बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहाणामवस्थाध्यायः २३७ शत्रु की राशि में हो, शत्रु से युक्त हो, शत्रु से देखा जाता हो अथवा शनि से युक्त हो तो क्षुधित होता है।।२७।। जलराशौ स्थितः खेटः शत्रुणा चावलोकितः। शुभग्रहा न पश्यन्ति तृषितः स उदाहृतः।।२८।। ग्रह जलराशि में हो, अपने शत्रु से देखा जाता हो, शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो तृषित होता है।।२८।। मित्रगेही मित्रयुक्तो मित्रेण चावलोकितः। गुरुणा सहितो यश्च मुदितः स प्रकीर्त्तितः।।२९।। यदि ग्रह मित्र के गृह में हो, मित्र से युक्त हो और मित्र से देखा जाता हो और गुरु से युक्त हो तो मुदित होता है।।२९।। रविणा सहितो यश्च पापाः पश्यन्ति सर्वथा। क्षोभितं तं विजानीयाच्छत्रुणा यदि वीक्षितः।।३०।। रवि से युक्त हो और केवल पापग्रह से दृष्ट हो और शत्रु से देखा जाता हो तो क्षोभित होता है।।३०।। येषु येषु च भावेषु ग्रहास्तिष्ठन्ति सर्वथा। क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनः।।३१।। जिन-जिन भावों में क्षुधित और क्षोभित ग्रह रहते हैं उन-उन भाव के फलों का नाश होता है।।३१।। एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु पण्डितैः। बलाबलविचारेण वक्तव्यः फलनिर्णयः।।३२।। इसी प्रकार सभी भावों का बलाबल के विचार से फल का निर्णय करना चाहिए।।३२।। अन्योन्यं च मुदा युक्तं फलं मिश्रं वदेत्पुनः। बलहीने तथा हानिः सबले च महाफलम्।।३३।। परस्पर मुदित ग्रह हों तो मिश्रित फल होता है। यदि ग्रहहीन बल हो तो हानि और बली हो तो अधिक फल होता है।।३३।। कर्मस्थाने स्थितो यस्य लज्जितस्तृषितस्तथा। क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनः।।३४।। जिसके कर्मभाव में लज्जित वा तृषित ग्रह हो अथवा क्षुधित वा क्षोभित ग्रह हो तो वह मनुष्य दुःखी होता है।।३४।।