बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहाणामवस्थाध्यायः २४१ दृष्ट्यादिफलम्- दृष्टौ स्वल्पफलं ज्ञेयं चेष्टायां विपुलं धनम्। विचेष्टायां फलं न स्यादेवं दृष्टिफलं विदुः॥५१॥ दृष्टि में ग्रहों की अवस्था का अल्पफल, चेष्टा में अधिक फल और विचेष्टा में निष्फल होता है।।५१।। शुभाशुभं ग्रहाणां च समीक्ष्याथ बलाबलम्। तुङ्गस्थाने विशेषेण बलं ज्ञेयं तथा बुधैः॥५२॥ ग्रहों का शुभाशुभ और बलाबल विचार कर फलादेश करना चाहिए।।५२।। अथ रवेर्द्वादशावस्थाफलम्- मन्दाग्निरोगो बहुधा नराणां स्थूलत्वमंघ्रेरपि पित्तकोपः। व्रणं गुदे शूलमुरःप्रदेशे यदोष्णभानौ शयनं प्रयाते॥५३॥ यदि सूर्य शयन अवस्था में हो तो जातक को मंदाग्निरोग, चरण में स्थूलता, पित्तप्रकोप, गुदा में व्रण तथा हृदय में शूल होता है।।५३।। दरिद्रताभारविहारशाली विवादविद्याभिरतो नरः स्यात्। कठोरचित्तः खलु नष्टवित्तः सूर्यो यदा चेदुपवेशनस्थः॥५४॥ उपवेशन अवस्था में हो तो दरिद्रता को भोगने वाला, कठोर चित्त वाला तथा नष्ट धन वाला होता है।।५४।। नरः सदानन्दधरः विवेकी परोपकारी बलवित्तयुक्तः। महासुखी राजकृपाभिमानी दिवाधिनाथो यदि नेत्रपाणौ॥५५॥ नेत्रपाणि अवस्था में हो तो सदा आनंद भोगनेवाला, विवेकी, परोपकारी, बली, धनी, महासुखी, राजा की कृपा से अभिमानी होता है।।५५।। उदारचित्तः परिपूर्णवित्तः सभासु वक्ता बहुपुण्यकर्त्ता। महाबली सुन्दररूपशाली प्रकाशने जन्मनि पद्मिनीशे॥५६॥ प्रकाशन में हो तो उदार चित्तवाला, धन से पूर्ण, सभा मे वक्ता, अनेक पुण्य करने वाला, महाबली, सुंदर रूपवाला होता है।।५६।। प्रवासशाली किल दुःखमाली सदालसी धीधनवर्जितश्च। भयातुरः कोपपरो विशेषाद्दिवाधिनाथे गमने मनुष्यः॥५७॥