भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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द्वादशभावविचाराध्यायः १८१ कर्मेश लग्न में लग्नेश के साथ हो, केन्द्र- त्रिकोण में चंद्रमा हो तो पुरुष सत्कर्म में निरत होता है।।२२२।। कर्मस्थानगते चन्द्रे तदीशे तत्त्रिकोणगे। लग्नेशे केन्द्रभावस्थे सत्कीर्त्तिसहितो भवेत् ।। २२३ ।। कर्मस्थान में चंद्रमा हो और कर्मेश उससे त्रिकोण में हो तथा लग्नेश केंद्र में हो तो कीर्त्ति से युक्त होता है।।२२३।। लाभेशे कर्मभावस्थे कर्मेशे बलसंयुते। देवेन्द्रगुरुणा दृष्टे सत्कीर्त्तिसहितो भवेत् ।। २२४ ।। लाभेश कर्मभाव में हो और कर्मेश बलवान् हो, गुरु से देखा जाता हो तो सत्कीर्त्ति से युक्त होता है।।२२४।। कर्मस्थानाधिपे भाग्ये लग्नेशे कर्मसंयुते। लग्नात्पञ्चमगे चन्द्रे ख्यातकीर्त्ति विनिर्दिशेत् ।। २२५ ।। कर्मेश भाग्यभाव में और लग्नेश कर्मभाव में हो तथा लग्न से पाँचवें भाव में चंद्रमा हो तो विख्यात कीर्त्तिवाला पुरुष होता है।।२२५।। अशुभयोगः- कर्मस्थानगते मन्दे नीचखेचरसंयुते। कर्मांशे पापसंयुक्ते कर्महीनो भवेन्नरः ।। २२६ ।। कर्मस्थान में शनि नीचराशिस्थ ग्रह से युत हो और कर्मांश में पापग्रह हो तो जातक कर्महीन होता है।।२२६।। कर्मेशे नाशराशिस्थे कर्मस्थे पापखेचरे। कर्मभात्कर्मगे पापे कर्मवैकल्यमादिशेत् ।। २२७ ।। कर्मेश आठवें भाव में हो और कर्मभाव में पापग्रह हो तथा कर्मभाव से कर्मस्थान में पापग्रह हो तो पुरुष कर्महीन होता है।।२२७।। अथैकादशभावफलमाह- लाभाधिपो यदा लाभे तिष्ठेत्केन्द्रत्रिकोणयोः। बहुलाभं तदा कुर्यादुच्चसूर्यांशगोऽपि वा ।।२२८।। लाभेश लाभभाव में वा केंद्र-त्रिकोण में हो वा अपने उच्च में वा सूर्यांश में हो तो भी फल का बहुत लाभ होता है।।२२८।। लाभेशे धनराशिस्थे धनेशे केन्द्रसंस्थिते। गुरुणा सहिते भावे गुरुलाभं विनिर्दिशेत् ।।२२९।।