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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ राजयोगादिफलाध्यायः २१९ निशार्धाच्च दिनार्धाच्च परं सार्धद्विनाडिका। शुभो तदुद्भवो राजा धनी वा तत्समोऽपि वा ।।१९।। आधी रात के बाद और दोपहर के बाद अढ़ाई घटी २½ शुभवेला होती है। इस समय में उत्पन्न बालक धनी के समान होता है।।१९।। चन्द्रः कविं कविश्चन्द्रं पश्यति लाभतृतीयगः। शुक्राच्चन्द्रे ततः शुक्रे तृतीये वाहनार्थवान् ।।२०।। चन्द्रमा शुक्र को और शुक्र चन्द्रमा को एकादश, तीसरे भाव में होकर परस्पर देखते हों तो वाहन और धन से पूर्ण होता है। इसमें चाहे जो तीसरे भाव में हो।।२०।। अथ चतुर्विधसम्बन्धमाह- प्रथमः स्थानसम्बन्धो दृष्टिस्तु द्वितीयकः। तृतीयस्त्वेकतो दृष्टिः स्थित्येकत्र चतुर्थकः।।२१।। योगकर्त्ता ग्रह परस्पर एक-दूसरे की राशि में हों अथवा परस्पर देखते हों, अपने-अपने स्थान में होकर देखते हों वा एक ही राशि में हों; ये चार प्रकार के संबंध ग्रहों के होते हैं।।२१।। अथ पारिजातादियोगफलम्- तन्वीशः पारिजातस्थस्तदा दाता भवेन्न हि। उत्तमे चोत्तमो दाता गोपुरे पुरुषत्वयुक् ।।२२।। यदि लग्नेश पारिजात अंश में हो तो जातक दाता नहीं होता है। उत्तमांश में हो तो उत्तम दाता होता है। गोपुर में हो तो पुरुषत्व से युक्त होता है।।२२।। सिंहासने भवेन्मान्यः शूरः पारावतांशके। सभासदो देवलोके द्वितीये च मुनिर्मतः ।।२३।। सिंहासनांश में सर्वजनमान्य, पारावतांश में हो तो शूरवीर, देवलोकांश में हो तो सभासद् और दूसरे में हो तो मुनि-समान होता है।।२३।। ऐरावते गजे दुष्टो दिग्योगो न भवेद् ध्रुवम्। सुखेशो वापि जायेशो राज्येशोऽप्येवमेव हि।।२४।। ऐरावत में दुष्ट होता है, इसी प्रकार सुखेश, सप्तमेश और कर्मेश के फल को जानना चाहिए।।२४।।

२२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पारिजाते सुताधीशो विद्या चैव कुलोचिता । उत्तमे चोत्तमा विद्या गोपुरे भवनाऽङ्किता ॥१५॥ पंचमेश पारिजातांश में हो तो कुलानुसार विद्या होती है। उत्तमांश में हो तो उत्तम विद्या, गोपुरांश में हो तो कुलानुसार होती है।।१५।। सिंहासने तथा वाच्या साचिव्येन युता तथा। पारावते तथा वाच्यं ब्रह्मविद्यासमन्वितम् ॥१६॥ सिंहासन में मंत्रित्व-योग्य विद्या और पारावत में ब्रह्मविद्या युक्त विद्या होती है।।१६।। सुतेशे देवलोकस्थे कर्मयोगान्वितो भवेत्। उपासना द्वितीये स्याद्भक्तिस्त्वैरावते भवेत् ॥१७॥ पंचमेश देवलोकांश में हो तो जातक कर्मयोगी, दूसरे में उपासक, ऐरावत में भक्तियुक्त होता है।।१७।। धर्मेशे पारिजातस्थे तीर्थकृत्तत्र जन्मनि। पूर्वेऽपि मनुजो जातो ह्युत्तमे चोत्तमो भवेत् ॥१८॥ धर्मेश पारिजातांश में हो तो इस जन्म और पूर्वजन्म दोनों में तीर्थयात्री होता है, उत्तमांश में उत्तम।।१८।। गोपुरे मखकर्त्ता च परे चैवात्र जन्मनि। सिंहासने भवेद्धीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥१९॥ गोपुरांश में हो तो इस जन्म और दूसरे जन्म में यज्ञकर्त्ता होता है। सिंहासनांश में हो तो धीर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय होता है।।१९।। सर्वधर्मपरित्यागी धर्मैकपदमाश्रितः। पारावते परे चैव हंसश्चैवात्र जन्मनि॥२०॥ सभी धर्मों को त्यागकर एक धर्म का व्यवस्थापक होता है। पारावतांश में इस जन्म और परजन्म में जातीय पुरुष होता है।।२०।। लगुडी पितृदण्डी स्याद्देवलोके न संशयः। द्वितीये चेन्द्रपदं गच्छेत्कृत्वा वै हयमेधकम् ॥२१॥ देवलोकांश में हो तो दंडधारी संन्यासी और दूसरे में अश्वमेध यज्ञ करके इन्द्रपद को पाता है।।२१।। ऐरावते तु धर्मात्मा स्वयं धर्मो भविष्यति। श्रीरामः कुन्तिपुत्रो वा द्वितीयो न भविष्यति ॥२२॥

