बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथानेकयोगाध्यायः २१७ है। योगकर्त्ता ग्रह यदि अपने गृह वा मित्रगृह वा अपने उच्चस्थान में हो तो जातक बहुत धन-सुख से युक्त राजा के समान होता है।।५१।। अथ वोशियोगफलम्- स्यान्मन्ददृष्टिर्बहुकर्मकर्त्ता पश्यत्यधश्चोन्नतपूर्वकायः। असत्यवादी यदि वोशियोगो प्रसूतिक्राले मनुजस्य यस्य ।।५२।। वोशि योग में उत्पन्न पुरुष मंददृष्टिवाला, बहुत कार्य करने वाला, नीचे देखने वाला, ऊँचा शरीर और झूठ बोलने वाला होता है।।५२।। अथ वेशियोगफलम्- चत् सम्भवे यस्य च वेशियोगे भवेद्दयालुः पृथुपूर्वकायः। स्याद्वाग्विलासालसतासमेतस्तिर्यक्प्रचारः खलु तस्य दृष्टे ।।५३।। वेशि योग मे उत्पन्न जातक दयालु, मोटा शरीर, वाणी बोलने में चंतुर, आलसी और तिरछी निगाह वाला होता है।।५३।। अथो-भयचरीयोगफलम्- सर्वसहः स्थिरतरोऽतितरां समृद्धः सत्त्वाधिकः समशरीरविराजमानः। नात्युच्चकः सरलदृक् प्रबलामलश्री- युक्तः किलोभयचरीप्रभवो नरः स्यात् ।।५४।। उभयचरी योग में उत्पन्न जातक सबका सहन करने वाला, स्थिर स्वभाव, अत्यन्त समृद्ध, अधिक बलवान् शरीर वाला, छोटा कद, एक- सी सीधी दृष्टि और अधिक लक्ष्मी से युक्त होता है।।५४।। इति योगाध्यायः। अथ राजयोगादिफलाध्यायः पराशर उवाच- अथातः सम्प्रवक्ष्यामि राजयोगादिकं परम्। ग्रहाणां स्थानभेदेन राशिदृष्टिवशात्फलम् ।।१।। पराशर ने कहा—अब मैं राजयोग आदि को कह रहा हूँ, जो कि ग्रहों के स्थानभेद और राशिदृष्टिवश से फल देने वाले होते हैं।।१।। तपस्थानाधिपो राजा मन्त्री मन्त्राधिपो भवेत्। उभावन्वोन्यसंदृष्टौ जातश्चेदिह राज्यभाक् ।।२।।