बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अपनी उच्चराशि में कर्मेश गुरु से युत हो और भाग्येश कर्मराशि में हो तो जातक मान-ऐश्वर्य से युक्त प्रतापी होता है।।२१५।। लाभेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे लग्नसंयुते । तावुभौ केन्द्रगौ वादि सुखजीवनभाग्भवेत् ।।२१६ ।। लाभेश कर्मराशि में हो और कर्मेश लग्न में हो अथवा दोनों केन्द्र में हों तो सुखी जीवन वाला होता है।।२१६।। कर्मेशे बलसंयुक्ते मीने गुरुसमन्विते । वस्त्राभरणसौख्यादि लभते नात्र संशयः ।।२१७ ।। कर्मेश बलवान् होकर मीनराशि में गुरु से युत हो तो जातक वस्त्र, आभूषण सुख आदि से युक्त होता है।।२१७।। कर्महीनयोगः- लाभस्थानगते सूर्ये राहुभौमसमन्विते । रविपुत्रेण संयुक्ते कर्मच्छेत्ता भवेन्नरः ।।२१८ ।। सूर्य लाभभाव में राहु, भौम, शनि से युत हो तो जातक कर्महीन होता है।।२१८।। शुभकर्मयोगाः- मीने जीवे भृगुसुते लग्नेशे बलसंयुते । स्वोच्चराशिगते चन्द्रे सम्यग्ज्ञानार्थवान् भवेत् ।।२१९ ।। मीनराशि में गुरु-शुक्र हों, लग्नेश बलवान् हो और चंद्रमा अपनी उच्चराशि में हो तो ज्ञानी और धनी होता है।।२१९।। कर्मेशे लाभराशिस्थे लाभेशे लग्नसंस्थिते । कर्मराशिस्थिते शुक्रे रत्नवान् स नरो भवेत् ।।२२० ।। कर्मेश लाभभाव में और लग्नेश लग्न में तथा शुक्र कर्मभाव में हो तो मनुष्य रत्नों से युक्त होता है।।२२०।। केन्द्रत्रिकोणगे कर्मनाथे स्वोच्चसमाश्रिते । गुरुणा सहिते दृष्टे स कर्मसहितो भवेत् ।।२२१।। अपनी उच्च राशि में कर्मेश केंद्र-त्रिकोण में और गुरु से युत-दृष्ट हो तो मनुष्य कर्मश्रेष्ठ होता है।।२२१।। कर्मेशे लग्नभावस्थे लग्नेशेन समन्विते । केन्द्रत्रिकोणगे चन्द्रे सत्कर्मनिरतो भवेत् ।।२२२।।