बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ राजयोगादिफलाध्यायः २१९ निशार्धाच्च दिनार्धाच्च परं सार्धद्विनाडिका। शुभो तदुद्भवो राजा धनी वा तत्समोऽपि वा ।।१९।। आधी रात के बाद और दोपहर के बाद अढ़ाई घटी २½ शुभवेला होती है। इस समय में उत्पन्न बालक धनी के समान होता है।।१९।। चन्द्रः कविं कविश्चन्द्रं पश्यति लाभतृतीयगः। शुक्राच्चन्द्रे ततः शुक्रे तृतीये वाहनार्थवान् ।।२०।। चन्द्रमा शुक्र को और शुक्र चन्द्रमा को एकादश, तीसरे भाव में होकर परस्पर देखते हों तो वाहन और धन से पूर्ण होता है। इसमें चाहे जो तीसरे भाव में हो।।२०।। अथ चतुर्विधसम्बन्धमाह- प्रथमः स्थानसम्बन्धो दृष्टिस्तु द्वितीयकः। तृतीयस्त्वेकतो दृष्टिः स्थित्येकत्र चतुर्थकः।।२१।। योगकर्त्ता ग्रह परस्पर एक-दूसरे की राशि में हों अथवा परस्पर देखते हों, अपने-अपने स्थान में होकर देखते हों वा एक ही राशि में हों; ये चार प्रकार के संबंध ग्रहों के होते हैं।।२१।। अथ पारिजातादियोगफलम्- तन्वीशः पारिजातस्थस्तदा दाता भवेन्न हि। उत्तमे चोत्तमो दाता गोपुरे पुरुषत्वयुक् ।।२२।। यदि लग्नेश पारिजात अंश में हो तो जातक दाता नहीं होता है। उत्तमांश में हो तो उत्तम दाता होता है। गोपुर में हो तो पुरुषत्व से युक्त होता है।।२२।। सिंहासने भवेन्मान्यः शूरः पारावतांशके। सभासदो देवलोके द्वितीये च मुनिर्मतः ।।२३।। सिंहासनांश में सर्वजनमान्य, पारावतांश में हो तो शूरवीर, देवलोकांश में हो तो सभासद् और दूसरे में हो तो मुनि-समान होता है।।२३।। ऐरावते गजे दुष्टो दिग्योगो न भवेद् ध्रुवम्। सुखेशो वापि जायेशो राज्येशोऽप्येवमेव हि।।२४।। ऐरावत में दुष्ट होता है, इसी प्रकार सुखेश, सप्तमेश और कर्मेश के फल को जानना चाहिए।।२४।।