भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३९ क्षोभित ग्रह की दशा में दरिद्रता, दुर्बुद्धि, कष्ट, धन का नाश, पैर में कष्ट, राजा के कोप से धनप्राप्ति में बाधा होती है। क्षुधित ग्रह की दशा में शोक, मोह, परिजनों के कष्ट से मानसिक व्यथा, कृशता, शत्रु से विवाद, धन की हानि और विरोध से बुद्धि की हानि होती है।।४१।। तृषितखगभवे स्यादंगनासंगमध्ये भवति गदविकारो दुष्टकार्याधिकारः। निजजनपरिवादादर्थहानिः कृशत्वं खलकृतपरितापो मानहानिः सदैव।।४२।। तृषित ग्रह की दशा में स्त्री के संसर्ग से रोग, दुष्ट कार्य का अधिकार, अपने ही लोगों के विवाद से धन की हानि, कृशता, दुष्टों से कष्ट और मानहानि होती है।।४२।। अथ शयनाद्यवस्थानयनम्- शयनं चोपवेशं च नेत्रपाणिप्रकाशनम्। गमनागमनं चाथ सभायां वसतिं तथा।।४३।। आगमं भोजनं चैव नृत्यलिप्सां च कौतुकम्। निद्रां ग्रहाणां चेष्टां च कथयामि तवाग्रतः।।४४।। १ शयन, २ उपवेशन, ३ नेत्रपाणि, ४ प्रकाशन, ५ गमन, ६ आगमन, ७ सभावास, ८ आगम, ९ भोजन, १० नृत्यलिप्सा, ११ कौतुक, १२ निद्रा

  • ये १२ अवस्था और उनकी चेष्टाओं को कहता हूँ।।४३-४४।। यस्मिन्नृक्षे भवेत्खेटस्तेन तं परिपूरयेत्। पुनरंशेन सम्पूर्य स्वनक्षत्रं नियोजयेत्।।४५।। यातदण्डं तथा लग्नमेकीकृत्य सदा बुधः। रविणा हरते भागं शेषं कार्ये नियोजयेत्।।४६।। जिस नक्षत्र में ग्रह हो उसकी संख्या से ग्रहसंख्या को गुणा कर दे। गुणन- फल को ग्रह की नवांश संख्या से गुणा कर दे। गुणनफल में जन्मनक्षत्र संख्या को जोड़ दे और इसमें इष्टघटी और लग्न की संख्या को जोड़ कर उसमें १२ का भाग देने से शेष के तुल्य शयन आदि अवस्था होती है।।४५-४६।। नाक्षत्रिकदशाक्रमेण पुनः पूरणमाचरेत्। नामाक्षरेण संयुक्ते हर्तव्यं रविणा ततः।।४७।।