अथ राजयोगादिफलाध्यायः २२१ ऐरावतांश में हो तो स्वयं धर्माचार्य होता है, चाहे श्रीराम हों वा युधिष्ठिर होता है।।२२।। अथ विशेषयोगफलम्— अथ योगफलं ब्रूमो ज्ञातव्यं च विशेषतः। पारिजातादिकानां च फलमेवैकसंस्थितम् ।।२३।। अब विशेषकर योगफल को कह रहा हूँ, पारिजातादि योगों से भिन्न इनका फल होता है।।२३।। लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं च विष्णुस्थानं च केन्द्रकम्। तयोः सम्बन्धमात्रेण राजयोगादिकं भवेत् ।।२४।। त्रिकोण (९।५) लक्ष्मी का स्थान और केन्द्र (१।४।७।१०) विष्णु का स्थान है। इन दोनों के संबंध मात्र से राजयोग होता है।।२४।। केन्द्रपुत्रेशयोर्योगे योगोऽमात्याभिधो भवेत्। पारिजातादिके तौ च तदा स प्रबलो भवेत् ।।२५।। केन्द्रेश और पंचमेश के योग से 'अमात्य' नाम का योग होता है। यदि योगकारक पारिजातादि वर्ग में हो तो प्रबल राजयोग होता है।।२५।। लग्नेशेन धनेशाद्यात्रैव योगः प्रकीर्त्तितः। मन्त्रेशोऽमात्यतां याति सप्तमाधीशयोगतः ।।२६।। लग्नेश के साथ धनेश आदि के संबंध से योग नहीं होता है। पंचमेश सप्तमेश से योग होता हो तो अमात्य योग होता है।।२६।। कर्मेशस्य तु योगेन राजा साचिव्यतामियात्। केन्द्रधर्मेशयोर्योगे राजा वै राजवन्दितः।।२७।। इसी में कर्मेश योग करता हो तो राजा या मंत्री होता है। केन्द्रेश और नवमेश का योग हो तो राजा से वंदित राजा होता है।।२७।। धर्मकर्माधिपौ चैव व्यत्यये तावुभौ स्थितौ। युक्तश्चेद्द्वौ तदा वाच्यः सर्वसौख्यसमन्वितः ।।२८।। धर्मेश, कर्मेश व्यत्यय से अर्थात् धर्मेश कर्म में और कर्मेश धर्म भाव में अथवा एकत्र युक्त हों तो सभी सुखों से युक्त होता है।।२८।। पारिजाते स्थितौ तौ तु दण्डे लोकानुशिक्षकः। उत्तमे चोत्तमो भूयो गजवाजिरथादिमान् ।।२९।।

२२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि धर्मेश कर्मेश पारिजात में हों तो राजा दंड का शिक्षक होता है। उत्तमांश में हो तो हाथी-घोड़े से युक्त उत्तम राजा होता है।।२९।। गोपुरे नृपशार्दूलो पूजितांघ्रिर्नृपैर्भवेत्। सिंहासने चक्रवर्त्ती सर्वक्षोणीशपालकः।।३०।। गोपुरांश में हों तो राजाओं में सिंह, राजाओं से पूज्यचरण वाला राजा होता है। सिंहासनांश में हों तो सभी राजाओं का पालन करने वाला चक्रवर्ती राजा होता है।।३०।। इति राजयोगादिविचारकथनम्। अथ राजयोगाध्यायः पराशर उवाच- अथातः संप्रवक्ष्यामि राजयोगां द्विजोत्तम। येषां विज्ञानमात्रेण नृपपूज्यो जनो भवेत्।।१।। पराशर ने कहा-हे विप्र ! अब मैं राजयोगों को कहता हूँ, जिनके जानने से मनुष्य राजा से पूज्य होता है।।१।। ये ये योगाः पुरा शम्भुभाषिताः शैलजाग्रतः। तेषां सारमहं वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन।।२।। पहले शंकरजी ने पार्वतीजी से जिन-जिन योगों को कहा था मैं उनके सार को तुमसे कह रहा हूँ।।२।। चिन्तयेत्कारके लग्ने जनुर्लग्नेऽथवा द्विज। राजयोगप्रदातारौ लग्नौ द्वौ प्रथमोदितौ।।३।। आत्मकारकांश लग्न और जन्मलग्न यही दो लग्न मुख्यतः राजयोग- कारक होते हैं।।३।। आत्मकारकपुत्राभ्यां राजयोगं प्रकल्पयेत्। तनुपञ्चमनाथाभ्यां तथैव द्विजसत्तम।।४।। आत्मकारक और पंचमेश से राजयोग को देखना चाहिए। इसी प्रकार जन्मलग्न और उससे पंचमाधिपति द्वारा राजयोग देखना चाहिए।।४।। विलग्नात्पञ्चमाधीशः पुत्रात्माकारको द्वयः। विप्रसम्बन्धयोगेन ज्ञेयाः वीर्यबलान्विताः।।५।।

२. द्वादश भाव विचार, योग-कारक ग्रह, राजयोग, दरिद्रयोग एवं अरिष्ट-भंग

अथ राजयोगाध्यायः २२३ जन्मलग्नेश तथा पंचमेश के संबंध से तथा आत्मकारक और उससे पंचमेश इन दोनों के बलाबल के अनुसार उत्तम, मध्यम और अधम राजयोग होता है॥५॥ लग्नेऽथ पञ्चमे वापि लग्नेशे पञ्चमाधिपे। पुत्रात्मकारकौ विप्र लग्ने वा पञ्चमेऽपि च॥६॥ सम्बन्धे वीक्षिते तत्र दृष्टैवं पञ्चमाधिपे। स्वोच्चे स्वांशे स्वभे वापि शुभग्रहनिरीक्षिते॥७॥ महाराजेति योगोऽयं सोऽत्र जातः सुखी नरः। गजवाजिरथैर्युक्तः सेनासङ्गमनैकधा॥८॥ लग्नेश और पंचमेश लग्न में वा पंचम भाव में हों, आत्मकारक और पंचमेश लग्न वा पंचम में हो, दोनों का किसी प्रकार का संबंध हों और अपने उच्च, नवांश या राशि में हों तो 'महाराज' योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष सुखी, हाथी, घोड़ा और रथ-सेना आदि से युक्त होता है॥६- ८॥ भाग्येशः कारके लग्ने पञ्चमे सप्तमेऽपि वा। राजयोगप्रदातारौ गजवाजिधनैरपि॥९॥ भाग्येश और आत्मकारक लग्न, पंचम वा सप्तम में हों तो हांथी, घोड़े और धन से युक्त राज्य को देते हैं॥९॥ कारकाद्विचतुर्थे च पञ्चमे भावगे द्विज। शुभखेटो न सन्देहो राजयोगं ददाति च॥१०॥ कारक से २, ४, ५ भाव में शुभग्रह हों तो निश्चय ही राजयोग करते हैं॥१०॥ कारकात् त्रितये षष्ठे राश्योरुभयपापयुक्। राजवंशोद्भवो विप्र राजयोगस्तथा भवेत्॥११॥ कारक से ३, ६ वा लग्न से ३, ६ भाव में पापग्रह युक्त हों तो राजयोग होता है॥११॥ लग्नाधीशाद्द्यूननाथाद्धने तुर्ये च पञ्चमे। शुभखेटयुते विप्र राजा च भवति ध्रुवम्॥१२॥ लग्नेश से वा सप्तमेश से ४ वा ५ भाव में शुभग्रह युत हों तो निश्चय ही राजा होता है॥१२॥

