बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभावेशफलाध्यायः १८९ सुखेश सुख भाव में हो तो मंत्री सभी प्रकार की संपत्ति से युक्त, चतुर, शीलवान्, मानी, धनी और स्त्रीप्रिय तथा सुखी होता है।।२९।। तुर्येशे पञ्चमे भाग्ये सुखी सर्वजनप्रियः। विष्णुभक्तिरतो मानी स्वभुजार्जितवित्तवान् ।।३०।। सुखेश पाँचवें वा नवम भाव में हो तो जातक सुखी, सर्वजनप्रिय, विष्णुभक्त, मानी और अपने पराक्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता है।।३०।। सुखेशे शत्रुगेहस्थे सदा स्याद्बहुयातुकः। क्रोधी चौरोऽभिचारी च दुष्टचित्तो मनस्वपि ।।३१।। सुखेश छठे भाव में हो तो जातक हर समय परदेश में रहनेवाला, क्रोधी, चोर, घात करने वाला, दुष्ट और मनस्वी होता है।।३१।। सुखेशे सप्तमे लग्ने बहुविद्यासमन्वितः। पित्रार्जितधनत्यागी सभायां मूकवद्भवेत् ।।३२।। सुखेश सातवें भाव में हो तो जातक अनेक विद्याओं से युक्त, पिता के धन को त्यागने वाला, सभा में मूक होता है।।३२।। सुखेशे व्ययरन्ध्रस्थे सुखहीनो भवेन्नरः। पितृसौख्यं भवेदल्पं क्लीबो वा जारजोऽपि वा ।।३३।। सुखेश बारहवें या ८वें स्थान में हो तो जातक सुखहीन होता है और उसे पिता का अल्पसुख नपुंसक अथवा जार से उत्पन्न हुआ होता है।।३३।। सुखेशे कर्मगेहस्थे राजमान्यो भवेन्नरः। रसायनी महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम् ।।३४।। सुखेश कर्मभाव में हो तो जातक राजमान्य, रसायन क्रिया को जानने वाला, प्रसन्न और सुख को भोगने वाला होता है।।३४।। अथ सुतेशभावफलम्— सुतेशे लग्नसहजे मायावी पिशुनो महान्। लोष्ठं दत्त्वात्रैव काचिद्द्रव्यस्य का कथा ।।३५।। पंचमेश लग्न और तीसरे भाव में हो तो जातक मायावी और कृपण होता है।।३५।।