बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशभावविचाराध्यायः १८३ अथ द्वादशभावाफलम्— चन्द्रो व्ययाधिपो धर्मलाभमन्त्रेषु संस्थितः। स्वोच्चस्वर्क्षनिजांशे वा लाभधर्मात्मजांशके। दिव्यागारादिपर्यङ्को दिव्यगन्धैकभोगवान्।।२३७।। परार्थ्यं रमणो दिव्यवस्त्रमाल्यादिभूषणः। परार्थ्यसंयुतो वित्तो दिनानि नवतिः प्रभुः।।२३८।। चंद्रमा व्ययेश होकर ९।११।५वें भाव में हो वा अपनी उच्चराशि, अपनी राशि धनभाव के नवांश में हो अथवा लाभ नवम-पंचम के नवांश में हो तो दिव्य मकान, शय्या, गंध, दूसरे के द्रव्य को भोगने वाला होता है।।२३७-२३८।। एवं स्वशत्रुनीचांशेऽष्टमांशे वाष्टमे रिपौ। संस्थितः कुरुते जातं कान्तासुखविवर्जितम्।।२३९।। इसी प्रकार अपने शत्रु की नीचराशि के नवांश में अष्टमभाव के नवांश में, आठवें या छठे भाव में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है।।२३९।। व्ययाधिक्यपरिक्लान्तं दिव्यभोगनिराकृतम्। स हि केन्द्रत्रिकोणस्थः स्वस्त्रियालङ्कृतः स्वयम्।।२४०।। और अधिक खर्च से खिन्न होकर दिव्य भोग आदि से रहित होता है। यदि वह केन्द्र-त्रिकोण में हो तो स्त्रीसुख से युक्त होता है।।२४०।। लग्नस्य पूर्वार्धगतानभोगाः फलं प्रदद्युस्तु प्रत्य्ते। परार्धषट्कोपगताः परोक्षं फलं वदन्तीति बुधाः पुराणाः।।२४१।। लग्न के पूर्वार्ध (१० से ३ भाव तक) मतांतर से (७।८।९।१०।११।१२) में स्थित ग्रह प्रत्यक्ष में फल देने वाले होते हैं और परार्ध (४।५।६।७।८।९) भाव में मतांतर से (१।२।३।४।५।६) में स्थित ग्रह परोक्ष (अप्रत्यक्ष सूर्य) से फल देने वाले होते हैं।।२४१।। व्ययस्थानगतो राहुर्भौमार्करविसंयुतः। तदीशेऽप्यर्कसंयुक्ते नरके पतनं भवेत्।।२४२।। बारहवें भाव में राहु भौम-सूर्य के साथ हो, व्ययेश भी सूर्य से युक्त हो तो जातक नरक में जाता है।।२४२।।