२२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारके पञ्चमे शुक्रे सितेन्दुयुतवीक्षितः। तन्वारूढपदे लग्ने राजवर्गो भवेन्नरः।।९३।। कारकांश वा पाँचवें भाव में शुक्र हो और शुक्र-चन्द्रमा से युत-दृष्ट हो, लग्न वा आरूढ लग्न में हो तो राजा होता है।।९३।। जन्माङ्गे च हि होराङ्गे कलाङ्गे येन केनचित्। रव्यादि दृष्टिमार्गेण सराजा भवति ध्रुवम् ।।९४।। जन्मलग्न वा होरालग्न वा पदलग्न सूर्यादि किसी ग्रह से देखा जाता हो तो राजा होता है।।९४।। स्वक्षेत्रे तु नवांशे वा द्रेष्काणे भानुजादयः। लग्नं च सप्तमं विप्र पश्यन्ति राजयोगदाः।।९५।। पूर्णदृष्टे पूर्णयोगमर्धे चार्धं विधीयते। पादेन पादयोगं च राजयोगमिदं क्रमात्।।९६।। अपने राशि, नवांश, द्रेष्काण में सूर्य आदि ग्रह होकर लग्न वा सप्तम को देखें तो राजयोग होता है। पूर्णदृष्टि हो तो पूर्ण, अर्धदृष्टि हो तो आधा, पाददृष्टि हो तो चौथाई राजयोग होता है।।९५-९६।। षट्कुण्डल्यन्तरे विप्र पश्यन्ति भास्करादयः। राजयोगप्रदातारौ निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।९७।। षड्वर्ग कुण्डली के लग्न को सूर्य आदि ग्रह देखते हों तो राजयोग होता है।।९७।। लग्नस्थाने पूर्णदृष्ट्या सप्तमे स्वल्पवीक्षिते। स्वल्पराज्यप्रदो विप्र षट्लग्नेषु विचिन्तयेत् ।।९८।। यदि लग्न को पूर्णदृष्टि से और सप्तम को अल्पदृष्टि से देखते हों तो अल्प राजयोग होता है।।९८।। एवं नवांशकुण्डल्यां द्रेष्काणेऽपि विचिन्तयेत् । लग्नसप्तमयोः खेटो राजयोगप्रदायकः ।।९९।। इसी प्रकार नवांशकुंडली और द्रेष्काणकुंडली को भी देखना चाहिए। क्योंकि लग्न और सप्तम देखने वाला ग्रह राजयोगकारक होता है।।९९।।

अथ राजयोगाध्यायः २२५ उच्चग्रहे राजयोगो लग्नद्वयमथापि चेत्। राशेद्रेष्काणंतोंऽशाच्च राशेरंशादथापि वा।।२०।। इन दोनों भावों को अपने उच्च में बैठा ग्रह देखता हो अथवा लग्न और दूसरे भाव को देखता हो तो राजयोग होता है।।२०।। जन्मकालघटीलग्न एकेनैव निरीक्षिते। उच्चारूढे तु सम्प्राप्ते चन्द्राक्रान्ते विशेषतः।।२१।। भावलग्न, होरालग्न और घटीलग्न को कोई ग्रह देखता हो तो राजयोग होता है। इसमें भी लग्नपद वा चन्द्र के साथ कोई उच्चस्थ ग्रह हो तो विशेष राजयोग होता है।।२१।। क्रान्ते वा गुरुशुक्राभ्यां केनाप्युच्चग्रहेण वा। दुष्टार्गलाग्रहाभावे राजयोगो न संशयः।।२२।। लग्नपद वा चन्द्र के साथ कोई उच्च ग्रह हों, उसमें गुरु-शुक्रं का योग हो और पापग्रह कृत अर्गला योग हो तो निःसंशय राजयोग होता है।।२२।। शुभारूढे तत्र चन्द्रे धने देवगुरुस्तथा। राजयोगप्रदाता च निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२३।। अथवा पदस्थान में चन्द्रमा हो, उससे दूसरे गुरु हो तो निश्चय ही राजयोग होता है।।२३।। शुभे लग्ने शुभे त्वर्थे तृतीये पापखेचरैः। चतुर्थे तु शुभे प्राप्ते राजा वा तत्समोऽपि वा।।२४।। शुभग्रह लग्न द्वितीय और चतुर्थ में हों और तीसरे भाव में पापग्रह हों तो राजा वा राजा के समान होता है।।२४।। उच्चस्थे हरिणाङ्को वा जीवो वा शुक्र एव वा। एको बली धनगतः श्रियं दिशति देहिनः।।२५।। यदि चन्द्रमा, गुरु वा शुक्र में कोई अपनी उच्चराशि का बली होकर दूसरे भाव में हो तो लक्ष्मीप्राप्ति होती है।।२५।। लग्नं पश्यति ये खेटास्ते सर्वे शुभदायिनः। नीचखेटोऽपि लग्नं चेत्पश्येद्राजा प्रकीर्त्तितः।।२६।। लग्न को जो ग्रह देखते हैं वे सभी शुभ देने वाले होते हैं। यदि अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह लग्न को देखता हो तो राज्यदायक होता है।।२६।।

