बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् परमोच्चांशगे सूर्ये भाग्येशे लाभसंस्थिते । धर्मिष्ठो नृपवात्सल्यः पितृभक्तो भवेन्नरः ।।१९८८ ।। सूर्य परम-उच्चांश में हो, भाग्येश लाभभाव में हो तो जातक धर्मिष्ठ, राजा का प्रेमपात्र और पितृभक्त होता है ।। १९८८ ।। लग्नात्त्रिकोणगे सूर्ये भाग्येशे सप्तमस्थिते । गुरुणा सहिते दृष्टे पितृभक्तिसमन्वितः ।।१९८९।। भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे । द्वात्रिंशात्परतो भाग्यं वाहनं कीर्त्तिसम्भवः ।।१९९०।। लग्न से त्रिकोण में सूर्य हो, भाग्येश धनभाव में और धनेश भाग्यभाव में हो तो ३२वें वर्ष के बाद भाग्य, वाहन और कीर्त्ति का लाभ होता है।।१९९०।। पितृवैरयोगः- लग्नेशे भाग्यराशिस्थे षष्ठेशे भाग्यराशिगे । अन्योऽन्यवैरं ब्रुवते जनकः कुत्सितो भवेत् ।।१९९१।। लग्नेश भाग्यभाव में हो और षष्ठेश भाग्यभाव में हो तो परस्पर पिता- पुत्र में वैर होता हैं तथा पिता निन्दनीय होता है।।१९९१।। भिक्षाशनयोगः- कर्माधिपेन सहितो विक्रमेशो च निर्बलः । नीचास्तगो च भाग्येशो योगो भिक्षाशनप्रदः ।।१९९२।। यदि निर्बल तृतीयेश कर्मेश से युक्त हो और भाग्येश नीच वा अस्त में हो तो जातक भिक्षा से उदरपूर्त्ति करने वाला होता है ।।१९९२।। पितृमरणयोगमाह- षष्ठाष्टमव्यये भानू रन्ध्रेशे भाग्यसंयुते । व्ययेशे लग्नराशिस्थे षष्ठेशे पञ्चमे स्थिते ।।१९९३।। जातस्य जननात्पूर्वं जनकस्य मृतिं वदेत् । सूर्य ६/८/१२ भाव में हो और अष्टमेश भाग्य भाव में हो तथा व्ययेश लग्न में और षष्ठेश पाँचवें भाव में हो बालक के जन्म से पूर्व ही पिता की मृत्यु हो जाती है।।१९९३।। रन्ध्रस्थानगते सूर्ये रन्ध्रेशे भाग्यभावगे ।।१९९४ ।। जातस्य प्रथमाब्दे च पितुर्मरणमादिशेत् ।