार में कभी हानि और कभी वृद्धिवाला होता है।।४९।। अथ सप्तमेशभावफलम्- सप्तमेशे तनौ चास्ते परजायासु लम्पटः। दुष्टो विचक्षणो धीरो वातरुक् स्थीयते हृदि ।।५०।। सप्तमेश लग्न या सप्तम में हो तो जातक परस्त्री में आसक्त, दुष्ट, पंडित, वातरोगी होता है।।५०।। द्यूनेशे नवमे वित्ते नानास्त्रीभिः समागमः। आरम्भी दीर्घसूत्री च स्त्रीषु चित्तं हि केवलम् ।।५१।। सप्तमेश नवम और दूसरे भाव में हो तो अनेक स्त्रियों में आसक्त, कार्य को आरंभ करने वाला, दीर्घसूत्री और केवल स्त्री में चित्त को लगाने वाला होता है।।५१।। द्यूनेशे सहजे लाभे मृतपुत्रः प्रजायते। कदाचिज्जीवति सुता यत्नात्पुत्रोऽपि जायते ।।५२।। सप्तमेश ३रे या ११वें भाव में हो तो जातक के संतान नहीं जीते हैं। कदाचित् कन्या जीती है; यत्न करने से पुत्र भी जीता है।।५२।। द्यूनेशे दशमे तुर्ये नास्य जाया पतिव्रता। धर्मात्मा सत्यसंयुक्तः केवलं दन्तरोगवान् ।।५३।। सप्तमेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक की स्त्री पतिव्रता नहीं होती है। जातक सर्वगुणसम्पन्न, मानी और सर्व सम्पत्तिमान् होता है।।५३।। सर्वगुणयुतो मानी भवेत्सर्वधनाधिपः। सदैव हर्षसंयुक्तः सप्तमेशे सुते स्थिते ।।५४।। सप्तमेश पाँचवें भाव में हो तो जातक सभी गुणों से युक्त, मानी, सभी प्रकार के धनों से युक्त, सदैव प्रसन्न रहने वाला होता है।।५४।। जायेशे चाष्टमे षष्ठे रोगिणी कामिनी लभेत्। क्रोधयुक्तो भवेद्वापि न सुखं लभते क्वचित् ।।५५।। सप्तमेश ६ या ८ भाव में हो तो जातक की स्त्री रोगिणी होती है। जातक क्रोधी होता है और सुखी नहीं रहता है।।५५।।