२२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् षष्ठाष्टमे तृतीये च लाभे सम्बन्धनीचकृत्। यो ग्रहः पश्यते लग्नं राजयोगप्रदायकः ।।२७।। छठें, आठवें और तीसरे भाव में अपनी नीचराशि का ग्रह भी योगकारक होता है। इनमें से जो ग्रह लग्न को देखता हो वह राजयोगकारक होता है।।२७।। राजयोगो जन्मलग्नं पश्येदुच्चग्रहो यदि। षष्ठाष्टमगते नीचे लग्नं पश्यति योगकृत् ।।२८।। यदि अपनी उच्चराशि में स्थित ग्रह को देखता हो तो राजयोग होता है। छठे, आठवें में अपने नीच राशि में बैठा ग्रह को देखे तो राजयोग होता है।।२८।। षष्ठाष्टमाधिपे नीचे लग्नं पश्यति वाथवा। तृतीये लाभगे नीचे लग्नं पश्यति राज्यदः ।।२९।। अथवा षष्ठेश वा अष्टमेश अपनी नीचराशि में होकर लग्न को देखते हों अथवा तीसरे, ग्यारहवें भाव में होकर लग्न को देखते हों तो राजयोग करते हैं।।२९।। षष्ठाष्टमाधिपौ खेटौ शुभौ नीचाश्रितौ यदा। पश्यतो जन्मलग्नं च राजयोग उदाहृतः ।।३०।। षष्ठेश, अष्टमेश शुभग्रह हों, अपनी नीचराशि में होकर लग्न को देखते हों तो राजयोग होता है।।३०।। इति राजयोगाध्यायः। अथ राजप्रधानयोगाध्यायः राज्येशोऽपि जनुर्लग्नादमात्येशयुतेक्षिते। अमात्यकारकेणापि प्रधानत्वं नृपालये ।।१।। राज्येश (दशमेश) जन्मलग्न से पंचमेश से और अमात्यकारक से युत- दृष्ट हो तो राजा के यहाँ प्रधान होता है।।१।। लाभेशो वीक्षिते लाभे पापदृष्टिविवर्जिते। तदा राज्यालये विप्र प्रधानत्वं कुलेऽपि च ।।२।। लाभेश लाभस्थान को देखता हो और पापग्रह से दृष्ट-युत न हो तो राजा के यहाँ प्रधान होता है।।२।।

अथ राजप्रधानयोगाध्यायः २२७ अमात्यकारकेणापि कारकेन्द्रेशसंयुते। तीव्रबुद्धियुतो बालः सेनाधीशोऽपि जायते॥३॥ आत्मकारक के राशीश अमात्यकारक से युत-दृष्ट हो तो बालक कड़ी तीक्ष्ण बुद्धि का सेनापति होता है॥३॥ कारके केन्द्रकोणेषु तुङ्गर्क्षे चापि संस्थिते। भाग्यपेन युते दृष्टे राजमन्त्री प्रजायते॥४॥ आत्मकारक अपने उच्च का होकर केन्द्र (१।४।९।१०) वा कोण (९।५) में हो और भाग्येश से युत वा दृष्ट हो तो राजमंत्री होता है॥४॥ कारको यस्य राशीशे लग्नगे संयुतेक्षिते। मन्त्रित्वमुख्ययोगोऽयं वार्धके नात्र संशयः॥४॥ आत्मकारक ही जन्मराशीश होकर लग्न में और भाग्येश से युत वा दृष्ट हो तो वृद्धावस्था में मुख्यमंत्री होता है॥५॥ कारके शुभसंयुक्ते पञ्चमे सप्तमेऽपि वा। यत्कारके यदा प्राप्ते तत्कारके धनं लभेत्॥६॥ आत्मकारक शुभग्रह से युक्त होकर पाँचवें वा सातवें भाव में जिस भाव के कारक से युक्त होता है उसके द्वारा धन का लाभ होता है॥६॥ भाग्यारूढपदे लग्ने कारके नवमेऽपि वा। राजयोगप्रदातारौ निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥७॥ भाग्यभाव का पद लग्न में वा आत्मकारक नवम भाव में हो तो राजसंबंधकारक होते हैं॥७॥ लाभेशो लाभभवने पापदृष्टिविवर्जितः। कारके शुभसंयुक्ते लाभं तस्य नृपालयात्॥८॥ लाभेश लाभभाव में हो, पापग्रह से न देखा जाता हो, आत्मकारक शुभग्रह से युत हो तो राजा के यहाँ से लाभ होता है॥८॥ कारकात्तूर्यभावस्थौ सितेन्दू द्विजसत्तम। आदावन्ते विशेषस्य राजचिह्नेन संयुतः॥८॥ कारक से चौथे भाव में शुक्र और चन्द्रमा हों तो आयु के पूर्वार्ध में और अंतिम में राजचिह्नों से युक्त होता है॥९॥ इति राजप्रधानयोगाध्यायः।

२२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ धनयोगाध्यायः अथातः सम्प्रवक्ष्यामि धनयोगं विशेषतः। पञ्चमे तु भृगोक्षेत्रे तस्मिन् शुक्रेण वीक्षिते।।१।। लाभे शनैश्चरयुते बहुद्रव्यस्य नायकः। अब मैं विशेष धनयोगों को कहता हूँ। पाँचवें भाव में शुक्र की राशि (२।७)हो और उसे शुक्र देखता हो तथा एकादश में शनि हो तो बहुधन का स्वामी होता है।।१।। पञ्चमे सौम्यकक्षेत्रे तस्मिन्सौम्ययुते यदि।।२।। लाभे तु चन्द्रभौमौऽथ बहुद्रव्यस्य नायकः। पाँचवें भाव में बुध की राशि (३।६) हो और उसमें बुध युत हो तथा एकादश भाव में चन्द्रमा-भौम हो तो बहुत द्रव्य का स्वामी होता है।।२।। पञ्चमे तु शनिक्षेत्रे तस्मिन्सूर्यसुतो यदि।।३।। लाभे सोमात्मजस्थे वा बहुद्रव्यस्य नायकः। पाँचवें भाव में शनि की राशि (१०।११) हो और उसमें शनि युत हो तथा एकादश भाव में बुध हो तो अनेक द्रव्य का स्वामी होता है।।३।। पञ्चमे तु रविक्षेत्रे तस्मिन् रवियुते यदि।।४।। लाभे रवीन्दुसंस्थे तु बहुद्रव्यस्य नायकः। पाँचवें भाव में सूर्य की राशि (५) हो और उसमें सूर्य हो तथा लाभभाव में रवि-चन्द्रमा हों तो बहुत द्रव्य का स्वामी होता है।।४।। पञ्चमे तु शनिक्षेत्रे तस्मिन् शनियुते यदि। लाभे भौमेन संयुक्ते बहुद्रव्यस्य नायकः।।५।। पाँचवें भाव में शनि की राशि (१०।११) हो और शनि युत हो तथा लाभभाव में भौम हो तो बहुत द्रव्य का स्वामी होता है।।५।। पञ्चमे तु गुरुक्षेत्रे तस्मिन् गुरुयुते यदि। लाभे तु चन्द्रभौमौ चेद्बहुद्रव्यस्य नायकः।।६।। पाँचवें भाव में गुरु की राशि (९।१२) हो और उसमें गुरु युत हो और लाभभाव में चंद्रमा-भौम हों तो बहुत द्रव्य का स्वामी होता है।।६।।

