बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
लाभेश धन राशि में हो और धनेश केंद्र में हो तथा गुरु से युत हो तो अधिक लाभ होता है।।२२९।। लाभेशे लाभभावस्थे शुभग्रहसमन्विते। षट्त्रिंशे वत्सरे प्राप्ते सहस्रद्वयनिष्कभाक् ।।२३०।। लाभेश लाभभाव में शुभग्रह से युत हो तो ३६वें वर्ष में २ सहस्र निष्क (मोहर) का लाभ होता है।।२३०।। केन्द्रत्रिकोणगे भावनाथे शुभसमन्विते । चत्वारिंशे तु सम्प्राप्ते सहस्रार्थं च निष्कभाक् ।।२३१।। लाभेश शुभग्रह से युत होकर केन्द्र-त्रिकोण में हो तो ४०वें वर्ष में पाँच सौ मोहर का लाभ होता है।।२३१।। लाभस्थाने गुरुयुते धने चन्द्रसमन्विते । भाग्यस्थानगते शुक्रे षट्सहस्राधिपो भवेत् ।।२३२।। लाभभाव में गुरु हो और धनस्थान में चंद्रमा हो तथा भाग्यस्थान में शुक्र हो तो ६ हजार मोहर का अधिपति होता है।।२३२।। लाभाच्च लाभगे जीवे गुरुचन्द्रेण संयुते। धनधान्याधिपः श्रीमान् रत्नाद्याभरणैर्युतः ।।२३३।। लाभस्थान से लाभ में गुरु चंद्रमा से युत हो तो धन-धान्य का स्वामी, श्रीमान्, रत्न आदि आभूषणों से युक्त होता है।।२३३।। लाभेशे लग्नभावस्थे लग्नेशे लाभसंयुते। त्रयस्त्रिंशे तु सम्प्राप्ते सहस्रनिष्कभाग्भवेत् ।।२३४।। लाभेश लग्न में हो और लग्नेश लाभभाव में हो तो ३३वें वर्ष में १ हजार मोहर का लाभ होता है।।२३४।। धनेशे लाभराशिस्थे तदीशे धनराशिगे। विवाहात्परतश्चैव बहुभाग्यं समादिशेत् ।।२३५।। धनेशलाभ भाव में और लाभेश धनभाव में हो तो विवाह के बाद अनेक प्रकार से भाग्योदय होता है।।२३५।। धैर्येशे लाभराशिस्थे लाभेशे भ्रातृसंस्थिते। भ्रातृभावाद्धनप्राप्तिर्दिव्याभरणसंयुतः ।।२३६।। तृतीय भावेश ११वें भाव में और लाभेश तीसरे भाव में हो तो भाइयों से धन का लाभ होता है।।२३६।।