भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

२३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सुतस्थाने भवेद्यस्य लज्जितो ग्रह एव च। सुतनाशो भवेत्तस्य एकस्तिष्ठति सर्वदा।।३५।। जिसके पुत्रस्थान में लज्जित ग्रह हो तो उसके पुत्र का नाश होता है।।३५।। क्षोभितस्तृषितश्चैव सप्तमे यस्य वा भवेत्। म्रियते तस्य नारी च सत्यमाहुर्द्विजोत्तम।।३६।। जिसके सातवें भाव में क्षोभित वा तृषित ग्रह हो तो उसकी स्त्री का नाश होता है।।३६।। नवालयारामसुखं नृपत्वं कलापटुत्वं विदधाति पुंसाम्। सदार्थलाभं व्यवहारवृद्धिं फलं विशेषादिह गर्वितस्य।।३७।। भवति मुदितयोगे वासशालाविशाला विमलवसनभूषाभूमियोषासु सौख्यम्। स्वजननजनविलासो भूमिपागारवासो रिपुनिवहविनाशो बुद्धिविद्याविकासः।।३८।। गर्वित ग्रह की दशा में नूतन मकान, बगीचा का सुख, नृपत्व, कला में पटुता, सदा धन का लाभ, व्यवहार में कुशलता, राजगृह में वास और शत्रुओं के समूह का नाश होता है।।३८।। दिशति लज्जितभाववशाद्रतिं विगतराममतिं विमतिक्षयम्। सुतगदागमनं गमनं वृथा कलिकथाभिरुचिं न रुचिं शुभे।।३९।। लज्जित ग्रह की दशा में ईश्वर में अनिच्छा, सुंदर बुद्धि की हानि, पुत्र को कष्ट, व्यर्थ भ्रमण, झगड़ा आदि में रुचि और धर्म में अरुचि होती है।।३९।। संक्षोभितस्यापि फलं विशेषाद्दरिद्रजातं कुमतिं च कष्टम्। करोति वित्तक्षयमंघ्रिबाधां धनादिबाधामवनीशकोपात्।।४०।। क्षुधितग्रहवशाद्वै शोकमोहादितापः परिजनपरितापादाधिभीत्या कृशत्वम्। कलिरपि रिपुलोकैरर्थबाधा नराणा- मखिलबलनिरोधो बुद्धिरोधो विषादात्।।४१।।