अथ धनयोगाध्यायः २२९ भानुक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् भानौ स्थिते यदि। भौमेन गुरुणा युक्ते दृष्टे वा स्याद्युतो धनैः॥७॥ सूर्य की राशि जन्मलग्न हो और सूर्य युत हो और मंगल गुरु से युत वा दृष्ट हो तो धनी होता है॥७॥ चन्द्रक्षेत्रगते लग्ने तस्मिंश्चन्द्रयुते यदि। जीवभौमयुते दृष्टे जातोऽवश्यं धनी भवेत् ॥८॥ चंद्रमा की राशि लग्न में हो और चंद्रमा से युत हो और गुरु-भौम से युत-दृष्ट हो तो धनी होता है॥८॥ भौमक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन्भौमयुते यदि। सोमशुक्रार्कजैर्दृष्टे युक्ते श्रीमान्नरो भवेत् ॥९॥ मंगल की राशि लग्न में हो और उसमें भौम युत हो और बुध, शुक्र शनि से दृष्ट-युत हो तो धनी होता है॥९॥ गुरुक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् गुरुयुते यदि। सौम्यभौमयुते दृष्टे यातो यस्तु धनीश्वरः ॥१०॥ गुरु की राशि लग्न में हो और उसमें गुरु युत हो और बुध-भौम से दृष्ट-युत हो तो धनी होता है॥१०॥ बुधक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् सौम्ययुते यदि। शनिशुक्रयुते दृष्टे जातो यस्तु धनी नरः ॥११॥ बुध की राशि लग्न में हो और उसमें बुध युक्त हो और शनि-शुक्र से युत-दृष्ट हो तो धनी होता है॥११॥ भृगुक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् भृगुयुते यदि। शनिसौम्ययुते दृष्टे जातो यस्तु धनी भवेत् ॥१२॥ शुक्र की राशि लग्न में हो और शुक्र युत हो और शनि-बुध से युत- दृष्ट हो तो धनी होता है॥१२॥ ये ये ग्रहा धर्मपबुद्धिपाभ्यां युक्ताऽथ दृष्टाश्च सुखप्रदास्ते। रन्ध्रेश्वरादिव्ययपैर्युताः स्युः शोकप्रदा मारकनायकैश्च ॥१३॥ जो-जो ग्रह भाग्येश, पंचमेश से युत-दृष्ट होते हैं वे अपने दशा अंतर में शुभफलद होते हैं और जो अष्टमेश, षष्ठेश और व्ययेश से युत होते हैं वे तथा मारकेश अपने समय में दुःखद होते हैं॥१३॥

२३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् क्रूरसौम्यविभागेन स्वस्थानादिवशात्तथा। ग्रहाणां स्थानभेदेन राशिदृष्टिवशात्फलम् ।।९४।। इस प्रकार क्रूर तथा शुभ ग्रह के अपने स्थानादि भेद से ग्रहों के बलाबल को विचार कर फलादेश समझना चाहिए।।९४।। इति धनयोगाः। अथ दरिद्रयोगाध्यायः लग्नेशे वै रिष्फगते रिष्फेशे लग्नमागते। मारकेशयुते दृष्टे जातः स्यान्निर्धनः पुमान् ।।१।। जन्मलग्नेश बारहवें भाव में और व्ययेश लग्न में हो, मारकेश से युत दृष्ट हो तो मनुष्य निर्धन होता है।।१।। लग्नाधिपे शत्रुगृहं गते वा षष्ठेश्वरे लग्नगतेऽपि वा चेत्। विलग्नपे मारकनाथदृष्टे जातो भवेन्निर्धनकीपि मुख्यः ।।२।। लग्नेश छठे भाव में हो और षष्ठेश लग्न में हो और लग्नेश मारकेश से दृष्ट हो तो निर्धन होता है।।२।। लग्नेन्दू केतुयुक्तौ वा लग्नेशे निधनं गते। मारकेशयुते दृष्टे जातो वै निर्धनो भवेत् ।।३।। लग्न और चंद्रमा केतु से युत हों तथा लग्नेश आठवें भाव में हो, मारकेश से युत-दृष्ट हो तो मनुष्य निर्धन होता है।।३।। षष्ठाष्टमव्ययगते लग्नेशे पापसंयुते। मारकेशयुते दृष्टे राजवंशोऽपि निर्धनः ।।४।। लग्नेश पापग्रह से युत होकर ६-८-१२ भाव में गया हो और मारकेश से युत-दृष्ट हो तो राजबालक भी निर्धन होता है।।४।। विलग्ननाथेऽरिविनाशरिष्फनाथेन युक्ते यदि पापदृष्टे। मित्रात्मजेनाथयुतेपि दृष्टे शुभैर्न दृष्टे स भवेद्दरिद्रः ।।५।। लग्नेश ६-८-१२ भावों के स्वामी से युक्त होकर पापग्रह से दृष्ट होकर शनि से भी युत हो तथा शुभग्रह से न दृष्ट हो तो मनुष्य दरिद्र होता है।।५।। मन्त्रेशो धर्मनाथश्च षष्ठव्ययस्थितौ क्रमात्। दृष्टो चेन्मारकेशेन जातः स्यान्निर्धनो नरः ।।६।।

