भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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२४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमन अवस्था में हो तो जातक प्रवास मे रहने वाला, दुःखी, सदा आलसी, बुद्धि-धन से रहित, भयातुर, क्रोधी होता है।।५७।। परदाररतो जनतारहितो बहुधा गमने गमनाभिरुचिः। कृपणः खलताकुशलो मलिनं दिवसाधिपतौ मनुजः कुमतिः।।५८।। आगमन अवस्था में हो तो परस्त्री में आसक्त, जनमत से रहित, यात्रा में रुचि, कृपण, दुष्टता में कुशल और मलिन होता है।।५८।। सभागते हिते नरः परोपकारतत्परः सदार्थरत्नपूरितो दिवाकरे गुणाकरः। वसुन्धरानवाम्बरालयान्वितो महाबली विचित्रमित्रवत्सलः कृपाकलाधरः परः।।५९।। सभा अवस्था में हो तो परोपकारी, सदा धन-रत्न से परिपूर्ण, गुण का भंडार, भूमि, नूतन वस्त्र, गृह से युक्त, महाबली, अनेक मित्रों से युक्त और कृपालु होता है।।५९।। क्षोभितो रिपुगणैः सदा नरश्चञ्चलः खलमतिः कृशस्तथा। धर्मकर्मरहितो मदोद्धतश्चागमे दिनपतौ यदा तदा।।६०।। आगम अवस्था में सूर्य हो तो जातक शत्रुओं से क्षुभित, चंचल, दुष्टबुद्धि, कृशशरीर, धर्म-कर्म से रहित और उद्धत स्वभाव का होता है।।६०।। सदाङ्गसन्धिवेदना पराङ्गनाधनक्षयो बलक्षयः पदे पदे यदा तदा हि भोजने। असत्यता शिरोव्यथा तथा वृथान्नभोजनं रवावसत्कथारतिः कुमार्गगामिनी मतिः।।६१।। भोजन अवस्था में हो तो जातक हमेशा संधियों में वेदना, परस्त्री से द्रव्य की हानि, बल की हानि, असत्यभाषी, शिर में पीडा, व्यर्थ अन्न और भोजन करने वाला, व्यर्थ बकवाद करने वाला, कुमार्गगामी होता है।।६१।। विज्ञलोकैः सदा मण्डितः पण्डितः काव्यविद्यानवद्यप्रलापान्वितः। राजपूज्यो धरामण्डले सर्वदा नृत्यलिप्सागते पद्मिनीनायके।।६२।। नृत्यलिप्सा में हो तो सदा विज्ञजनों से आवृत, पंडित, काव्य करने वाला, राजा से पूज्य होता है।।६२।।