भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 800 में से

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पृष्ठ 238

२४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् फिर शेषांक को उसी से गुणा कर गुणनफल में नाम के आद्यक्षर के अनुसार स्वरांक को जोड़ दे और १२ से भाग देवे, शेष में ग्रह का ध्रुवांक. जोड़ दे।।४७।। रवौ पञ्च तथा देयं चन्द्रे दद्याद्द्वयं तथा। कुजे द्वयं च संयुक्तं बुधे त्रीणि नियोजयेत् ।।४८।। जैसे रवि का ५, चंद्र का २, भौम का २, बुध का ३।।४८।। गुरौ बाणाः प्रदेयाश्च त्रयं दद्याच्च भार्गवे। शनौ त्रयमथो देयं राहौ दद्याच्चतुष्टयम् ।।४९।। गुरु का ५, शुक्र का ३, शनि का ३ और राहु का ४।।४९।। शेषं हतं च रामेण ग्रहाणां त्रिविधं भवेत्। दृष्टिं चेष्टां विचेष्टां च कथयामि तवाग्रतः ।।५०।। जोड़कर ३ का भाग देने से १ बचे तो दृष्टि, २ बचे तो चेष्टा और ३ या ० बचे तो विचेष्टा होती है।।५०।। उदाहरण— जैसे सूर्य ३-१८-२६-१४ जन्मनक्षत्र पुनर्वसु, इष्टघटी ३२ और जन्मलग्न मकर है। सूर्य आश्लेषा नक्षत्र में है, उसकी संख्या ९ है, रवि की संख्या १ को गुणा किया तो ९ हुआ, रवि की नवांश संख्या ६ से गुणा करने पर ६x९=५४ हुआ। इसमें जन्मनक्षत्र संख्या ७, इष्टघटी ३२ और जन्मलग्न संख्या १० इन तीनों को जोड़ने से १०३ हुआ। इसमें १२ का भाग देने से शेष ७ बचा, अतः सातवीं सभावास अवस्था सूर्य की हुई। फिर शेष को उसी से गुणा करने से ४९ हुआ। इसमे दिनेश के आद्य अक्षर का स्वरांक ५ जोड़कर १२ से भाग देने से ६ शेष बचा। इसमें रवि का ध्रुवांक ५ जोड़कर तीन का भाग देने से २ बचा, अतः चेष्टा अवस्था हुई। स्वराङ्कचक्र

अ.इ.उ.ए.ओ.