दरिद्रयोगाध्यायः २३१ पंचमेश और धर्मेश क्रम से ६/१२ भाव में हों और मारकेश से देखे. जाते हों तो जातक निर्धन होता है ।।६।। पापग्रहे लग्नगते राज्यधर्माधिपौ विना। मारकेशयुते दृष्टे जातः स्यान्निर्धनो नरः।।७।। कर्मेश और नवमेश से अतिरिक्त अन्य पापग्रह लग्न में हों और मारकेश से युत-दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है।।७।। यद्भावेशो रन्ध्ररिष्फारिसंस्थो यद्भावस्था रन्ध्ररिष्फारिभेशाः। पापैर्दृष्टो मन्ददृष्टोऽथवा चेद्दुःखाक्रान्तश्चञ्चलो निर्धनः स्यात्।।८।। जो भावेश (३-८-१२) में स्थित हों और जिस भाव में (६-८- १२) के स्वामी हों, पापग्रह वा शनि से दृष्ट हों तो जातक दुःखी, चंचल और दरिद्र होता है।।८।। चन्द्राक्रान्तनवांशेशो मारकेशयुतो यदि। मारकस्थानगो वापि जातोऽसौ निर्धनो भवेत् ।।९।। चंद्रमा के नवांश का स्वामी मारकेश से युत हो अथवा मारक स्थान में हो तो जातक निर्धन होता है।।९।। विलग्नेशनवांशेशौ रिष्फषष्ठाष्टगौ यदि। मारकेशयुतौ दृष्टौ जातोऽसौ निर्धनो नरः।।१०।। लग्नेश के नवांश का स्वामी १२-६-८ भाव में हो और मारकेश से युत दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है।।१०।। शुभस्थानगताः पापाः पापस्थाने गताः शुभाः। धनार्तिर्जायते बालो भोजनेन प्रपीडितः।।११।। शुभग्रह की राशि में पापग्रह और पापग्रह की रशि में शुभग्रह हों तो जातक को धन और अन्न दोनों का कष्ट होता है।।११।। कारकाद्वा विलग्नाद्वा रन्ध्रे रिष्फे द्विजोत्तम। लग्नकारकयोर्दृष्ट्या दरिद्रार्त्तियुतो नरः।।१२।। कारक से वा लग्न से ८/१२ वें भाव को कारक और लग्नेश न देखते हों तो जातक दरिद्र होता है।।१२।। लग्नाद्वा कारकाद्वापि द्वादशे यस्य वै द्विज। लग्नकारकयोर्दृष्ट्या व्ययशीलो भवेन्नरः।।१३।।

२३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्न वा कारक से १२वें भाव पर लग्नेश वा कारक की दृष्टि हो तो जातक अधिक व्यय करने वाला होता है।।१३।। ये ये ग्रहा धर्मपबुद्धिपाभ्यां युक्ता न दृष्टा बहुदुःखदास्ते। रन्ध्रादिषष्ठव्ययपैर्युतांस्ते व्ययप्रदा मारकनाथकेन ।।१४।। जो-जो ग्रह त्रिकोणेश से युत-दृष्ट न होकर त्रिकेश (६-८-१२) से युत हों और मारकेश से दृष्ट हों, वे अपने दशा में दुःखदायी होते हैं।।१४।। अथ दरिद्रभङ्गयोगाः- धनसंस्थौ च भौमेन्दू कथितौ धननाशकौ। बुधेक्षितौ महावित्तं कुरुतस्तत्रगः शनिः ।।१५।। धन भाव में भौम-चंद्रमा धननाशक होते हैं, किंतु बुध से देखे जाते हों तो महाधनी होता है एवं शनि हों तो भी महाधनी होता है।।१५।। निःस्वतां कुरुते तत्र रविनित्यं यमेक्षितः। महाधनयुतं ख्यातं शन्यदृष्टः करोत्यसौ ।।१६।। दूसरे भाव में रवि हो और शनि से देखा जाता हो तो दरिद्र होता है, किंतु शनि न देखता हो तो महाधनी होता है।।१६।। धनभावगताः सौम्याः कुर्वन्त्येव धनं बहु। बुधदृष्टो गुरुस्तत्र निर्धनं कुरुते नरम् ।।१७।। धनभाव में शुभग्रह हों तो बहुत धन होता है, किंतु उसी भाव में गुरु हो और बुध देखता हो तो निर्धन होता है।।१७।। बुधश्चन्द्रेक्षितस्तत्र सर्वस्वं हन्ति निश्चितम्। क्रूरखेटादियोगैश्च दारिद्र्यं सम्भवेन्नृणाम् ।।१८।। यदि बुध हो और चंद्रमा देखता हो तो सर्वस्व का नाश होता है। क्रूरग्रह आदि के योग से जातक को दरिद्रयोग होता है।।१८।। इति दारिद्र्योगाध्यायः। ग्रहाणामवस्थाध्यायः मैत्रेय उवाच- आदित्यादिग्रहाणां च ह्यवस्था च पृथक् पृथक्। भेदाः कतिविधाः सन्ति कथय त्वं कृपानिधे ! ।।१।।

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३३ मैत्रेय ने कहा-हे कृपानिधि ! सूर्य आदि ग्रहों की अवस्थाओं के भेद और उनकी संख्या पृथक्-पृथक् मुझसे कहें ।।१।। पराशर उवाच- भास्करादिग्रहाणां च ह्यवस्था विविधानि च। षण्णवत्याश्रितावस्था सारभूतं वदाम्यहम् ।।२।। पराशरजी ने कहा- सूर्य आदि ग्रहों की अनेक अवस्थायें हैं, जिनकी संख्या ९६ हैं। उनमें सारभूत प्रधान अवस्थाओं को कह रहा हूँ।।२।। अथ जाग्रदाद्यवस्था तत्फलं चाह- त्रिंशदंशं त्रिभागं च कल्पयित्वा पृथक् पृथक् । विषमादिक्रमेणैव समे वै विपरीतकम् ।।३।। विज्ञानं प्रथमं पुंसां जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिकाः। विशेषतः परीक्ष स्याज्जागरः कार्यसाधकः ।।४।। तीस अंशात्मक राशि के तीन भाग करके दश-दश अंश के एक-एक भाग का विषम राशि में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त अवस्था होती है और समराशि में विलोम(सुषुप्त, स्वप्न, जाग्रत्) अवस्था होती है। परीक्षण से यह निश्चित है कि जाग्रत् अवस्था में कार्य सिद्ध होता है।।३-४।। स्वप्नावस्था मध्यफला उपदेष्टा गुरुर्यदि। निष्फला चरमावस्था ज्ञातव्या मुनिसत्तम ।।५।। स्वप्नावस्था मध्यम फलदायक और सुषुप्त अवस्था निष्फल होती है।।५।। अथ दीप्ताद्यवस्था तत्फलं चाह- दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽतिदुःखितः। विकलश्च खलः क्रोधी नवधा खेचरो भवेत् ।।६।। दीप्त, स्वस्थ, मुदित, शांत, दीन, अतिदुःखी, विकल, खल और कोपी- ये नव अवस्थायें होती हैं।।६।। उच्चस्थः खेचरो दीप्तः स्वस्थः स्यादधिमित्रके। मुदितो मित्रभे शान्तः समभे दीन उच्यते ।।७।।

