भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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द्वादशभावविचाराध्यायः १७९ भाग्यहीनयोगः भाग्याद्भाग्यगतो राहुर्भाग्येशे निधनं गते । भाग्येशे नीचराशिस्थे भाग्यहीनो भवेन्नरः ॥२०९॥ भाग्यस्थान से नवम भाव में राहु हो तथा भाग्येश अपनी नीच राशि के आठवें भाव में हो तो मनुष्य भाग्यहीन होता है॥२०९॥ भाग्यस्थानगते मन्दे शशिना च समन्विते । लग्नेशे नीचराशिस्थे भिक्षाशी च नरो भवेत् ॥२१०॥ भाग्यस्थान में शनि चन्द्रमा के साथ हो और लग्नेश नीच राशि में हो तो भिक्षा का अन्न खाने वाला होता है॥२१०॥ अथ दशमभावफलमाह- कर्माधिपो बलोनश्चेत्कर्मवैकल्यमादिशेत् । सैंहिः केन्द्रत्रिकोणस्थो ज्योतिष्टोमादियागकृत् ॥२११॥ कर्मेश निर्बल हो तो जातक कर्महीन होता है। राहु केन्द्र-त्रिकोण में हो तो ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने वाला होता है॥२११॥ दशमे पापसंयुक्ते लाभे पापसमन्विते । दुष्कृतिं लभते मर्त्यः स्वजनानां विदूषकः ॥२१२॥ दशम भाव में पापग्रह हो और लाभ भाव में पापग्रह हो तो जातक दुष्कीर्त्ति पाता है॥२१२॥ कर्मेशे नाशराशिस्थे राहुणा संयुतेऽपि च। जनद्वेषी महामूर्खो दुष्कृतिं लभते नरः ॥२१३॥ कर्मेश राहु से संयुक्त होकर आठवें भाव में हो तो मनुष्यों से द्वेष करने वाला, महामूर्ख और दुष्कर्म में प्रवृत्त होता है॥२१३॥ कर्मेशे द्यूनराशिस्थे मन्दभौमसमन्विते । द्यूनेशे पापसंयुक्ते शिश्नोदरपरायणः ॥२१४॥ कर्मेश शनि-भौम से युत होकर सप्तम भाव में हो और सप्तमेश पाप से युत हो तो जातक शिश्न द्वारा उदरपूर्त्ति (जीविका) करने वाला होता है॥२१४॥ तुङ्गराशिं समाश्रित्य कर्मेशे गुरुसंयुते । भाग्येशे कर्मराशिस्थे यानैश्वर्यप्रतापवान् ॥२१५॥