·२३४· बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जो ग्रह अपनी उच्चराशि में होता है वह दीप्त होता है। अपने अधिमित्र के गृह में हो तो स्वस्थ, मित्र के गृह में हो तो मुदित, सम के गृह में हो तो दीन।।७।। शत्रुभे दुःखितोऽतीवविकलः पापसंयुतः। खलः खलग्रहे ज्ञेयः कोपी स्यादर्कसंयुतः॥८॥ शत्रु की राशि में हो तो अतिदुःखी, पापग्रह के साथ हो तो विकल, पापग्रह की राशि में हो तो खल और सूर्य के साथ हो तो कोपी होता है॥८।। पाके प्रदीप्तस्य धराधिपत्यमुत्साहशौर्यं धनवाहने च। स्त्रीपुत्रलाभं शुभबन्धुपूजां क्षितीश्वरान्मानमुपैति विद्याम्।।९।। दीप्त ग्रह की राशि में पृथ्वी का लाभ, उत्साह, पराक्रम, धन, वाहन, स्त्री-पुत्र का लाभ, शुभकार्य, बंधुओं से प्रतिष्ठा और राजा से प्रतिष्ठा का लाभ होता है।।८।। स्वस्थस्य खेटस्य दशाविपाके स्वस्थो नृपाल्लब्धधनादिसौख्यम्। विद्यां यशः प्रीतिमहत्त्वमाराद्वारार्थभूम्यात्मजधर्ममेति।।१०।। स्वस्थ ग्रह की दशा में स्वस्थता, राजा से प्राप्त धन आदि का सुख, विद्या, यश, धन-धर्म आदि का लाभ होता है।।१०।। मुदान्वितस्यापि दशाविपाके वस्त्रादिकं गन्धसुतीर्थधैर्यम्। पुराणधर्मश्रवणादिलाभं हयादियानाम्बरभूषणाप्तिम्।।११।। मुदित ग्रह की दशा में वस्त्र, गंध, तीर्थयात्रा, धैर्य, पुराण आदि का श्रवण, घोड़ा आदि सवारियों का लाभ, आभूषण का लाभ होता है।।११।। दशाविपाके सुखधर्ममेति शान्तस्य भूपुत्रकलत्रयानम्। विद्याविनोदान्वितधर्मशास्त्रं बह्वर्थदेशाधिपपूज्यतां च।।१२।। शांत की दशा में सुख, धर्म का लाभ, भूमि, स्त्री, सवारी, विद्या- का विनोद, धर्मशास्त्र, बहुत धन तथा राजाओं से पूज्य होता है।।१२।। स्थानच्युतिबन्धुविरोधता च दीनस्य खेटस्य दशाविपाके। जीवत्यसौ कुत्सितहीनवृत्त्या त्यक्तो जनै रोगनिपीडितः स्यात्।१३। दीन ग्रह की दशा में स्थानच्युति, बंधुओं से विरोध, कुत्सित वृत्ति से जीविका, लोगों से त्यागा हुआ और रोग से पीडित होता है।।१३।।

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३५ दुःखार्दितस्यापि दशाविपाके नानाविधं दुःखमुपैति नित्यम्। विदेशगो बन्धुजनैर्विहीनश्चौराग्निभूपैर्भयमातनोति।।१४।। अतिदुःखी ग्रह की दशा में अनेक प्रकार के दुःखों से युक्त, विदेश यात्रा, बंधुओं से त्याज्य, चोर, अग्नि और राजा से भय होता है।।१४।। वैकल्यखेटस्य दशाविपाके वैकल्यमायाति मनोविकारम्। मित्रादिकानां मरणं विशेषात्स्त्रीपुत्रयानाम्बरचोरपीडाम्।।१५।। विकल ग्रह की दशा में शरीर में विकलता, मन में विकार, मित्रादिकों का मरण, स्त्री, पुत्र, सवारी आदि की पीडा होती है।।१५।। दशाविपाके कलहं वियोगं खलस्य खेटस्य पितुर्वियोगम्। शत्रोर्जनानां धनभूमिनाशमुपैति नित्यं स्वजनैश्च निन्दाम्।।१६।। खल ग्रह की दशा में कलह, वियोग, पिता का वियोग, शत्रु द्वारा जन, धन, भूमि का नाश और अपने ही लोगों से नित्य निंदा होती है।।१६।। कोपान्वितस्यापि दशाविपाके पापाः समायान्ति बहुप्रकारैः। विद्याधनस्त्रीसुतबन्धुनाशं पुत्रादिकृच्छ्रं खलु नेत्ररोगम्।।१७।। कोपी ग्रह की दशा में अनेक प्रकार के पापकर्म, विद्या, धन, स्त्री, पुत्र और बंधुओं का नाश, पुत्रादि को कष्ट और नेत्ररोग होता है।।१७।। अथ बालाद्यवस्थाफलम्- बालो रसांशैरसमे प्रदिष्टस्ततः कुमारो हि युवाथ वृद्धः। मृतः क्रमादुत्क्रमतः समर्क्षे बालाद्यवस्था कथिता ग्रहाणाम्।। फलं तु किञ्चिद्वितनोति बालश्चार्द्धं कुमारो यतते न पुंसाम्। युवा समग्रं खचरोऽथ वृद्धः फलं च दुष्टं मरणं मृताख्यम्।।१९।। एक राशि में षष्ठांश के तुल्यं बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत ये पाँच अवस्थाएँ होती हैं। बाल साधारण, कुमार में आधा, युवा में कुछ, वृद्ध में संपूर्ण और मृत में मृत्यु होती है।।१८।१९।। अथ प्रवासाद्यवस्थाफलम्- प्रवासनष्टा च मृता जया हास्या रतिर्मुदा। शुचा ज्वरा च कम्प्रा च सुस्थिता चाथ सन्निभा।।२०।।

२३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रवास, नष्टा, मृत, जय, हास्य, रति, मुद, सुदा, भुक्त, ज्वर, कंप और स्थिर ये १२ अवस्थाएँ होती हैं।।२०।। षष्ठिघ्नं गतभं भुक्तघटीयुक्तं युगाहतम्। शराब्धिहल्लभ्यतोऽर्काच्छेषावस्था द्विजोत्तम।।२१।। गत नक्षत्र की संख्या को ६० से गुणाकर उसमें नक्षत्र की भुक्त घटी को जोड़कर ४ से गुणाकर उसमें ४५ से भाग देवे तो लब्धि तुल्य अवस्था होती है। लब्धि १२ से अधिक हो तो उसमें १२ से भाग देने से शेष गत अवस्था होती है।।२१।। प्रवासः प्रवासोपगे जन्मकालेऽर्थनाशस्तु नष्टोपगे मृत्युभीतिः। मृतावस्थिते स्याज्जयायां जयस्तु विलासस्तु हास्योपगे कामिनीभिः।। रतौ स्याद्रतिः क्रीडिता सौख्यदात्री प्रसुप्तापि निद्रां कलिं देहपीडाम्। भयं तापहानिः सुखं स्यात्तु भुक्त्वा ज्वराकम्पितासुस्थितासु क्रमेण।।२३।। अवस्थाओं के नाम के अनुसार ही उनके फल होते हैं।।२२-२३।। अथ लज्जिताद्यवस्था तत्फलं चाह- लज्जितो गर्वितश्चैव क्षुधितस्तृषितस्तथा। मुदितः क्षोभितश्चैव ग्रहावस्थाः प्रकीर्त्तिताः।।२४।। लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित, क्षोभित, ये ६ ग्रहों की अवस्थाएँ होती हैं।।२४।। पुत्रगेहगतः खेटो राहुकेतुयुतो भवेत्। रविमन्दकुजैर्युक्तो लज्जितो ग्रह एव च।।२५।। पाँचवें भाव में ग्रह राहु, केतु, रवि, शनि और भौम से युक्त हो तो लज्जित होता है।।२५।। तुङ्गस्थानगतो वापि त्रिकोणेऽपि भवेत्पुनः। गर्वितः सोऽपि गदितो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२६।। यदि अपनी उच्चराशि वा मूल त्रिकोण में हो तो गर्वित होता है।।२६।। शत्रुगेही शत्रुयुक्तो रिपुदृष्टो भवेद्यदि। क्षुधितः स च विज्ञेयः शनियुक्तो यथा तथा।।२७।।

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३७ शत्रु की राशि में हो, शत्रु से युक्त हो, शत्रु से देखा जाता हो अथवा शनि से युक्त हो तो क्षुधित होता है।।२७।। जलराशौ स्थितः खेटः शत्रुणा चावलोकितः। शुभग्रहा न पश्यन्ति तृषितः स उदाहृतः।।२८।। ग्रह जलराशि में हो, अपने शत्रु से देखा जाता हो, शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो तृषित होता है।।२८।। मित्रगेही मित्रयुक्तो मित्रेण चावलोकितः। गुरुणा सहितो यश्च मुदितः स प्रकीर्त्तितः।।२९।। यदि ग्रह मित्र के गृह में हो, मित्र से युक्त हो और मित्र से देखा जाता हो और गुरु से युक्त हो तो मुदित होता है।।२९।। रविणा सहितो यश्च पापाः पश्यन्ति सर्वथा। क्षोभितं तं विजानीयाच्छत्रुणा यदि वीक्षितः।।३०।। रवि से युक्त हो और केवल पापग्रह से दृष्ट हो और शत्रु से देखा जाता हो तो क्षोभित होता है।।३०।। येषु येषु च भावेषु ग्रहास्तिष्ठन्ति सर्वथा। क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनः।।३१।। जिन-जिन भावों में क्षुधित और क्षोभित ग्रह रहते हैं उन-उन भाव के फलों का नाश होता है।।३१।। एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु पण्डितैः। बलाबलविचारेण वक्तव्यः फलनिर्णयः।।३२।। इसी प्रकार सभी भावों का बलाबल के विचार से फल का निर्णय करना चाहिए।।३२।। अन्योन्यं च मुदा युक्तं फलं मिश्रं वदेत्पुनः। बलहीने तथा हानिः सबले च महाफलम्।।३३।। परस्पर मुदित ग्रह हों तो मिश्रित फल होता है। यदि ग्रहहीन बल हो तो हानि और बली हो तो अधिक फल होता है।।३३।। कर्मस्थाने स्थितो यस्य लज्जितस्तृषितस्तथा। क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनः।।३४।। जिसके कर्मभाव में लज्जित वा तृषित ग्रह हो अथवा क्षुधित वा क्षोभित ग्रह हो तो वह मनुष्य दुःखी होता है।।३४।।

२३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सुतस्थाने भवेद्यस्य लज्जितो ग्रह एव च। सुतनाशो भवेत्तस्य एकस्तिष्ठति सर्वदा।।३५।। जिसके पुत्रस्थान में लज्जित ग्रह हो तो उसके पुत्र का नाश होता है।।३५।। क्षोभितस्तृषितश्चैव सप्तमे यस्य वा भवेत्। म्रियते तस्य नारी च सत्यमाहुर्द्विजोत्तम।।३६।। जिसके सातवें भाव में क्षोभित वा तृषित ग्रह हो तो उसकी स्त्री का नाश होता है।।३६।। नवालयारामसुखं नृपत्वं कलापटुत्वं विदधाति पुंसाम्। सदार्थलाभं व्यवहारवृद्धिं फलं विशेषादिह गर्वितस्य।।३७।। भवति मुदितयोगे वासशालाविशाला विमलवसनभूषाभूमियोषासु सौख्यम्। स्वजननजनविलासो भूमिपागारवासो रिपुनिवहविनाशो बुद्धिविद्याविकासः।।३८।। गर्वित ग्रह की दशा में नूतन मकान, बगीचा का सुख, नृपत्व, कला में पटुता, सदा धन का लाभ, व्यवहार में कुशलता, राजगृह में वास और शत्रुओं के समूह का नाश होता है।।३८।। दिशति लज्जितभाववशाद्रतिं विगतराममतिं विमतिक्षयम्। सुतगदागमनं गमनं वृथा कलिकथाभिरुचिं न रुचिं शुभे।।३९।। लज्जित ग्रह की दशा में ईश्वर में अनिच्छा, सुंदर बुद्धि की हानि, पुत्र को कष्ट, व्यर्थ भ्रमण, झगड़ा आदि में रुचि और धर्म में अरुचि होती है।।३९।। संक्षोभितस्यापि फलं विशेषाद्दरिद्रजातं कुमतिं च कष्टम्। करोति वित्तक्षयमंघ्रिबाधां धनादिबाधामवनीशकोपात्।।४०।। क्षुधितग्रहवशाद्वै शोकमोहादितापः परिजनपरितापादाधिभीत्या कृशत्वम्। कलिरपि रिपुलोकैरर्थबाधा नराणा- मखिलबलनिरोधो बुद्धिरोधो विषादात्।।४१।।